राग दरबारी

जानेमाने साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल की रचना "राग-दरबारी" समकालीन साहित्य में एक मील का पत्थर है जिसके लिये उन्हें 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला।

Thursday, January 18, 2007

13. वह एक प्रेम पत्र था

तहसील का मुख्यालय होने के बावजूद शिवपालगंज इतना बड़ा गाँव न था कि उसे टाउन एरिया होने का हक मिलता। शिवपालगंज में एक गाँव सभा थी और गाँववाले उसे गाँव-सभा ही बनाये रखना चाहते थे ताकि उन्हें टाउन-एरियावाली दर से ज़्यादा टेक्स न देना पड़े। इस गाँव सभा के प्रधान रामाधीन भीखमखेड़वी के भाई थे जिनकी सबसे बड़ी सुन्दरता यह थी कि वे इतने साल प्रधान रह चुकने के बावजूद न तो पागलख़ाने गये थे, न जेलख़ाने। गँजहों में वे अपनी मूर्खता के लिए प्रसिद्ध थे और उसी कारण, प्रधान बनने के पहले तक, वें सर्वप्रिय थे। बाहर से अफ़सरों के आने पर गाँववाले उनकों एक प्रकार से तश्तरी रखकर उनके सामने पेश करते थे। और कभी-कभी कह भी देते थे कि साहेब, शहर में जो लोग चुनकर जाते हैं उन्हें तो तुमने हज़ार बार देखा होगा, अब एक बार यहाँ का भी माल देखते जाओ।


गाँव-सभा के चुनाव जनवरी के महिने में होने थे और नवम्बर लग चुका था। सवाल यह था कि इस बार किसको प्रधान बनाया जाये? पिछले चुनावों में वैद्यजी ने कोई दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि गाँव-सभा के काम को वे निहायत ज़लील काम मानते थे। और वह एक तरह से ज़लील था भी, क्योंकि गाँव-सभाओं के अफ़सर बड़े टुटपुँजिया क़िस्म के अफ़सर थे। न उनके पास पुलिस का डण्डा था, न तहसीलदार का रूतबा, और उनसे रोज़-रोज़ अपने काम का मुआयना करने में आदमी की इज्जत गिर जाती थी। प्रधान को गाँव-सभा की ज़मीन-जायदाद के लिए मुक़दमें करने पड़ते थे और शहर के इजलास में वकीलों और हाकिमों का उनके साथ वैसा भी सलूक न था जो एक चोर का दूसरे चोर के साथ होता है। मुक़दमेबाज़ी में दुनिया-भर की दुश्मनी लेनी पड़ती थी और मुसीबत के वक़्त पुलिसवाले सिर्फ़ मुस्करा देते थे और कभी-कभी उन्हें मोटे अक्षरों में ‘परधानजी’ कहकर थाने के बाहर का भूगोल समझाने लगते थे।


पर इधर कुछ दिनों से वैद्यजी की रूचि गाँव-सभा में भी दिखने लगी थी, क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री का एक भाषण किसी अख़बार में पढ़ लिया था। उस भाषण में बताया गया था कि गाँवों का उद्धार स्कूल, सहकारी समिति और गाँव-पंचायत के आधार पर ही हो सकता है और अचानक वैद्यजी को लगा कि वे अभी तक गाँव का उद्धार सिर्फ़ कोऑपरेटिव यूनियन और कॉलिज के सहारे करते आ रहे थे और उनके हाथ में गाँव-पंचायत तो है ही नहीं। ‘आह!’ उन्होंने सोचा होगा, ‘तभी शिवपालगंज का ठीक से उद्धार नहीं हो रहा है। यही तो मैं कहूँ कि क्या बात है?’


रूचि लेते ही कई बातें सामने आयीं। यह कि रामाधीन के भाई ने गाँव-सभा को चौपट कर दिया है। गाँव की बंजर ज़मीन पर लोगों ने मनमाने क़ब्ज़े कर लिये हैं और निश्चय ही प्रधान ने रिश्वत ली है। गाँवा-पंचायत के पास रुपया नहीं है और निश्चय ही प्रधान ने ग़बन किया है। गाँव के भीतर बहुत गन्दगी जमा होअ गई है और प्रधान निश्चय ही सुअर का बच्चा है। थानेवालों ने प्रधान की शिकायत पर कईं लोगों का चालान किया है जिससे सिर्फ़ यही नतीजा निकलता है कि वह अब पुलिस का दलाल हो गया है। प्रधान को बन्दूक का लाइसेंस मिल गया है जो निश्चय ही डकैतियों के लिए उधार जाती है और पिछले साल गाँव में बजरंगी का क़त्ल हुआ था, तो बूझो कि क्यों हुआ था?


भंग पीनेवालों में भंग पीसना एक कला है, कविता है, कार्रवाई है, करतब है, रस्म है। वैसे टके की पत्ती को चबाकर ऊपर से पानी पी लिया जाये तो अच्छा-खासा नशा आ जायेगा, पर यहाँ नशेबाजी सस्ती है। आदर्श यह है कि पत्ती के साथ बादाम, पिस्ता, गुलकन्द, दूध-मलाई आदि का प्रयोग किया जाये। भंग को इतना पीसा जाये कि लोढ़ा और सिल चिपककर एक हो जायें, पीने के पहले शंकर भगवान की तारीफ़ में छन्द सुनाये जायें और पूरी कार्रवाई को व्यक्तिगत न बनाकर उसे सामूहिक रूप दिया जाये।


सनीचर का काम वैद्यजी की बैठक में भंग के इसी सामाजिक पहलू को उभारना था। इस समय भी वह रोज़ की तरह भंग पीस रहा था। उसे किसी ने पुकारा, “सनीचर!” सनीचर ने फुफकारकर फन-जैसा सिर ऊपर उठाया। वैद्यजी ने कहा, “भंग का काम किसी और को दे दो और यहाँ अन्दर आ जाओ।“


जैसे कोई उसे मिनिस्टरी से इस्तीफ़ा देने को कह रहा हो। वह भुनभुनाने लगा, “किसे दे दें? कोई है इस काम को करनेवाला? आजकल के लौण्डे क्या जानें इन बातों को। हल्दी-मिर्च-जैसा पीसकर रख देंगे।“ पर उसने किया यही कि सिल-लोढ़े का चार्ज एक नौजवान को दे दिया, हाथ धोकर अपने अण्डरवियर के पिछे पोंछ लिये और वैद्यजी के पास आकर खड़ा हो गया।


तख्त पर वैद्यजी, रंगनाथ, बद्री पहलवान और प्रिंसिपल साहब बैठे थे। प्रिंसिपल एक कोने में खिसककर बोले, “बैठ जाइए सनीचरजी!”


इस बात ने सनीचर को चौकन्ना कर दिया। परिणाम यहाँ हुआ कि उसने टूटे हुए दाँत बाहर निकालकर छाती के बाल खुजलाने शुरू कर दिये। वह बेवकूफ़-सा दिखने लगा, क्योंकि वह जानता था चालाकी के हमले का मुकाबला किस तरह किया जाता है। बोला, “अरे प्रिंसिपल साहेब, अब अपने बराबर बैठालकर मुझे नरक में न डालिए।“


बद्री पहलवान हँसे। बोले, “स्साले! गँजहापन झाड़ते हो! प्रिंसिपल साहब के साथ बैठने से नरक में चले जाओगे?” फिर आवाज़ बदलकर बोले, “बैठ जाओ उधर।“


वैद्यजी ने शाश्वत सत्य कहनेवाली शैली में कहा, “इस तरह से न बोलो बद्री। मंगलदासजी क्या होने जा रहे हैं, इसका तुम्हें कुछ पता भी है?”


सनीचर ने बरसों बाद अपना सही नाम सुना था। वह बैठ गया और बड़प्पन के साथ बोला, “अब पहलवान को ज़्यादा ज़लील न करो महाराज। अभी इनकी उमर ही क्या है? वक़्त पर सब समझ जायेंगे।“


वैद्यजी ने कहा, “तो प्रिंसिपल साहब, कह डालो जो कहना है।“


उन्होने अवधी में कहना शुरू किया, “कहै का कौनि बात है? आप लोग सब जनतै ही।“ फिर अपने को खड़ीबोली की सूली पर चढ़ाकर बोले, “गाँव-सभा का चुनाव हो रहा है, यहाँ का प्रधान बड़ा आदमी होता है। वह कॉलिज-कमेटी का मेम्बर भी होता है-एक तरह से मेरा भी अफ़सर।“


वैद्यजी ने अकस्मात कहा, “सुनो मंगलदास, इस बार हम लोग गाँव-सभा का प्रधान तुम्हें बनायेंगे।“


सनीचर का चेहरा टेढ़ा-मेढ़ा होने लगा। उसने हाथ जोड़ दिये – पुलक गात लोचन सलिल। किसी गुप्त रोग से पीड़ित, उपेक्षित कार्यकर्ता के पास किसी मेडिकल असोसिएशन का चेयरमैन बनने का परवाना आ जाये तो उसकी क्या हालत होगी? वही सनीचर की हुई। फिर अपने को क़बू में करके उसने कहा, “अरे नहीं महाराज, मुझ-जैसे नालायक़ को आपने इस लायक़ समझा, इतना बहुत है। पर मैं इस इज़्ज़त के क़ाबिल नहीं हूँ।“


सनीचर को अचम्भा हुआ कि अचानक वह कितनी बढ़िया उर्दू छाँट गया है। पर बद्री पहलवान ने कहा, “अबे, अभी से मत बहक। ऐसी बातें तो लोग प्रधान बनने के बाद कहते हैं। इन्हें तब तक के लिए बाँधे रख।“


इतनी देर बाद रंगनाथ बातचीत में बैठा। सनीचर का कन्धा थपथपाकर उसने कहा, “लायक़-नालायक़ की बात नहीं है सनीचर! हम मानते हैं कि तुम नालायक़ हो पर उससे क्या? प्रधान तुम खुद थोड़े ही बन रहे हो। वह तो तुम्हे जनता बना रही है। जनता जो चाहेगी, करेगी। तुम कौन हो बोलनेवाले?”


पहलवान ने कहा, “लौंडे तुम्हें दिन-रात बेवकूफ़ बनाते रहते हैं। तब तुम क्या करते हो? यही न कि चुपचाप बेवकूफ़ बन जाते हो?”


प्रिंसिपल साहब ने पढ़े-लिखे आदमी की तरह समझाते हुए कहा, “हाँ भाई, प्रजातन्त्र है। इसमें तो सब जगह इसी तरह होता है।“ सनीचर को जोश दिलाते हुए वे बोले, “शाबाश, सनीचर, हो जाओ तैयार!” यह कहकर उन्होनें ‘चढ़ जा बेटा सूली पर’ वाले अन्दाज़ से सनीचर की ओर देखा। उसका सिर हिलना बन्द हो गया था।


प्रिंसिपल ने आख़िरी धक्का दिया, “प्रधान कोई गबडू-घुसडू ही हो सकता है। भारी ओहदा है। पूरे गाँव की जायदाद का मालिक! चाहे तो सारे गाँव को 107 में चालान करके बन्द कर दे। बड़े-बड़े अफ़सर आकर उसके दरवाज़े बैठते हैं! जिसकी चुगली खा दे, उसका बैठना मुश्किल। काग़ज़ पर ज़रा-सी मोहर मार दी और जब चाहा, मनमाना तेल-शक्कर निकाल लिया। गाँव में उसके हुकुम के बिना कोई अपने घूरे पर कूड़ा तक नहीं डाल सकता। सब उससे सलाह लेकर चलते हैं। सबकी कुंजी उसके पास है। हर लावारिस का वही वारिस है। क्या समझे?”


रंगनाथ को ये बातें आदर्शवाद से कुछ गिरी हुई जान पड़ रही थीं। उसने कहा, “तुम तो मास्टर साहब, प्रधान को पूरा डाकू बनाये दे रहे हो।“


“हें-हें-हें” कहकर प्रिंसिपल ने ऐसा प्रकट किया जैसे वे जान-बूझकर ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हों। यह उनका ढ़ंग था, जिसके द्वारा बेवकूफ़ी करते-करते वे अपने श्रोताओं को यह भी जता देते थे कि मैं अपनी बेवकूफ़ी से परिचित हूँ और इसलिए बेवकूफ़ नहीं हूँ।


“हें-हें-हें, रंगनाथ बाबू! आपने भी क्या सोच लिया? मैं तो मौजूदा प्रधान की बातें बता रहा था।“


रंगनाथ ने प्रिंसिपल को ग़ौर से देखा। यह आदमी अपनी बेवकूफ़ी को भी अपने दुश्मन के ऊपर ठोंककर उसे बदनाम कर रहा है। समझदारी के हथियार से तो अपने विरोधियों को सभी मारते हैं, पर यहाँ बेवकूफ़ी के हथियार से विरोधी को उखाड़ा जा रहा है। थोड़ी देर के लिए खन्ना मास्टर और उनके साथियों के बारे में वह निराश हो गया। उसने समझ लिया कि प्रिंसिपल का मुक़ाबला करने के लिए कुछ और मँजे हुए खिलाड़ी की ज़रूरत है। सनिचर कह रहा था, “पर बद्री भैया, इतने बड़े-बड़े हाकिम प्रधान के दरवाज़े पर आते हैं ... अपना तो कोई दरवाज़ा ही नहीं है; देख तो रहे हो वह टुटहा छप्पर!”


बद्री पहलवान हमेशा से सनीचर से अधिक बातें करने में अपनी तौहीन समझते थे। उन्हें सन्देह हुआ कि आज मौक़ा पाकर यहाँ मुँह लगा जा रहा है। इसलिए वे उठकर खड़े हो गये। कमर से गिरती हुई लुंगी को चारों ओर से लपेटते हुए बोले, “घबराओ नहीं। एक दियासलाई तुम्हारे टुटहे छप्पर में भी लगाये देता हूँ। यह चिंता अभी दूर हुई जाती है।“


कहकर वे घर के अन्दर चले गये। यह मज़ाक था, ऐसा समझकर पहले प्रिंसिपल साहब हँसे, फिर सनीचर भी हँसा। रंगनाथ की समझ में आते-आते बात दूसरी ओर चली गयी थी। वैद्यजी ने कहा, “क्यों? मेरा स्थान तो है ही। आनन्द से यहाँ बैठे रहना। सभी अधिकारियों का यहीं से स्वागत करना। कुछ दिन बाद पक्का पंचायतघर बन जायेगा तो उसी में जाकर रहना। वहीं से गाँव-सभा की सेवा करना।“


सनीचर ने फिर विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़े। सिर्फ़ यही कहा, “मुझे क्या करना है? सारी दुनिया यही कहेगी कि आप लोगों के होते हुए शिवपालगंज में एक निठल्ले को ...”


प्रिंसिपल ने अपनी चिर-परिचित ‘हें-हें-हें’ और अवधी का प्रयोग करते हुए कहा, “फिर बहकने लगे आप सनीचरजी! हमारे इधर राजापर की गाँव-सभा में वहाँ के बाबू साहब ने अपने हलवाहे को प्रधान बनाया है। कोई बड़ा आदमी इस धकापेल में खुद कहाँ पड़ता है।“


प्रिंसिपल साहब बिना किसी कुण्ठा के कहते रहे, “और मैनेजर साहब, उसी हलवाहे ने सभापति बनकर रंग बाँध दिया। क़िस्सा मशहूर है कि एक बार तहसील में जलसा हुआ। डिप्टी साहब आये थे। सभी प्रधान बैठे थे। उन्हें फ़र्श पर दरी बिछाकर बैठाया गया था। डिप्टी साहब कुर्सी पर बैठे थे। तभी हलवाहेराम ने कहा कि यह कहाँ का न्याय है कि हमें बुलाकर फ़र्श पर बैठाया जाये और डिप्टी साहब कुर्सी पर बैठें। डिप्टी साहब भी नयें लौंडे थे। ऐंठ गये। फिर तो दोनों तरफ़ इज़्ज़त का मामला पड़ गया। प्रधान लोग हलवाहेराम के साथ हो गये। ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ के नारे लगने लगे। डिप्टी साहब वहीं कुर्सी दबाये ‘शांति-शांति’ चिल्लाते रहे। पर कहाँ की शांति और कहाँ की शकुंतला? प्रधानों ने सभा में बैठने से इनकार कर दिया और राजापुर का हलवाहा तहसीली क्षेत्र का नेता बन बैठा। दूसरे ही दिन तीन पार्टियों ने अर्जी भेजी कि हमारे मेम्बर बन जाओ पर बाबू साहब ने मना कर दिया कि ख़बरदार, अभी कुछ नहीं। हम जब जिस पार्टी को बतायें, उसी के मेम्बर बन जाना।“


सनीचर के कानों में ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ के नारे लग रहे थे। उसकी कल्पना में एक नग-धड़ंग अण्डरवियरधारी आदमी के पीछे सौ-दो सौ आदमी बाँह उठा-उठाकर चीख़ रहे थे। वैद्यजी बोले, “यह अशिष्टता थी। मैं प्रधान होता तो उठकर चला आता। फिर दो मास बाद अपनी गाँव-सभा में उत्सव करता। डिप्टी साहब को भी आमंत्रित करता। उन्हें फ़र्श पर बैठाल देता। उसके बाद स्वयं कुर्सी पर बैठकर व्याख्य़ान देते हुए कहता कि ‘बन्धुओ! मुझे कुर्सी पर बैठने में स्वाभाविक कष्ट है, पर अतिथि-सत्कार का यह नियम डिप्टी साहब ने अमुक तिथि को हमें तहसील में बुलाकर सिखाया था। अत: उनकी शिक्षा के आधार पर मुझे इस असुविधा को स्वीकार करना पड़ा है।“ कहकर वैद्यजी आत्मतोष के साथ ठठाकर हँसे। रंगनाथ का समर्थन पाने के लिए बोले, “क्यों बेटा, यही उचित होता न?”


रंगनाथ ने कहा, “ठीक है। मुझे भी यह तरकीब लोमड़ी और सारस की कथा में समझायी गयी थी।“


वैद्यजी ने सनीचर से कहा, “तो ठीक है। जाओ देखो, कहीं सचमुच ही तो उस मूर्ख ने भंग को हल्दी-जैसा नहीं पीस दिया है। जाओ, तुम्हारा हाथ लगे बिना रंग नहीं आता।“


बद्री पहलवान मुस्कराकर दरवाज़े पर से बोला, “जाओ साले, फिर वही भंग घोंटो!”


कुछ देर सन्नाटा रहा। प्रिंसिपल ने धीरे-से कहा, “आज्ञा हो तो एक बात खन्ना मास्टर के बारे में कहूँ।“


वैद्यजी ने भौंहें मत्थे पर चढ़ा लीं। आज्ञा मिल गयी। प्रिंसिपल ने कहा, “एक घटना घटी है। परसों शाम के वक़्त गयादीन के आँगन में एक ढेला-जैसा गिरा। गयादीन उस समय दिशा-मैदान के लिए बाहर गया हुआ था। घर में उस ढेले को बेला की बुआ ने देखा और उठाया। वह एक मुड़ा हुआ लिफ़ाफ़ा था। बुआ ने बेला से उसे पढ़वाकर सुनना चाहा, पर बेला पढ़ नहीं पायी।..”


रंगनाथ बड़े ध्यान से सुन रहा था। उसने पूछा, “अंग्रेज़ी में लिखा हुआ था क्या?”


“अंग्रेज़ी में कोई क्या लिखेगा! था तो हिन्दी में ही, पर कुँवारी लड़की उसे पढ़ती कैसे? वह एक प्रेम-पत्र था।“


वैद्यजी चुपचाप सुन रहे थे। रंगनाथ की हिम्मत न पड़ी कि पूछे, पत्र किसने लिखा था।


प्रिंसिपल बोले, “पता नहीं, किसने लिखा था। मुझे तो लगता है कि खन्ना मास्टर के ही गुटवालों की हरकत है। गुण्डे हैं साले, गुण्डे। पर खन्ना मास्टर आपके खिलाफ़ प्रचार कर रहा है। कहता है कि वह पत्र रुप्पन बाबू ने भेजा है। अब उसकी यह हिम्मत कि आपके वंश को कलंकित करें।“


वैद्यजी पर इसका कोई असर नहीं दीख पड़ा, सिवाय इसके कि वे एक मिनट तक चुप बैठे रहे। फिर बोले, “वह मेरे वंश को क्या खाकर कलंकित करेगा! कलंकित तो वह गयादीन के वंश को कर रहा है – कन्या तो उन्हीं की है।“


प्रिंसिपल साहब थोड़ी देर वैद्यजी का मुँह देखते रहे। पर उनका चेहरा बिल्कुल रिटायर हो चुका था। घबराहट में प्रिंसिपल साहब लुढ़ककर अवधी के फ़र्श पर आ गिरे। दूसरी ओर देखते हुए बोले, “लाव भइया सनीचर, जल्दी से ठंडाई-फंडाई लै आव। कॉलिज माँ लेबर छूटै का समय हूवइ रहा है।“

लेखक: श्रीलाल शुक्ल
टंकण सहयोग: गिरिराज जोशी
अध्याय:
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12.नैतिकता कोने में पड़ी चौकी है

गांव में एक आदमी रहता था जिसका नाम गयादीन था। वह जोड़-बाकी, गुणा-भाग में बड़ा काबिल माना जाता था, क्योंकि उसका पेशा सूदखोरी था। उसकी एक दुकान थी जिस पर कपड़ा बिकता था और रूपये का लेन-देन होता था। उसके एक जवान लड़की थी, जिसका नाम बेला था और बहिन थी, जो बेवा थी और एक बीवी थी जो मर चुकी थी। बेला स्वस्थ, सुन्दर, ग्रह कार्य में कुशल और रामायण और माया-मनोहर कहानियां पढ़ लेने-भर को पढ़ी-लिखी थी। उसके लिए एक सुन्दर और सुयोग्य वर की तलाश थी। बेला तबीयत और जिस्म, दोनों से प्रेम करने लायक थी। और रुप्पन बाबू उसको प्रेम करते थे, पर वह यह बात नहीं जानती थी। रूप्पन बाबू रोज रात को सोने के पहले उसके शरीर का ध्यान करते थे और ध्यान को शुद्ध रखने के लिए उस समय वे सिर्फ़ शरीर को देखते थे, उस पर के कपड़े नही। बेला की बुआ गयादीन के घर का काम देखती थी और बेला को दरवाजे से बाहर नहीं निकलने देती थी। बेला बड़ों की आज्ञा मानती थी और दरवाजे से बाहर नहीं निकलती थी। उसे बाहर जाना होता तो छत के रास्ते, मिली हुई छतों को पार करती हुई, किसी पड़ोसी के मकान तक पहुंच जाती थी। रूप्पन बाबू बेला के लिए काफ़ी विकल रहते थे और उसे सप्ताह में तीन-चार पत्र लिखकर उन्हें फ़ाड़ दिया करते थे।

इन बातों का कोई तात्कालिक महत्व नहीं है। महत्व इस बात का है कि गयादीन सूद पर रूपया चलाते थे और कपड़े की दुकान करते थे। कोआपरेटिव यूनियन भी सूद पर रूपया चलाती थी और कपड़े की दुकान करती थी, दोनों शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में रहते थे। वैद्यजी से उनके अच्छे सम्बन्ध थे। वे कालिज की प्रबन्ध-समिति के उप-सभापति थे। उनके पास पैसा था, इज्जत थी: उन पर वैद्यजी, पुलिस, रुप्पन, स्थानीय एम. एल. ए. और जिला बोर्ड के टैक्स-कलेक्टर की कृपा थी।

इस सबके बावजूद वे निराशावादी थे। वे बहुत संभलकर चलते थे। अपने स्वास्थ्य के बारे में बहुत सावधान थे। वे उड़द की दाल तक से परहेज करते थे। एक बार वे शहर गये हुए थे। वहां उनके एक रिश्तेदार ने उन्हें खाने में उड़द की दाल दी। गयादीन ने धीरे-से-थाली दूर खिसका दी और आचमन करके भूखे ही उठ आये। बाद में उन्हें दूसरी दाल के साथ दूसरा खाना परोसा गया। इस बार उन्होंने आचमन करके खाना खा लिया। शाम को रिश्तेदार ने उन्हें मजबूर किया कि वे बतायें, उड़द की दाल से उन्हें क्या ऎतराज है। कुछ देर इधर-उधर देखकर उन्होंने धीरे-से बताया कि उड़द की दाल खा लेने से पेट में वायु बनती है और गुस्सा आने लगता है।

उनके मेजबान ने पूछा,"अगर गुस्सा आ ही गया तो क्या हो जायेगा? गुस्सा कोई शेर है या चीता? उससे इतना घबराने की क्या बात है?"

मेजबान एक दफ़्तर में काम करता था। गयादीन ने समझाया कि उसका कहना ठीक है। पर गुस्सा सबको नही छजता। गुस्सा करना तो सिर्फ़ हाकिमों को छजता है। हुकूमत भले ही बैठ जाये, पर वह तो हाकिम ही रहेगा। पर हम व्यापारी आदमी है। हमें गुस्सा आने लगा तो कोई भूलकर भी हमारी दुकान पर न आयेगा। और पता नही कब कैसा झंझट खड़ा हो जाये।

गयादीन के यहां चोरी हो गयी थी और चोरी में कुछ जेवर और कपड़े-भर गये थे और पुलिस को यह मानने मे ज्यादा आसानी थी कि उस रात चोरों का पीछा करने वालों में से ही किसी ने चोरी कर डाली है। चोर जब छत से आंगन में कूदा था तो गयादीन की बेटी और बहिन ने उसे नहीं देखा था और तब देखती तो उसका चेहरा दिख जाता। पर जब चोर लाठी के सहारे दीवार पर चढ़कर छत पर जाने लगा तो उसे दोनों ने देख लिया था और तब उन्होंने उसकी पीठ-भर देखी थी और पुलिस को उनकी इस हरकत से बड़ी नाराजगी थी। पुलिस ने पिछले तीन दिनों में कई चोर इन दोनो के सामने लाकर पेश किये थे और चेहरे के साथ-साथ उनकी पीठ भी उन्हें दिखायी दी थी: पर उनमें कोई भी ऎसा नही निकला था कि बेला या उसकी बुआ उसके गले या उसकी पीठ की ओर से जयमाला डाल कर कहती कि "दारोगाजी, यही हमारा उस रात का चोर है।" पुलिस को उनकी इस हरकत से भी बड़ी नाराजगी थी और दारोगाजी ने भुनभुनाना शुरू कर दिया था कि गयादीन की लड़की और बहिन जान-बूझकर चोर को पकड़वाने से इनकार कर रही हैं और पता नही, क्या मामला है।

गयादीन का निराशावाद कुछ और ज्यादा हो गया था, क्योंकि गांव मे इतने मकान थे, पर चोर को अपनी ओर खीचनेवाला उन्हीं का एक मकान रह गया था। और नीचे उतरते वक्त चोर के चेहरे पर बेला और उसकी बहन की निगाह बखूबी पड़ सकती थी, पर उन निगाहो ने देखने के लिए सिर्फ़ चोर की पीठ को ही चुना था और दारोगाजी सबसे हंसकर बोलते थे, पर टेढी बात करने के लिए अब उन्हें गयादीन ही मिल रहे थे।

उस गांव में कुछ मास्टर भी रहते थे जिनमें एक खन्ना थे जो कि बेवकूफ़ थे: दूसरे मालवीय थे, वह भी बेवकूफ़ थे: तीसरे, चौथे, पाचवें, छठे और सातवें मास्टर का नाम गयादीन नही जानते थे, पर वे मास्टर भी बेवकूफ़ थे और गयादीन की निराशा इस समय कुछ और गाढ़ी हुई जा रही थी, क्योंकि सात मास्टर एक साथ उनके मकान की ओर आ रहे थे और निश्चय ही वे चोर के बारे में सहानुभूति दिखाकर एकदम से कालेज के बारे में कोई बेवकूफ़ी की बात शुरू करने वाले थे।


वही हुआ। मास्टर लोग आधे घण्टे तक गयादीन को समझाते रहे कि वे कालिज की प्रबन्ध-समिति के उपाध्यक्ष हैं और चूंकि अध्यक्ष बम्बई में कई साल से रहते आ रहे है और वही रहते रहेगें, इसलिए मैनेजर के और प्रिंसिपल के अनाचार के खिलाफ़ उपाध्यक्ष को कुछ करना चाहिए।

गयादीन ने बहुत ठण्डे ढंग से सर्वोदय सभ्यता के साथ समझाया कि उपाध्यक्ष तो सिर्फ़ कहने की बात है, वास्तव में यह कोई ओहदा-जैसा ओहदा नही है, उनके पास कोई ताकत नहीं है, और मास्टर साहब, ये खेल तुम्हीं लोंग खेलो, हमें बीच में नहीं घसीटो।

तब नागरिक-शास्त्र के मास्टर उन्हें गम्भीरता से बताने लगे कि उपाध्यक्ष की ताकत कितनी बड़ी है। इस विश्वास से कि गयादीन इस बारे मे कुछ नही जानते, उन्होंने उपाध्यक्ष की हैसियत को भारत के संविधान के अनुसार बताना शुरू कर दिया, पर गयादीन जूते की नोक से जमीन पर एक गोल दायरा बनाते रहे जिसका अर्थ यह न था कि वे ज्योमेट्री के जानकार नहीं है, बल्कि इससे साफ़ जाहिर होता था कि वे किसी फ़न्दे के बारे में सोच रहे हैं।

अचानक उन्होंने मास्टर को टोककर पूछा,"तो इसी बात पर बताओ मास्टर साहब कि भारत के उपाध्यक्ष कौन है?"

यह सवाल सुनते ही मास्टरों में भगदड़ मच गयी। कोई इधर को देखने लगा कोई उधर; पर भारत के उपाध्यक्ष का नाम किसी भी दिशा में लिखा नहीं मिला। अन्त में नागरिक-शास्त्र के मास्टर ने कहा,"पहले तो राधाकृष्णनजी थे, अब इधर उनका तबादला हो गया है।

गयादीन धीरे-से बोले,"अब समझ लो मास्टर साहब, उपाध्यक्ष की क्या हैसियत होती है।

मगर मास्टर न माने। उनमें से एक ने जिद पकड़ ली कि कम-से-कम कालिज की प्रबन्ध-समिति की एक बैठक तो गयादीनजी बुलवा ही ले। गयादीन गांव के महाजन जरूर थे, पर वैसे महाजन न थे जिनके किसी ओर निकलने पर पन्थ बन जाता है। वे उस जत्थे के महाजन थे जो अनजानी राह पर पहले किराये के जन भेजते हैं और जब देख लेते हैं कि उस पर पगडण्डी बन गयी है और उसके धंसने का खतरा नही है, तब वे महाजन की तरह छड़ी टेक-टेककर धीरे-धीरे निकल जाते हैं। इसलिए मास्टरों की जिद का उन पर कोई खास असर नहीं हुआ। उन्होंने धीरे-से कहा,"बैठक बुलाने के लिए रामाधीन को लगा दो मास्टर साहब! वे ऎसे कामों के लिए अच्छे रहेंगे।"

"उन्हें तो लगा ही दिया है।"

"तो बस, लगाये रहो। खिसकने न दो, "कहकर गयादीन आसपास बैठे हुए दूसरे लोगों की ओर देखने लगे। ये दूसरे लोग नजदीक के गांव के थे जो पुराने प्रोनोट बढ़वाने, नये प्रोनोट लिखवाने और किसी भी हालत में प्रोनोट से छुटकारा न पाने के लिए आये हुए थे। खन्ना मास्टर ने फ़ैसला कर लिया था कि आज गयादीन से इस मसले की बात पूरी कर ली जाये। इसलिए उन्होंने फ़िर समझाने की कोशिश की। बोले,"मालवीयजी, अब आप ही गयादीनजी को समझाइए। यह प्रिंसिपल तो हमें पीसे डाल रहा है।" गयादीन ने लम्बी सांस खीची, सोचा शायद भाग्य में यही लिखा है, ये निकम्मे मास्टर यहां से जायेगे नहीं। वे देह हिलाकर चारपाई पर दूसरे आसन से बैठ गये। आदमियों से बोले, "तो जाओ भैया! तुम्हीं लोग जाओ। कल सबेरे जरा जल्दी आना।"

गयादीन दूसरी सांस खींचकर खन्ना मास्टर की ओर मुंह करके बैठ गये। खन्ना मास्टर बोले, "आप इजाजत दे तो बात शुरू से ही कहूं।"

"क्या कहोगे मास्टर साहब?" गयादीन ऊबकर बोले,"प्राइवेट स्कूल की मास्टरी-वह तो पिसाई का काम है ही। भागोगे कहां तक?"

खन्ना ने कहा,"मुसीबत यह है कि एक कालिज की जनरल बाडी की मीटिंग पांच साल से नहीं हुई है। बैदजी ही मैनेजर बने हुए है। नये आम चुनाव नहीं हुए हैं, जो कि हर साल होने चाहिए।"

वे कुछ देर रामलीला के राम-लक्ष्मण के तरह भावहीन चेहरा बनाये बैठे रहे। फ़िर बोले,"आप लोग तो पढ़े-लिखे आदमी है। मैं क्या कह सकता हूं? पर सैकड़ो संस्थाएं है जिनकी सालाना बैठकें बरसों नहीं होतीं। अपने यहां का जिलाबोर्ड! एक जमाने से बिना चुनाव कराये हुए इसे सालों खीचा गया है।" गाल फ़ूलाकर वे भर्राये गले से बोले, "देश-भर में यही हाल है।" गला देश-भक्ति के कारण नहीं, खांसी के कारण भर आया था।

मालवीयजी ने कहा,"प्रिंसिपल हजारों रूपया मनमाना खर्च करता है। हर साल आडिटवाले एतराज करते हैं, हर साल यह बुत्ता दे जाता है।"

गयादीन ने बहुत निर्दोष ढंग से कहा,"आप क्या आडिट के इंचार्ज है?"

मालवीय ने आवाज ऊंची करके कहा,"जी नहीं, बात यह नहीं है, पर हमसे देखा नहीं जाता कि जनता का रूपया इस तरह बरबाद हो। आखिर......."

गयादीन ने तभी उनकी बात काट दी उसी तरह धीरे-से-बोले, "फ़िर आप किस तरह चाहते है कि जनता का रुपया बरबाद किया जाये? बड़ी-बड़ी इमारतें बनाकर? सभाएं बुलाकर? दावतें लुटाकर?" इस ज्ञान के सामने मालवीयजी झुक गये। गयादीन ने उदारतापूर्क समझाया,"मास्टर साहब, मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा तो हूं नहीं, पर अच्छे दिनों मे कलकत्ता-बम्बई देख चूका हूं। थोड़ा बहुत मै भी समझता हूं। जनता के रुपये पर इतना दर्द दिखाना ठीक नहीं। वह तो बरबाद होगा ही।" वे थोड़ी देर चुप रहे, फ़िर खन्ना मास्टर को पुचकारते-से बोले,"नहीं मास्टर साहब, जनता के रुपये के पीछे इतना सोच-विचार न करों; नहीं तो बड़ी तकलीफ़ उठानी पड़ेगी।"

मालवीयजी को गयादीन की चिन्ताधारा बहुत ही गहन जान पड़ी। गहन थी भी। वे अभी किनारे पर बालू ही में लोट रहे थे। बोले,"गयादीनजी, मै जानता हूं कि इन बातों से हम मास्टरों का कोई मतलब नहीं। चाहे कालिज के बदले वैद्यजी आटा चक्की की मशीन लगवा लें, चाहे प्रिंसिपल अपनी लड़की शादी कर लें; फ़िर भी यह संस्था है तो आप लोगो की ही! उसमें खुलेआम इतनी बेजा बाते हो! नैतिकता का जहां नाम ही न हो!"

इतनी देर में पहली बार गयादीन के मुंह पर कुछ परेशानी-सी झलकी। पर जब वे बोले तो आवाज वही पहले-जैसी थकी-थकी सी थी। उन्होंने कहा,"नैतिकता का नाम न लो मास्टर साहब, किसी ने सुन लिया तो चालान कर देगा।"

लोग चुप रहे। फ़िर गयादीन ने कुछ हरकत दिखायी। उनकी निगाह एक कोने की ओर चली गयी। वहां लकड़ी की एक टूटी-फ़ूटी चौकी पड़ी थी। उसकी ओर उंगली उठाकर गयादीन ने कहां,"नैतिकता, समझ लो कि यही चौकी है। एक कोने में पड़ी है। सभा-सोसायटी के वक्त इस पर चादर बिछा दी जाती है। तब बड़ी बढ़िया दिखती है। इस पर चढ़कर लेक्चर फ़टकार दिया जाता है। यह उसी के लिए है।"

इस बात ने मास्टरों को बिल्कुल ही चुप कर दिया। गयादीन ने ही उन्हें दिलासा देते हुए कहां,"और बोलो मास्टर साहब, खुद तुम्हें क्या तकलीफ़ है? अब तक तो तुम सिर्फ़ जनता की तकलीफ़ बताते रहे हो।"

खन्ना मास्टर उत्तेजित हो गये। बोले,"आपसे कोई भी तकलीफ़ बताना बेकार है। आप किसी भी चीज को तकलीफ़ ही नही मान रहे है।"

"मानेगे क्यों नहीं?" गयादीन ने उन्हें पुचकारा,"जरूर मानेगें। तुम कहो तो!" मालवीयजी ने कहा,"प्रिंसिपल ने हमसे सब काम ले लिये हैं। खन्ना को होस्टल-इंचार्ज नहीं रखा, और मुझसे गेम का चार्ज ले लिया। रायसाहब हमेशा से इम्तिहान के सुपरिण्टेण्डेण्ट थे, उन्हें वहां से हटा दिया है। ये सब काम वह अपने आदमियों को दे रहा है।"

गयादीन बड़े असमंजस में बैठे रहे। फ़िर बोले,"मैं कुछ कहूगां तो आप नाराज होगें। पर जब प्रिंसिपल साहब को अपने मन-मुताबिक इंचार्ज चुनने का अख्तयार है तो उसमें बुरा क्या मानना?"

मास्टर लोग कसमसाये तो वे फ़िर बोले,"दुनिया में सब काम तुम्हारी समझ से थोड़े ही होगा मास्टर साहब? पार साल की याद करो। वही बैजेगांव के लाल साहब को लाट साहब ने वाइस-चांसलर बना दिया कि नही? लोग इतना कूदे-फ़ांदे, पर किसी ने क्या कर लिया। बाद में चुप हो गये। तुम भी चुप हो जाओ। चिल्लाने से कुछ न होगा। लोग तुम्हें ही लुच्चा कहेंगे।"

एक मास्टर पीछे से उचककर बोले,"पर इसका क्या करें? प्रिंसिपल लड़कों को हमारे खिलाफ़ भड़काता है। हमें मां-बहिन की गाली देता है। झूठी रिपोर्ट करता है। हम कुछ लिखकर देते हैं तो उस कागज को गुम करा देता है। बाद में जवाब तलब करता है।"

गयादीन चारपाई पर धीरे-से हिले। वह चरमरायी, तो सकुच से गये। कुछ सोचकर बोले,"यह तो तुम मुझे दफ़्तरों का तरीका बता रहे हो। वहां तो ऎसा होता ही रहता है।"

उस मास्टर ने तैश में आकर कहा,"जब दस-पांच लाशें गिर जायेंगी, तब आप समझेंगे कि नयी बात हुई है।"

गयादीन उसके गुस्से को दया के भाव से देखते रहे, समझ गये कि आज इसने उड़द की दाल खायी है। फ़िर धीरे से बोले,"यह भी कौन सी नयी बात है। चारों तरफ़ पटापट लाशें ही तो गिर रहीं है।"

खन्ना मास्टर ने बात संभाली। बोले,"इनके गुस्से का बुरा न मानें। हम लोग सचमुच ही परेशान हैं। बड़ी मुश्किल है। आप देखिए न, इसी जुलाई में उसने अपने तीन रिश्तेदार मास्टर रखे हैं। उन्हीं को हमसे सीनियर बनाकर सब काम ले रहा है। कुनबापरस्ती का बोलबाला है। बताएं हमें बुरा न लगेगा?"

"बुरा क्यों लगेगा भाई?" गयादीन कांखने लगे,"तुम्हीं तो कहते हो कि कुनबापरस्ती का बोलबाला है। वैद्यजी के रिश्तेदार ना मिले होगें, बेचारे ने अपने ही रिश्तेदार लगा दिये।"

एकाध मास्टर हंसने लगे। गयादीन वैसे ही कहते गये,"मसखरी की बात नहीं। यही आज का जुग-धर्म है। जो सब करते हैं, वही प्रिंसिपल करता है। कहां ले जाये बेचारा अपने रिश्तेदारों को?"

खन्ना मास्टर को सम्बोधित करके उन्होंने फ़िर कहां,"तुम तो इतिहास पढ़ाते हो न मास्टर साहब? सिंहगढ़-विजय कैसे हुई थी?"

खन्ना मास्टर जवाब सोचने लगे। गयादीन ने कहां,"मैं ही बताता हूं। तानाजी क्या लेकर गये थे? एक गोह। उसको रस्से से बांध लिया और किले की दीवार पर फ़ेंक दिया। अब गोह तो अपनी जगह जहां चिपककर बैठ गयी, वहां बैठ गयी। साथवाले सिपाही उसी रस्से के सहारे सड़ासड़ छत पर पहुंच गये।"

इतना कहते-कहते वे शायद थक गये। इस आशा से कि मास्टर लोग कुछ समझ गये होंगे, उन्होंने उनके चेहरे को देखा, पर वे निर्विकार थे। गयादीन ने अपनी बात समझायी,"वही हाल अपने मुल्क का है, मास्टर साहब! जो जहां है, अपनी जगह गोह की तरह चिपका बैठा है। टस-से-मस नही होता। उसे चाहे जितना कोचों,चाहे जितना दुरदुराओ, वह अपनी जगह चिपका रहेगा और जितने नाते-रिश्तेदार हैं,सब उसकी दुम के सहारे सड़ासड़ चढ़ते हुए ऊपर तक चले जायेंगे। कालिज को क्यों बदनाम करते हो, सभी जगह यही हाल है!

फ़िर सांस खीचकर उन्होंने पूछा,"अच्छा बताओ तो मास्टर साहब, यह बात कहां नही है?"


मास्टर का गुट चमरही के पास से निकला। सबके मुंह लटके हुए थे और लगता था कि टपककर उनके पांवों के पास गिरनेवाले हैं।

'चमरही' गांव के एक मुहल्ले का नाम था जिसमें चमार रहते थे। चमार एक जाति का नाम है जिसे अछूत माना जाता है। अछूत एक प्रकार के दुपाये का नाम है जिसे लोग संविधान लागू होने से पहले छूते नही थे। संविधान एक कविता का नाम है जिसके अनुच्छेद १७ में छुआछूत खत्म कर दी गयी है क्योंकि इस देश में लोग कविता के सहारे नहीं बल्कि धर्म के सहारे रहते हैं और क्योकिं छुआछूत इस देश का एक धर्म है, इसलिए शिवपालगंज में भी दूसरे गांवो की तरह अछूतों के अलग-अलग मुहल्ले थे और उनमें सबसे ज्यादा प्रमुख मुहल्ला चमरही था जिसे जमीदारों ने किसी जमाने में बड़ी ललक से बसाया था और उस ललक का कारण जमीदारों के मन में चर्म-उद्योग का विकास करना नहीं था बल्कि यह था कि वहां बसने के लिए आनेवाले चमार लाठी अच्छी चलाते थे। संविधान लागू होने के बाद चमरही और शिवपालगंज के बाकी हिस्से के बीच एक अच्छा काम हुआ था। वहां एक चबूतरा बनवा दिया गया था, जिसे गांधी-चबूतरा कहते थे। गांधी, जैसे कि कुछ लोगों को आज भी याद होगा, भारतवर्ष में ही पैदा हुए थे और उनके अस्थि-कलश के साथ ही उनके सिद्धांन्तों को संगम में
बहा देने के बाद यह तय किया गया था कि गांधी की याद में अब सिर्फ़ पक्की इमारतें बनायी जायेंगी और उसी हल्ले में शिवपालगंज में यह चबूतरा बन गया था। चबूतरा जाड़ों में धूप खाने के लिए बड़ा उपयोगी था और ज्यादातर उस पर कुत्ते धूप खाया करते थे; और चूंकि उनके लिए कोई बाथरूम नहीं बनवाया जाता है इसलिए वे धूप खाते-खाते उसके कोने पर पेशाब भी कर देते थे और उनकी देखादेखी कभी-कभी आदमी भी चबूतरे की आड़ में वही काम करने लगते थे।

मास्टर के गुट ने देखा कि उस चबूतरे पर आज लंगड़ आग जलाकर बैठा है और उस पर कुछ भुन रहा है। नजदीक से देखने पर पता लगा कि भुननेवाली चीज एक गोल-गोल ठोस रोटी है जिसे वह निश्चय ही आसपास घूमनेवाले कुत्तों के लिए नहीं सेंक रहा था। लंगड़ को देखते ही मास्टरों की तबीयत हल्की हो गयी।

उन्होंने रूककर उससें बात करनी शुरू कर दी और दो मिनट में मालूम कर लिया कि तहसील में जिस नकल के लिए लंगड़ ने दरख्वास्त दी थी, वह अब पूरे कायदे से, बिना एक कौड़ी गलत ढ़ग से खर्च किये हुए, उसे मिलने वाली ही है।

मास्टर लोगो को यकीन नहीं हुआ।

लंगड़ की बातचीत में आज निराशावाद; धन-नियतिवाद-सही-पराजयवाद-बटा-कुण्ठावाद का कोई असर न था। उसने बताया ,"बात मान लो बापू। आज मैं सब ठीक कर आया हूं। दरख्वास्त में दो गलतियां फ़िर निकल आयी थी, उन्हें दुरूस्त करा दिया है।"

एक मास्टर ने खीजकर कहा,"पहले भी तो तुम्हारी दरख्वास्त में गलती निकली थी। यह नकलनवीस बार-बार गलतियां क्यों निकाला करता है? चोट्टा कहीं का!"

"गाली न दो बापू,"लंगड़ ने कहां,"यह धरम की लड़ाई है। गाली-गलौज का कोई काम नहीं। नकलनवीस बेचारा क्या करे! कलमवालों की जात ही ऎसी है।"

"तो नकल कब तक मिल जायेगी?"

"अब मिली ही समझो बापू-यही पन्द्रह बीस दिन। मिसिल सदर गयी है। अब दरख्वास्त भी सदर जायेगी। नकल नही बनेगी, फ़िर वह यहां वापस आयेगी; फ़िर
रजिस्टर पर चढ़ेगी...."

लंगड़ नकल लेने की योजना सुनाता रहा, उसे पता भी नही चला कि मास्टर लोग उसकी बात और गांधी-चबूतरे के पास फ़ैली हुई बू से ऊबकर कब आगे बढ़ गये। जब उसने सिर ऊपर उठाया तो उसे आसपास चिरपरिचित कुत्ते, सुअर और घूरे भर दिखायी दिये जिनकी सोहबत में वह दफ़्तर के खिलाफ़ धरम की लड़ाई लड़ने चला था। गोधूलि बेला। एक बछड़ा बड़े उग्र रूप से सींग फ़टकारकर चारों पांवो से एक साथ टेढ़ी-मेढ़ी छलांगे लगाता हुआ चबूतरे के पास से निकला। वह कुछ देर दौड़ता
रहा, फ़िर आगे एक गेहूं के हरे-भरे खेत में जाकर ढीला पड़ गया। लंगड़ ने हाथ जोड़कर कहा, "धन्य हो, दरोगाजी!"

लेखक: श्रीलाल शुक्ल
टंकण सहयोग: कु. शहनाज़
अध्याय:
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Saturday, January 06, 2007

11.यह पालिसी इन्सानियत के खिलाफ़ है

छत पर कमरे के सामने टीन पड़ी थी। टीन के नीचे रंगनाथ था। रंगनाथ के नीचे चारपाई थी। दिन के दस बजे थे। अब आप मौसम का हाल सुनिए।

कल रात को बादल दिखायी दिये थे, वे अब तक छट चुके थे। हवा तेज और ठण्डी थी। पिछले दिनों गरज के साथ छींटे पड़े थे और इस घपले के खत्म हो जाने पर पूस का जाड़ा अब बाकायदा शुरु हो गया था। बाजार मे बिकनेवाली नब्बे फ़ीसदी
मिठाइयों की तरह धूप खाने में नहीं, पर देखने में अच्छी लग रही थी। वह सब तरफ़ थी। पर लगता था सिर्फ़ सामने नीम के पेड़ पर ही फ़ैली है। रंगनाथ नीम पर पड़ती धूप को देख रहा था। नीम के पेड़ शहर में भी थे और धूप को उन पर पड़ने
की और रंगनाथ को उसे देखने की वहां कोई मुमानियत नही थी। पर उसने यह धूप गांव ही आकर देखी। ऎसा उसी के नहीं, बहुत से लोगो के साथ हुआ करता है।

वास्तव में यहां आ जाने पर रंगनाथ का रवैया उन टूरिस्टों का-सा हो गया था जो सड़कें, हवा, इमारतें, पानी, धूप, देश-प्रेम, पेड़-पौधे, कमीनापन, शराब, कर्मनिष्ठा, लड़कियां और विश्वविद्यालय आदि वस्तुएं अपने देश में नहीं पहचान पाते और उन्हें विदेशों में जाने पर ही देख पाते है। तात्पर्य यह है कि रंगनाथ की आंखें धूप की ओर देख रही थीं। पर दिमाग हमारी प्राचीन संस्कृति में खोया हुआ था, जिसमें पहले से ही सैकड़ो चीजें खोयी हुई हैं और शोधकरताओं के खोजने से ही मिलती हैं।

रंगनाथ ने शोध के लिए एक ऎसा ही विषय चुना था। हिन्दुस्तानियों ने अपनी पुरानी जिन्दगी के बारे में अंग्रेजो की मदद से एक विषय की ईजाद की है जिसका नाम इण्डोलाजी है। रंगनाथ के शोध का सम्बन्ध इसी से था। इण्डोलाजी के शोधकर्ताओं को पहले इस विषय के शोधकर्ताओं का शोध करना पड़ता है और रंगनाथ वही कर रहा था। दो दिन पहले शहर जाकर यूनिवर्सिटी के पुस्तकालय से वह बहुत-सी किताबें उठा लाया था और इस समय नीम पर फ़ैली धूप की मार्फ़त उनका अध्ययन कर रहा था। उनके दायें मार्शल और बायीं ओर कनिंधम विराजमान थे। विण्टरनीत्ज बिल्कुल नाक के नीचे थे। कीथ पीछे की ओर पायजामें से सटे थे। स्मिथ पैताने की ओर ढकेल दिये थे और वहीं उल्टी-पल्टी हालत में राइस डेविस की झलक दिखायी दे रही थी। परसी ब्राउन को तकिये ने ढक लिया था। ऎसी भीड़-भाड़ में काशीप्रसाद जायसवाल बिस्तर की एक सिकुड़न के बीच औधे-मुंह पड़े थे। भण्डारकर चादर के नीचे से कुछ सहमे हुए झांक रहे थे। इण्डोलांजी की रिचर्स का समां बंध गया था।

इसीलिए रंगनाथ को जब अचानक 'हाउ-हाउ' की आवाज सुनायी दी तो स्वाभाविक था कि वह समझता, कोई ऋषि सामवेद का गान कर रहा था। थोड़ी देर में 'हाउ-हाउ' और नजदीक आ गया, उसने समझा कि कोई हरिषेंण समुद्रगुप्त की दिग्विजय फ़ेफ़ड़ा फ़ाड़कर सुना रहा है। इतने में वह 'हाउ-हाउ' बिल्कुल नीचे की गली में सुनायी दिया और उसमें 'मार डालूंगा साले को' जैसे दो-चार ओजस्वी वाक्यों की मिलावट भी जान पड़ी। तब रंगनाथ समझ गया कि मामला खालिस गंजहा है।

वह मुंडेर के पास जाकर खड़ा हो गया। गली में झांकने पर उसे एक नौजवान लड़की दिखायी दी। उसका सिर खुला था, साड़ी इधर-उधर हो रही थी, बाल रुखे और ऊलजलूल थे, उसके होंठ बराबर चल रहे थे। पर इन्हीं बातों से यह न सोच बैठना चाहिए कि लड़की शहर की थी या ताजे फ़ैशन की थी। वह ठेठ देहात की थी, निहायत गन्दी थी और उसके होठ च्यूइंग गम खाने की वजह से नहीं, बल्कि अपने साथ की बकरियों को 'हले-हले-हले' कहने की वजह से हिल रहे थे। चार छ:
छोटी-बड़ी बकरियां दीवार की दरार में उगते हुए एक पीपल के पौधे को चर रही थी, या चरकर किसी दूसरी दरार की ओर उसमें उगनेवाले किसी दूसरे पीपल की तलाश कर रही थी। रंगनाथ चरागाही वातावरण का यह दृश्य देखता रहा और उसमें
'हाउ-हाउ' के उदगम की खोज करता रहा। वहां 'हाउ-हाउ' नहीं था। निगाह हटाते-हटाते उसने लड़की के चेहरे को भी देख लिया। जो लड़की का जिक्र आते ही ताली बजाकर नाचने लगते है और फ़र्श से उछलकर छत से टकरा जाते है, उनके लिए
जैसे कोई भी लड़की ,वैसे ही यह लड़की भी खूबसुरत थी। पर सच बात तो यह है कि बकरियां उससे ज्यादा खूबसूरत थीं।

'हाउ-हाउ' के उदगम का पता नही चला, पर वह आवाज कान में बराबर गूंजती रही। रंगनाथ ने परसी ब्राउन, कनिंघम आदि को छत पर वैसे ही पड़ा रहने दिया और नीचे उतकर दरवाजे पर आ गया। इस समय वैद्यजी दवाखाने का काम कर रहे थे। चार-छ: मरीजों और सनीचर को छोड़कर वहां और कोई नहीं था। 'हाउ-हाउ' की आवाज अब बिल्कुल नुक्कड़ पर आ गयी थी।

रंगनाथ ने सनीचर से पूछा "यह सुन रहे हो?"

सनीचर चबूतरे पर बैठा हुआ कुलहाड़ी में बेंट जड़ रहा था। उसने अपनी जगह से घूमकर हवा की ओर कान उठाया और कुछ क्षणों तक 'हाउ-हाउ' सुनता रहा। अचानक उसके माथे से चिन्ता की झुर्रियां खत्म हो गयीं। उसने इत्मीनान से कहा,"हां, कुछ 'हाउ-हाउ' जैसा सुनायी तो दे रहा है। लगता है, छोटे पहलवान से कुसहर की फ़िर लड़ाई हुई है।"

यह बात उसने इस अन्दाज से कही जैसे किसी भैंस ने दीवार में सींग रगड़ दिये हों। वह घूमकर फ़िर अपने प्रारम्भिक आसन से बैठ गया और बसूले से कुलहाड़ी कें बेंट को पतला करने लगा।

अचानक 'हाउ-हाउ' सामने आ गया। वह लगभग साठ साल का एक बुड्ढा आदमी था। देह से मजबूत। नंगे बदन। पहलवानी ढंग से घुटनों तक धोती बांधे हुए। उसके सिर पर तीन चोटें थी और तीनों से अलग-अलग दिशाओं में खून बहकर दिखा रहा था कि यह एक तरफ़ का खून भी आपस में मिलना पसन्द नहीं करता। वह जोर-जोर से 'हाउ-हाउ' करता हुआ, दोनो हाथ उठाकर हमदर्दी की भीख मांग रहा था।

रंगनाथ खून का दृश्य देख कर घबरा गया। सनीचर से उसने पूछा,"ये? ये कौन है?इन्हें किसने मारा?"

सनीचर ने कुल्हाड़ी का बेट और बसूला धीरे से जमीन पर रख दिया। घायल बुजुर्ग को उसने हाथ पकड़ कर चबूतरे पर बैठाया। बुजुर्ग ने असहयोग के जोश में उसका हाथ झटक दिया, पर बैठने से इन्कार नहीं किया। सनीचर ने आंखे सिकोड़कर उनके घांव का मुआइना किया और फ़िर वैद्यजी की ओर होंठ बिदकाकर इशारे से बताया कि घाव गहरे नहीं है। उधर बुजुर्ग का 'हाउ-हाउ' अब द्रुत लय छोड़कर विलम्बित की तरफ़ आने लगा और बाद में बड़े ही ठस किस्म की ताल में अटक गया। ऎसी बात गायकी की पद्धति के हिसाब से उल्टी पड़ती थी, पर मतलब साफ़ था कि वे उखड़ नहीं रहे हैं बल्कि जमकर बैठ रहे हैं। सनीचर ने सन्तोष की सांस ली, जिसे दूर-दूर तक लोगों ने सुना ही नहीं, देख भी लिया।

रंगनाथ हक्का-बक्का खड़ा था। सनीचर ने एक अलमारी से रुई निकालते हुए कहा,"तुम पूछते हो, इन्हें किसने मारा?यह भी कोई पूछने की बात है?"

एक लोटे में पानी और रुई लेकर वह बुजुर्ग के पास पहुंचा और वहीं से बोला,"इन्हें और कौन मारेगा? ये छोटे पहलावान के बाप है। उसे छोड़कर किस साले मे दम है कि इनको हाथ लगा दे?"

शायद छोटे पहलवान की इस प्रशंसा से कुसहर के-जिनका पूरा नाम कुसहरप्रसाद था- मन को कुछ शान्ति पहुंची। वही से वे वैद्यजी से बोले,"महाराज, इस बार तो छोटुआ ने मार ही डाला। अब मुझे बरदाश्त नही होता। हमारा बंटवारा कर दो, नहीं तो आगे कभी मेरे ही हाथों उसका खून हो जायेगा।"

वैद्यजी तख्त से उतरकर चबूतरे तक आये। घाव को देखकर अनुभवी आदमियों की तरह बोले,"चोट बहुत गहरी नही जान पड़ती। यहां की अपेक्षा अस्पताल जाना ही उचित होगा। वहीं जाकर पट्टी-वट्टी बंधवा लो।" उसके बाद उपस्थित लोगों को
संबोधित करते हुये बोले,"छोटे का आज से यहां आना बन्द! ऐसे नारकीय लोगों के लिए यहां स्थान नहीं है।"

रंगनाथ का खून उफ़नाने लगा। बोला,"ताज्जुब है, इस तरह के लोगों को बद्री दादा अपने पास बैठालते है।"

बद्री पहलवान धीरे से घर के बाहर आ गये। लापरवाही से बोले,"पढे़-लिखे आदमी को समझ-बूझकर बोलना चाहिए। क्या पता किसका कसूर है? ये कुसहर भी किसी से कम नहीं है। इनके बाप गंगादयाल जब मेरे थे तो यह उनकी अर्थी तक नहीं निकलने दे रहे थे। कहते थे कि घाट तक घसीटकर डाल आयेगे।"

कुसहरप्रसाद ने एक बार फ़िर बड़े कष्ट से 'हाउ-हाउ' कहां, जिसका अर्थ था कि बद्री ऎसी बात कहकर बड़ा अत्याचार कर रहे हैं। फ़िर वे अचानक उठकर खड़े हो गये और दहाड़कर बोले,"बैद महाराज, अपने लड़के को रोको। ये सब इसी तरह की बातें कहकर एकाध लाशें गिरवाने पर तुले हैं। इन्हें चुप करों, नही तो खून हुए बिना नही रहेगा। अस्पताल तो मै बाद में जाऊंगा, पहले मैं थाने पर जा रहा हूं। छोटुआ को इस बार अदालत का मुंह न दिखाया तो गंगादयाल की नही,दोगले की औलाद कहना। मैं तो यहां तुम्हें सिर्फ़ घाव दिखाने आया था। देख लो बैद महाराज, यह खून बह रहा है अच्छी तरह देख लो तुम्हीं को गवाही में चलना पड़ेगा।

वैद्यजी ने घाव देखने की इच्छा नहीं दिखायी। वे अपनें मरीजों की ओर देखने लगे। साथ ही प्रवचन देने लगे कि पारस्परिक कलह शोक का मूल है। यह कहते हुए, उदाहरण देने के लिए, वे झपटकर इतिहास के कमरें में घुसे और यही कहते हुए पुराण के रोशनदान से बाहर कूद आये।पारस्परिक कलह को शोक का मूल साबित करके उन्होनें कुसहर को सलाह दी कि थाना-कचहरी के चक्कर में न पड़ना चाहिए। उसके बाद वे दूसरे प्रवचन पर आ गये। जिसका विषय था कि थाना-कचहरी भी शोक का मूल हैं।

कुसहर ने दहाड़कर कहा,"महाराज, यह ज्ञान अपने पास रखो। यहां खून की नदी बह गयी और तुम हम पर गांधीगीरी ठांस रहे हो। यदि बद्री पहलवान तुम्हारी छाती पर चढ़ बैठे तो देखूंगा, इहलोक बांचकर कैसे अपने मन को समझाते हो!"

वैद्यजी की मूंछे थरथरायी, जिससे लगा कि वे अपमानित हुए है। पर उनके मुंह पर मुस्कान छिटक गयी, जिससे लगा कि वे अपमानित होना नहीं जानते। उपस्थित लोगों के चेहरे खिंच गये और साफ़ जाहिर हो गया कि कुसहर को अब यहां हमदर्दी की भीख नही मिलेगी। बद्री पहलवान ने दुत्कारकर कहा,"जाओ, जाओ!लगता है, छोटुआ से लड़कर लड़ास पूरी नही हुई हैं। जाकर पट्टी-वट्टी बंधवा लो। यहां बहुत न टिलटिलाओ।"

छोटे पहलवान, जैसाकि अब तक जाहिर हो चूका होगा, खानदानी आदमी थे। उन्हें अपने परदादा तक का नाम याद था और हर खानदानी आदमी की तरह वे उनके किस्से बयान किया करते थे। कभी-कभी अखाड़े पर वे अपने साथियों से कहते:

"हमारे परदादा का नाम भोलानाथ था। उन्हें बड़ा गुस्सा आता था। नथुने हमेशा फ़ड़का ही करते थे। रोज सवेरे उठकर वे पहले अपने बाप से टुर्र-पुर्र करते थे, तब मुहं में पानी डालते थे। टुर्र-पुर्र न होती तो उनका पेट गड़गड़ाया करता।"

छोटे पहलवान की बातों से अतीत का मोह टपकता था। उनके किस्से सुनते ही उन्नीसवी सदी के किसी गांव की तस्वीर सामने आ जाती थी, जिसमें गाय-बैलों से भरे-पूरे दरवाजे पर, गोबर और मूत की ठोस खुशबू के बीच,नीम की छांव तले, जिस्म पर टपकी हुई लसलसी निमकौड़िया झाड़ते हुए दो महापुरुष नंगे बदन अपनी-अपनी चारपाईयों से उठ बैठते थे और उठते ही एक-दूसरे को देर तक सोते रहने के लिए गाली देने लगते थे। दो में एक बाप होता था, एक बेटा। फ़िर दोनो एक-दूसरे को जमीन में जिन्दा गाड़ देने की बात करते हुए अपनी-अपनी चारपाइयां छोड़ देते और मुख्य विषय से दूर जाकर, दो-चार अनर्गल बातें कहकर, अपने-अपने काम में लग जाते। एक बैलो की पूंछ उमेठता हुआ अपने खेतों की ओर चला जाता, दूसरा भैंस चराने के लिए दूसरों के खेतों की ओर चला जाता।

छोटे पहलवान इसी तरह का कोई किस्सा खत्म करके बाद मे कहते,"अपने बाप के मर जाने पर बाबा भोलानाथ बहुत दुखी हुए....।"

छोटे पहलवान ये बातें शेखी बघारने के लिए नहीं कहते थे। ये बिल्कुल सच थी। उनका खानदान ही ऎसा था। उनके यहां बाप-बेटे में हमेशा से बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध चला आ रहा था। प्रेम करना होता तो एक-दूसरे से प्रेम करते,लाठी चलाना होता तो एक-दूसरे पर लाठी चलाते। जो भी अच्छा-बुरा गुण उनके हाथ में था उसकी आजमाइश एक-दूसरे पर ही किया करते।

बाबा भोलानाथ अपने बाप के मर जाने पर सचमुच ही बहुत दुखी हुए। उनके जीवन में एक रीतापन आ गया। उनके न रहने पर सबेरे से ही किसी से झगड़ा करने के लिए उनका पेट गड़गड़ाने लगता। मुंह में पानी डालने का मन न होता। दिन-रात
खेतों पर बैल की तरह जुते रहने पर भी उन्हें अपच की शिकायत रहने लगी। अब उनके लड़के गंगादयाल उनके काम आये। कहा भी है कि लड़का बुढ़ापे में आंख की ज्योति होता है। तो गंगादयाल ने एक दिन सत्रह साल की उमर में ही अपने बाप
भोलानाथ को इतने जोर से लाठी मारी कि वे वहीं जमीन पर गिर गये, उनकी आंखे कौड़ी-जैसी निकल आयीं और उनकी आंखों के सामने ज्योति की वर्षा होने लगी।

उसके बाद बाप-बेटे का सम्बन्ध हमेशा के लिए सुस्थिर हो गये। भोलानाथ अपने बाप की जगह पर आ गये और उनकी जगह गंगादयाल ने ले ली। कुछ दिनों बाद हाथ-पांव-पीठ दर्द रहने के कारण उनका अपच तो ठीक हो गया, पर उनके कानों में बराबर सांय-सांय सी होने लगी। शायद कान के पर्दो को फ़ाड़नेवाली गंगादयाल की गालियां सुनते-सुनते उनके कानो में एक स्थायी अनुगुंज बस गयी थी। जो भी हो, अब सबेरे-सबेरे घर में टुर्र-पुर्र करने के लिए गंगादयाल का पेट गड़गड़ाने लगा।

गंगादयाल के लड़के कुसहरप्रसाद छोटू पहलवान के बाप थे। कुसहरप्रसाद स्वभाव से गम्भीर थे, इसलिए वे गंगादयाल से व्यर्थ गाली-गलौज नहीं करते थे। उन्होनें रोज सवेरे खेतों पर जाने से पहले अपने बाप से झगड़ा करने की परम्परा भी खत्म कर दी। इसकी जगह उन्होनें मासिक रुप से युद्ध करने का चलन चलाया। बचपन से ही गंगादयाल को फ़ूहड़ गालियां देने में ऎसी दक्षता प्राप्त हो गयी थी कि नौजवान गंजहे उनके पास शाम को आकर बैठने लगे थे। वे उनकी मौलिक गालियों को सुनते और बाद में उन्हें अपनी बनाकर प्रचारित करते। गालियों और ग्राम गीतों का कापीराइट नही होता। इस हिसाब से गंगादयाल की गालियां हजार कण्ठों से ह्जार पाठान्तरों के साथ फ़ूटा करती थीं। पर कुसहरप्रसाद अपने बाप की इस प्रतिभा से ज्यादा प्रभावित नहीं हुए। चुपचाप उनकी गालियां सुनते रहते और महीने में एक बार उन पर दो-चार लाठियां झाड़कर फ़िर अपने काम में लग जाते। यह पद्धति अपच की पारिवारिक बीमारी के लिए बड़ी लाभप्रद साबित हुई, क्योकिं खानदान में अपच की शिकायत गंगादयाल के साथ ही खत्म हो गयी।

कुसहरप्रसाद के दो भाई थे। एक बड़कऊ और एक छोटकऊ। बड़कऊ और छोटकऊ शान्तिप्रिय और निरस्त्रीकरण के उपासक थे। उमर-भर उन्होनें कभी कुत्ते पर लाठी नही उठायी। बिल्लियां स्वच्छन्दतापूर्वक उनका रास्ता काट जाती थीं,पर उन्होनें कभी उन्हें ढेला तक नहीं मारा। उन्होंने अपने बाप से गाली देने की कला सीख ली थी और उसके सहारे रोज शाम को सभी पारिवारिक झगड़ों को बिना किसी मार-पीट के सुलझाया करते थे। रोज शाम को दोनो भाइयों और उनकी औरतों में कांव-कांव शुरु होता और बैठक रात के दस बजे तक चलती। इस प्रकार से इन बैठकों का महत्व सुरक्षा-समिति की बैठकों का-सा था जहां लोग कांव-कांव करके युद्ध की स्थिति को काफ़ी हद तक टालने में मदद करते हैं।

इस दृष्टि से रोज शाम को कुसहरप्रसाद के खानदान में उठनेवाले कोहराम को गिरी निगाह से देखना प्रतिक्रियावाद की निशानी होगी; पर पास-पड़ोसवालों का राजनीतिक बोध इतना विकसित न था। अत: जैसे शाम को छोटकऊ और बड़कऊ की गालियां व हाहाकार गाली के कुत्तों की भूंक-भांक के ऊपर उठकर शिवपालगंज के आसमान में बर्छियां-सी चुभोने लगते, पड़ोसियों की आलोचनायें शुरु हो जाती।

"अब यह कुकरहाव आधी रात तक चलेगा।"

"किसी दिन एक फ़टा जूता लेकर इन पर पिल पड़ा जाये, तभी काम बनेगा।"

"इनकी जुबान को संग्रहणी लग गयी है। चलती है तो चलती ही रहती है।"

'कुकरहाव' गंजही बोली का शब्द है। कुत्ते आपस में लड़ते है और एक-दूसरे को बढा़वा देने के लिए शोर मचाते हैं। उसी को कुकरहाव कहते हैं।

शब्द-शास्त्र के इस पेंच को देखते हुए छोटकऊ और बड़कऊ के वार्त्तालाप को कुकरहाव कहना गलत होगा। सच तो यह है कि वे दोनों-सपत्नीक-बंदरहाव करते थे।

वे बन्दरों की तरह खों-खों करते हुए एक-दूसरे पर झपटते, फ़िर बिना किसी के रोक हुए, अपने-आप रुक जाते। अगर उस समय कोई बाहरी आदमी रुककर उनकी ओर देखने लगता या शान्ति के फ़ाख्ते की तजवीज करता, तो दोनों खों-खों करते हुए
एक साथ उसी पर झपट पड़ते। बंदरहाव के ये नियम सभी गजहों को मालूम थे: इसलिए छोटकऊ बड़कऊ की पारिवारिक बैठकों की समीक्षाएं छिपे-छिपे होती थी और उधर वे बैठके निबाध रूप से आधी रात तक चला करती थीं।

छोटे पहलवान के पिता कुसहरप्रसाद अपने भाइयों के वाग्विलास को न समझ पाते थे। जैसे बताया गया, वे कम बोलनेवाले कर्मशील आदमी थे। रह-रहकर चुपचाप किसी को मार बैठना उनके स्वभाव की अपनी विशेषता थी, जो इन आदमियों के
जीवन-दर्शन से मेल नहीं खाती थी। इसलिए, अपने बाप गंगादयाल के मरने पर, कुछ साल बाद, वे अपने भाइयों से अलग हो गये: अर्थात बिना बोले हुए, लाठी के जोर से उन्होने अपने भाइयों को घर के बाहर खदेड़ा, उन्हें एक बाग में झोपड़ी डालकर, वाणप्रस्थ-आश्रम में रहने के लिए ढकेल दिया और खुद अपने नौजवान लड़के के साथ अपने पैतृक घर में पूरी पैतृक परम्पराओं के साथ गृहस्थी चलाने लगे।

महीने में एक बार अपने बाप पर लाठी उठाते-उठाते कुसहरप्रसाद के हाथों की कुछ ऎसी आदत पड़ गयी थी कि गंगादयाल के मर जाने पर उनके हाथ महीनें में दो-चार दिन तक सुन्न रहने लगे। लकवा के खतरे को दूर करने के लिए एक दिन उन्होंने फ़िर लाठी उठायी और छोटे की कमर पर तिरछी करके जड़ दी। छोटे अभी पहलवान नहीं बने थे, पर उनके गांव के पास रेलवे लाइन थी। उसके किनारे तार के खम्भे थे, खम्भों पर सफ़ेद-सफ़ेद इंसुलेटर लगे थे। उनके तोड़ते-तोड़ते केवल अभ्यास की बदौलत, छोटे के ढेले का निशान छोटी उम्र में ही अचूक हो गया था। जिस दिन कुसहरप्रसाद ने छोटे की कमर पर लाठी मारी, उसी दिन छोटे ने एक खम्भे के सभी इंसुलेटर रेलवे के द्धारा दिये गये पत्थरों से तोड़कर रेलवे-लाइन के ही किनारे बिछा दिये थे। लाठी खाकर वे रेलवे-लाइन की दिशा में बीस कदम भागे और वही से उन्होंने अपने बाप की खोपड़ी को इंसुलेटर समझकर एक ढेला फ़ेका। बस, उसी दिन से बाप-बेटे में उनके परिवार का सनातन-धर्म प्रतिष्ठित हो गया। फ़िर तो, लगभग हर महीने कुसहर की देह पर घाव का एक छोटा-सा निशान स्थायी ढंग से दिखने लगा और कुछ वर्षो के बाद वे अपने इलाके के राणा सांगा बन गये।

छोटे पहलवान के जवान हो जाने पर बाप-बेटों ने शब्दों का प्रयोग बन्द ही कर दिया। अब वे उच्च कोटि के कलाकारों की तरह अपना अभिप्राय छापों, चिन्हों और बिम्बों की भाषा में प्रकट करने लगे। उनके बीच में मारपीट की घटनाएं भी कम होने लगी और धीरे-धीरे उसने एक रस्म का-सा रुप ले लिया, जो बड़े-बड़े नेताओं की वर्ष-गांठ की तरह साल में एक बार, जनता की मांग हो या न हो, नियमित रुप से मनायी जाने लगी।

कुसहरप्रसाद के चले जाने पर एक आदमी ने चबूतरे के नीचे खड़े-खड़े कहा," इसी को कलजुग कहते है! बाप के साथ बेटा ऎसा सलूक कर रहा है!"

आसमान की ओर आंखें उठाकर, सिर पर फ़ैली हुई नीम की टहनियों में झांकते हुए,उसने फ़िर कहा,"कहां हो प्रभो? अब लोगे कलंकी अवतार?"

जवाब में आकाशवाणी नहीं हुई। एक कौआ तक नहीं बोला। किसी अबाबील ने बीट तक नही की। कलंकी अवतार की याद करनेवाले का चेहरा गिर गया। पर सनीचर ने कुल्हाड़ी के बेंट को परखते हुए तीखी आवाज में कहां,"जाओ, तुम भी कुसहर के
साथ चले जाओ। गवाही में जाकर खड़े हो जाना। रुपया-धेली वहां भी मिल ही जायेगी।"

बद्री पहलवान ने मुस्कराकर इस बात का समर्थन किया। रंगनाथ ने देखा, कलंकी अवतार की याद करनेवाला व्यक्ति एक पुरोहितनुमा बुड्ढा है। पिचके हुए गाल। खिचड़ी दाढ़ी। बिना बटन का कुरता। सिर पर अस्त-व्यस्त गांधीटोपी, जिसके पीछे
चुटिया निकलकर आसमानी बिजली गिरने से शरीर की रक्षा कर रही थी। माथे पर लाल चंदन का टीका। गले मे रुद्राक्ष की माला।

वह आदमी सचमुच ही कुसहरप्रसाद के पीछे चला गया। सनीचर ने कहा,"यही राधेलाल है। आज तक इन्हें बड़े-से-बड़ा वकील भी जिरह करके नही उखाड़ पाया।"

सनीचर के पास एक तमाशबीन खड़ा था। उसने श्रद्धा से कहा, "राधेलाल महाराज को किसी देवता का इष्ट है। झूठी गवाही सटासट देते चले जाते है। वकील टुकर-टुकर देखते रहते है। बड़ों-बड़ों की बोलती बन्द हो जाती है।"

कुछ देर तक राधेलाल की प्रशंसा होती रही। सनीचर और तमाशबीन में लगभग एक बहस-सी हो गयी। सनीचर की राय थी कि राधेलाल बड़ा काइयां है और शहर के वकील बड़े भोदूं हैं, तभी वे उसे जिरह मे नही उखाड़ पाते। उधर तमाशबीन इसे चमत्कार और देवता के इष्ट के रूप में मानने पर तुला था। तर्क और आस्था की लड़ाई हो रही थी और कहने की जरूरत नहीं कि आस्था तर्क को दबाये दे रही थी।

उसी समय छोटे पहलवान बगल एक गली से अकड़ते हुए निकले। वैद्यजी के दरवाजें आकर उन्होने इधर-उधर ताक-झांक की। फ़िर पूछा,"चले गये?"

सनीचर ने कहा,"हां, गये। पर पहलवान, यह पालिसी इन्सानियत के खिलाफ़ है।"

छोटे ने दांत पीसकर कहा,"इन्सानियत की तो ऎसी की तैसी, और तुम्हें क्या कहूं?"

सनीचर कुल्हाड़ी हाथ में लेकर खड़े हो गये। पुकारकर बोले,"बद्री भैया,देखो, तुम्हारा बछेड़ा मुझ पर दुलती झाड़ रहा है। संभालो!"

वैद्यजी छोटे को देखकर उठ खड़े हुए। रंगनाथ से बोले," ऎसे नीच का मुंह देखना पाप है। इसे यहां से भगा दो।" कहकर वे घर के अन्दर चले गये।

छोटे पहलवान बैठक के अन्दर आ गये थे। धूप फ़ैली हुई थी। सामने नीम के पेड़ पर बहुत- से तोते 'टें-टें' करते हुए उड़ रहे थे। चबूतरे पर सनीचर कुल्हाड़ी लिये खड़ा था। बद्री पहलवान एक कोने में चुपचाप खड़े मुगदर की जोड़ी तौल रहे थे। रंगनाथ वैद्यक की किसी किताब के पन्ने उलट रहा था। छोटे को लगा कि उसके खिलाफ़ विद्रोह की हवा फ़ैली हुई है। जवाब मे वे सीना फ़ुलाकर धचक के साथ रंगनाथ के पास बैठ गये और जबड़े घूमा-घूमाकर मुंह के अन्दर पहले से सुरक्षित सुपारी की जुगाली करने लगे।

छोटे ने रंगनाथ को यों देखा जैसे उनकी निगाह के सामने कोई भुनगा उड़ रहा हो। उखड़ी हुई आवाज में जवाब दिया,"यह बात है तो मैं जाता हू। मैं तो बद्री गुरू का घर समझकर आया हूं। अब तुम्हीं लोगो की हुकूमत है, तो यहां पेशाब करने भी नहीं आऊगां।"

रंगनाथ ने हंसकर बात को हल्का करना चाहा। कहा,"नहीं, नहीं, बैठो पहलवान। दिमाग गरम हो रहा हो तो एक ठण्डा पानी पी लो।"

फ़िर उसी तरह उखड़ी आवाज में छोटे ने कहा,"पानी! मैं यहा टट्टी तक के लिए पानी नहीं लूंगा। सब लोग मिलकर चले है हमको लुलुहाने।"

बद्री ने अब छोटे की ओर बड़प्पन के निगाह से देखा और एक मुगदर को बायें हाथ से तौला। देखते-देखते मुस्कराये। बोले,"गुस्सा तो कमजोरी का काम है। तुम क्यों ऎठ रहे हो? आदमी हो कि पायजामा?"

छोटे पहलवान समझ गये कि उस कोने से उन्हें सहारा मिल रहा है। अकड़ दिखाते हुए बोले,"मुझे अच्छा नही लगा बद्री गुरू! सभी दमड़ी जैसी जान लिये हुये मुझॆ लुलुहाते घूम रहे है। कहते है, बाप को क्यों मारा! बाप को क्यों मारा!! लगता है कुसहरप्रसाद शिवपालगंज में सबके बाप ही लगते है। जैसे मैं ही उनका एक दुश्मन हूं।"

छोटे पहलवान और भी उखड़ गये। बोले,"गुरू साला बाप-जैसा बाप हो, तब तो एक बात भी है।" थोड़ी देर सब चुप रहे।"

रंगनाथ छोटे पहलवान की चढ़ी हुई भौहों को देखता रहा। सनीचर भी अब तक बैठक मे आ गया था। समझाते हुए बोला,"ऎसी बात मुंह से न निकलानी चाहिए। धरती-धरती चलो। आसमान की छाती न फ़ाड़ो। आखिर कुसहर ने तुम्हें पैदा किया है,पाला-पोसा है।"

छोटे ने भुनभुनाकर कहां,"कोई हमने इस्टाम्प लगाकर दरखास्त दी थी कि हमें पैदा करो! चले साले कही के पैदा करनेवाले!"

बद्री चुपचाप यह वार्तालाप सुन रहे थे। अब बोले,"बहुत हो गया छोटे, अब ठण्डे हो जाओ।"

छोटे अनमने होकर बैठे रहे। नीम के पेड़ पर होनेवाली तोतों 'टॆ-टे' सुनते रहे। आखिर में एक सांस खीचकर बोले,"तुम भी मुझी को दबाते हो गुरू! तुम जानते नही, यह बुड्ढा बड़ा कुलच्छनी है। इसके मारे कहारिन ने घर में पानी भरना बन्द कर दिया है। और भी बताऊं? अब क्या बताऊं. कहते जीभ गन्धाती है।"

लेखक: श्रीलाल शुक्ल
टंकण सहयोग: कु. शहनाज़
अध्याय:
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Saturday, December 23, 2006

10. क्या यही इन्सानियत है?

छंगामल विद्यालय इण्टर कालेज की स्थापना 'देश के नव-नागरिकों को महान आदर्शो की ओर प्रेरित करने एवं उन्हें उत्तम शिक्षा देकर राष्ट्र का उत्थान करने हेतु' हुई थी। कालिज का चमकीले नारंगी कागज पर छपा हुआ 'संविधान एवं नियमावली' पढ़कर यथार्थ की गन्दगी में लिपटा हुआ मन कुछ वैसा ही निर्मल और पवित्र हो जाता था जैसे भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का अध्याय पढ़कर।

क्योंकि इस कालिज की स्थापना राष्ट्र के हित मे हुई थी, इसलिए, उसमें और कुछ हो या नहीं, गुटबन्दी काफ़ी थी। वैसे गुटबन्दी जिस मात्रा में थी, उसे बहुत बढ़िया नहीं कहा जा सकता था; पर जितने कम समय में वह विकसित हुई, उसे
देखकर लगता था काफ़ी अच्छा काम हुआ है। वह दो-तीन साल ही में पड़ोस के कालिजों की गुटबन्दी की अपेक्षा ज्यादा ठोस दिखने लगी थी। बल्कि कुछ मामलों में तो वह अखिल भारतीय संस्थाओ तक का मुकाबला करने लगी थी।

प्रबन्ध-समिति में वैद्यजी का दबदबा था, पर रामाधीन भीखमखेड़वी अब तक उसमें अपना गुट बना चुके थे। इसके लिए उन्हें बड़ी साधना करनी पड़ी। काफ़ी दिनों तक वे अकेले ही अपने गुट बने रहे, बाद में एकाध मेम्बर भी उनकी ओर खिंचे। अब बड़ी मेहनत के बाद कालिज के नौकरों मे दो गुट बन गये थे, पर उनमें अभी बहुत काम होना था। प्रिंसिपल साहब तो वैद्यजी पर पूरी तरह आश्रित थे, पर खन्ना मास्टर अभी उसी तरह रामाधीन के गुट पर आश्रित नही हो पाये थे। उन्हें खींचना बाकी था। लड़कों में भी अभी दोनों गुटो का हमदर्दी के आधार पर अलग-अलग गुट नहीं बने थे। उनमें आपसी गाली-गलौज और मारपीट होती तो थी, पर इन कार्यक्रमों को अभी तक उचित दिशा नहीं मिल पाती थी। गुटबन्दी के उद्देश्य से न होकर ये काम व्यक्तिगत कारणों से होते थे और इस तरह लड़कों की गुण्डागर्दी की शक्ति व्यक्तिगत स्वार्थो पर नष्ट होती जाती थी, उसका
उपयोग राष्ट्र के सामूहिक हित में नही होता रहा था। गुटबन्दों को अभी इस दिशा में भी बहुत काम करना था।

यह सही है कि वैद्यजी को छोड़कर कालिज के गुटबन्दों में अभी अनुभव की कमी थी। उनमें परिपक्वता नहीं थी, पर प्रतिभा थी। उसका चमत्कार साल में एकाध बार जब फूटता, तो उसकी लहर शहर तक पहुचती। वहां कभी-कभी ऎसे दांव भी चले
जाते जो बड़े-बड़े पैदायशी गुटबन्दों को भी हैरानी में डाल देते। पिछले साल रामाधीन ने वैद्यजी पर एक ऎसा ही दांव फ़ेका था। वह खाली गया, पर उसकी चर्चा दूर-दूर तक हुई। अखबारों में जिक्र आ गया। उससे एक गुटबन्द इतना प्रभावित हुआ कि वह शहर से कालिज तक सिर्फ़ दोनों गुटों की पीठ ठोकनें को दौड़ा चला आया। वह एक सीनियर गुटबन्द था और अक्सर राजधानी में रहता था। पिछले चालीस साल से वह अपने चौबीसों घण्टे केवल गुटबन्दी के नाम अर्पित किये हुए था। वह अखिल भारतीय स्तर का आदमी था और उसके बयान रोज अखबार में पहले पन्नों पर छपते थे, जिसमें देश-भक्ति और गुटबन्दी का अनोखा संगम होता था। उसके एक बार कालिज में आ चुकने के बाद लोगों को इत्मीनान हो गया था कि यहां अब कालिज भले ही खत्म हो जाय, गुटबन्दी खत्म नहीं होगी।

सवाल है: गुटबन्दी क्यों थी?

यह पूछना वैसा ही है जैसे पानी क्यों बरसता है? सत्य क्यों बोलना चाहिए? वस्तु क्या है और ईश्वर क्या हैं? वास्तव में यह एक सामाजिक मनोवैज्ञानिक यानी लगभग दार्शानिक सवाल है। इसका जवाब जानने के लिए दर्शन-शास्त्र जानने की जरुरत है और दर्शन-शास्त्र जानने के लिए हिन्दी का कवि या कहानीकार होने की जरुरत है।

सभी जानते है कि हमारे कवि और कहानीकार वास्तव में दार्शनिक है और कविता या कथा-साहित्य तो वे सिर्फ़ यूं ही लिखते है। किसी भी सुबुक-सुबुकवादी उपन्यास में पढ़ा जा सकता है कि नायक ने नायिका के जलते हुए होंठो पर होंठ रखे और कहा," नहीं-नहीं निशी, मै उसे नहीं स्वीकार कर सकता। वह मेरा सत्य नही है। वह तुम्हारा अपना सत्य है।"

निशी का ब्लाउज जिस्म से चूकर जमीन पर गिर जाता है। वह अस्फ़ुट स्वर में कहती है,"निक्कू, क्या तुम्हारा सत्य मेरे सत्य से अलग है?"

इसी को 'ठांय' कहते है। इसी के साथ निशी और निक्कू फ़िलासफ़ी की हजार मीटरवाली दौड़ मे निकल पड़ते हैं। अब निशी की ब्रा भी जमीन पर गिर जाती है, निक्कू की टाई और कमीज हवा में उड़ जाती है। गिरते-पड़ते, एक-दूसरे पर लोटते-पोटते वे मैदान के दूसरे छोर पर लगे हुए फ़ीते को सत्य समझकर किसी तरह यहां पहुचते है, तब पता चलता है, वह सत्य नही है। फ़िर संयोग-श्रंगार, जलते हुए होंठ। फ़िलासफ़ी की मार। थोड़ी ही देर में वे मैदान छोड़ कर जंगल में आ जाते हैं और पत्थरों से छिलते हुए, कांटो से बिंधे नंगे बदन,झांक-झांककर प्रत्येक झाड़ी में देखते हैं और इस तरह नंगापन सुबुक-सुबुक, चूमाचाटी, व्याख्यान आदि के महौल में उस खरगोश का पीछा करते रहते है जिसका कि नाम सत्य है।

यह फ़िलासफ़ी लगभग सभी महत्वपूर्ण काव्यों और कथाओं में होती है और इसीलिए ठीक नहीं की इस उपन्यास के पाठक भी काफ़ी देर से फ़िलासफ़ी के एक लटके का इन्तजार कर रहे हों और सोच रहे हों, हिन्दी का यह उपन्यास इतनी देर से और
सब तो कह रहा है, फ़िलासफ़ी क्यों नहीं कहता? क्या मामला है? यह फ्राड तो नही है?

यह सही है कि 'सत्य','अस्तित्व' आदि शब्दों के आते ही हमारा कथाकार चिल्ला उठता है,"सुनो भाइयों यह किस्सा-कहानी रोककर मैं थोड़ी देर के लिए तुमको फ़िलासफ़ी पढ़ाता हूं, ताकि तुम्हें यकीन हो जाय कि वास्तव में मैं फ़िलासफ़र था, पर बचपन के कुसंग के कारण यह उपन्यास (या कविता) लिख रहा हूं। इसलिए हे भाइयो, लो, यह सोलह पेजी फ़िलासफ़ी का लटका; और अगर मेरी किताब पढ़ते-पढ़ते तुम्हें भ्रम हो गया हो कि मुझे औरों-जैसी फ़िलासफ़ी नहीं आती, तो उस भ्रम को इस भ्रम से काट दो.......।"

तात्पर्य यह है, क्योंकि फ़िलासफ़ी बघारना प्रत्येक कवि और कथाकार के लिए अपने-आपमें एक'वैल्यु'है,क्योंकि मैं कथाकार हूं, क्योंकि 'सत्य','अस्तित्व' आदि की तरह 'गुटबंदी'-जैसे एक महत्वपूर्ण शब्द का जिक्र आ चुका है, इसलिए सोलह प्रष्ठ के लिए तो नहीं, पर एक-दो प्रष्ठ के लिए अपनी कहानी रोककर मैं भी पाठकों से कहना चाहूंगा कि सुनो-सुनो हे भाइयों, वास्तव में तो मैं एक फ़िलासफ़र हूं, पर बचपन के कुसंग के कारण...।

वेदान्त के अनुसार- जिसका हवाला वैद्यजी आयुर्वेद के पर्याय के रुप में दिया करते थे - गुटबन्दी परात्मानुभूति की चरम दशा का एक नाम है। उसमें प्रत्येक 'तू','मैं' को और प्रत्येक 'मैं','तू'-को अपने से ज्यादा अच्छी स्थिति में देखता है। वह उस स्थिति को पकड़ना चाहता है। 'मैं' 'तू' और 'तू' 'मैं' को मिटाकर 'मैं' की जगह 'तू' और 'तू' की जगह 'मैं' बन जाना चाहता है।

वेदान्त हमारी परम्परा है और चूकिं गुटबन्दी का अर्थ वेदान्त से खीचा जा सकता है, इसलिए गुटबन्दी भी हमारी परम्परा है, और दोनों हमारी सांस्क्रतिक परम्पराएं हैं। आजादी मिलने के बाद हमने अपनी बहुत-सी सांस्क्रतिक परम्पराओं को फ़िर से खोद कर निकाला है। तभी हम हवाई जहाज से यूरोप जाते हैं, पर यात्रा का प्रोग्राम ज्योतिषी से बनवाते है; फ़ांरेन ऎक्सचेंज और इनकमटैक्स की दिक्कते दूर करने के लिए बाबाओं का आशीर्वाद लेते हैं स्काच व्हिस्की पीकर भगन्दर पालते हैं और इलाज के लिए योगाश्रमों में जाकर सांस फ़ुलाते है, पेट सिकोड़ते है। उसी तहर विलायती तालीम में पाया हुआ जनतन्त्र स्वीकार करते है और उसको चलाने के लिए अपनी परम्परागत गुटबन्दी का सहारा लेते है। हमारे इतिहास में-चाहे युद्धकाल रहा हो, या शान्तिकाल-राजमहलों से लेकर खलिहानों तक गुटबन्दी द्रारा 'मैं' को 'तू' और 'तू' को 'मैं' बनाने की शानदार परम्परा रही है। अंग्रेजी राज्य में अंग्रेजों को बाहर भगाने के झंझट में कुछ दिनों के लिए हम उसे भूल गये थे। आजादी मिलने के बाद अपनी और परम्पराओं के साथ इसको भी हमने बढ़ावा दिया है। अब हम गुटबन्दी को तू-तू, मैं-मैं, लात जूता साहित्य और कला आदि सभी पद्धतियों से आगे बढ़ा रहे हैं। यह हमारी सांस्क्रतिक आस्था है। यह वेदान्त को जन्म देनेवाले देश की उपलब्धि है। यही, संक्षेप में, गुटबन्दी का दर्शन, इतिहास और भूगोल है।

इन मूल कारणों के साथ कालिज में गुटबन्दी का एक दूसरा कारण लोगों का यह विचार था कि कुछ होते रहना चाहिए। यहां सिनेमा नही है, होटल नहीं है, काफ़ी-हाउस नही, मारपीट, छुरेबाजी, सड़क की दुर्घटनाएं, नये-नये फ़ैशनों की लड़कियां, नुमायशे गाली-गलौजवाली सार्वजनिक सभाएं-ये भी नही है। लोग कहां जाये? क्या देखे? क्या सुनें इसलिए कुछ होते रहना चाहिए।

चार दिन हुए, कालिज में एक प्रेम-पत्र पकड़ा गया था जो एक लड़के ने लकड़ी को लिखा था। लड़के ने चालाकी दिखाई थी; पत्र पढ़ने से लगता था कि वह सवाल नहीं, लड़की के पत्र का जवाब है; पर चालाकी कारगर नहीं हुई। लड़का डांटा गया, पीटा
गया, कालिज से निकाला गया, फ़िर उसके बाप के इस आश्वासन पर कि लड़का दोबारा प्रेम न करेगा, और इस वादे पर कि कालिज के नये ब्लाक के लिए चालीस हजार ईंटे दे दी जायेंगी, कालिज में फ़िर से दाखिल कर लिया गया, कुछ हुआ भी तो
उसका असर चार दिन से ज्यादा नहीं रहा। उससे पहले एक लड़के के पास देसी कारतूसी तमंचा बरामद हुआ था। तमंचा बिना कारतूस का था और इतना भोंडा बना था कि इस देश के लोहारों की कारीगरी पर रोना आता था। पर इन कमजोरियों के होते हुए भी कालिज में पुलिस आ गयी और लड़के को और वैद्यजी का आदमी होने के बावजूद क्लर्क साहब को, लेकर थाने पर चली गयी। लोग प्रतीक्षा करते रहे कि कुछ होने वाला है और लगा कि चार-छ: दिन तक कुछ होता रहेगा। शाम तक पता चला कि जो निकला था वह तमंचा नही था, बल्कि लोहे का एक छोटा-सा टुकड़ा था, और क्लर्क साहब थाने पर पुलिस के कहने से नहीं बल्कि अपने मन से तफरीह करने के लिए चले गये थे और लड़का गुण्डागिरी नहीं कर रहा था बल्कि बांसुरी बहुत अच्छी बजाता था। शाम को जब क्लर्क तफ़रीह करता हुआ और लड़का बांसुरी बजाता हुआ थाने से बाहर निकला, तो लोगों की तबीयत गिर गयी। वे समझ गये कि यह तो कुछ भी नहीं हुआ और उनके सामने फ़िर वही शाश्वत प्रश्न पैदा हो गया: अब क्या हो?

इस वातावरण में लोगों की निगाह प्रिंसिपल साहब और वैद्यजी पर पड़ी थे। वैद्यजी तो अपनी जगह मदनमोहन मालवीय-शैली की पगड़ी बांधे हुए इत्मीनान से बैठे थे, पर प्रिंसिपल साहब को देखकर लगता था कि वे बिना किसी सहारे के बिजली के खम्भे पर चढे़ हुए और दूर से ही किसी को देखकर चीख रहे है:'देखो,देखो, वह कोई शरारत करना चाहता है।' उनकी निगाह में सन्देह था और अपनी जगह पर चिपके हुए प्रत्येक भारतवासी का भय था कि कोई हमें खींचकर हटा न दे। लोग कमजोरी ताड़ गये और उनको, और उसी लपेट में वैद्यजी को लुलुहाने लगे। उधर वे लोग भी मार न पड़ जाये, इस डर से पहले ही मारने पर आमादा हो गये।

उन्हीं दिनों एक दिन खन्ना मास्टर को किसी ने बताया कि हर कालिज के सबसे बड़े लेक्चरार थे। इसे धोखे में वे एक दिन वैद्यजी से कह आये कि उन्हें वाइस प्रिंसिपल बनाया जाना चाहिए। वैद्यजी ने सिर हिलाकर कहा कि यह एक नवीन विचार है, नवयुवकों को नवीन चिन्तन करते ही रहना चाहिए, उनके प्रत्येक नवीन विचार का मै स्वागत करता हूं, पर यह प्रश्न प्रबन्ध-समिति के देखने का है, उसकी अलग बैठक में यदि यह प्रश्न आया तो इस पर समुचित विचार किया जाया जायेगा। खन्ना मास्टर ने यह नही सो्चना कि प्रबन्ध-समिति के अगली बैठक कभी नहीं होती। उन्होनें तत्काल वाइस प्रिंसिपल का पद पाने के
लिए एक दरख्वास्त लिखी और प्रिंसिपल को इस प्रार्थना के साथ दे दी कि इसे प्रबन्ध-समिति की अगली बैठक में पेश कर दिया जायॆ।

प्रिसिपल साहब खन्ना मास्टर की इस हरकत पर हैरान रह गये। उन्होंने वैद्यजे से जाकर पूछा,"खन्ना को यह दरख्वास्त देने की सलाह आपने दी है?"

इसका उत्तर वैद्यजी ने तीन शब्दों में दिया,"अभी नवय॔वक हैं।" इसके बाद कुछ दिनों तक प्रिंसिपल साहब शिवपालगंज के रास्ते पर मिलने वाले हर आदमी से प्राणिशास्त्री का यह कथन बताते रहे कि आजकल के लोग न जाने कैसे हो गये है। खन्ना मास्टर की इस हरकत का वर्णन वे 'मुहं में राम बगल में छूरी','हमारी ही पाली लोमड़ी, हमारे ही घर में हुआ-हुआ'(यद्यपि लोमड़ी 'हुआ-हुआ' नहीं करती),'पीठ में छुरा भोंकना','मेंढक को जुकाम हुआ है' जैसी कहावतों के सहारे करते रहें। एक दिन उन्होंने चौराहे पर खड़े होकर प्रतीकवादी ढंग से,"एक दिन किसी घोड़े के सुम में नाल ठोंकी जा रही थी।
उसे देखकर एक मेंढक को शौक चर्राया कि हम भी नाल ठुकायेंगे। बहुत कहने पर नालवाले ने मेंढक के पैर में जरा-सी कील ठोक दी। बस, मेढक भाई वहीं ढेर हो गये। शौकीनी का नतीजा बुरा होता है।"

इस पंचतन्त्र के पीछे वही भय था: आज जो वाइस प्रिंसिपल होना चाहता है वह कल प्रिंसिपली चाहेगा। इसके लिए वह प्रबन्ध समिति के मेम्बरों को अपने ओर तोड़ेगा। मास्टरों का गुट बनायेगा। लड़कों को मार पीट के लिये उकसायेगा। ऊपर शिकायतें भिजवायेगा। वह कमीना है और कमीना रहेगा।

सच्चाई छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से,
कि खुशबू आ नहीं सकती कभी कागज के फ़ूलों सें।

इस कविता को ऊपर दर्ज करके रामाधीन भीखमखेड़वी ने वैद्यजी सो जो पत्र लिखा, उसका आशय था कि प्रबन्ध-समिति की बैठक, जो पिछ्ले तीन साल से नहीं हुई है, दस दिन में बुलाई जानी चाहिए और कालिज की साधारण समिति की सालाना बैठक-जोकि कालिज की स्थापना के साल के अब तक नहीं हुई है-के बारे में वहां विचार होना चाहिए। उन्होंने विचारणीय विषयों में वाइस प्रिंसिपल के तकर्रुरी का भी हवाला दिया था।

प्रिंसिपल साहब जब यह पत्र अपनी जेब में डालकर वैद्यजी के घर के बाहर निकल्रे तो उन्हें अचानक उससे गर्मी-सी निकलती महसूस हुई। उन्हें जान पड़ा़ कि उनकी कमीज झुलस रही है और गर्मी की धारायें कई दिशाओं मे बहने लगी है। एक धारा उनके कोट को झुलसाने लगी, दूसरी कमीज के नीचे से निकलकर उनकी पैण्ट के अन्दर घुस गयी और उसके कारण उनकें पैर तेजी से पढ़्ने लगे। एक तीसरी धारा उनके आंख, कान और नाक पर लाल पालिश चढ़ाती हुई खोपड़ी के उस गड्ढे की ओर बढ़ने लगीं जहां कुछ आदमियों के दिमाग हुआ करता है।

कालिज के फ़ाटक पर ही उन्हें रुप्पन बाबू मिल गये और उन्होंने रुककर कहना शुरु किया,"देख लिया तुमने? खन्ना रामाधीन का खूंटा पकड़कर बैठे हैं।वाइस-प्रिंसिपली का शौक चर्राया है। एक बार एक मेढक ने देखा कि घोड़े के
नाल ठोंकी जा रही है तो उसने भी.....।"

रुप्पन बाबू कालिज छोड़कर कहीं बाहर जा रहे थे और जल्दी में थे। बोले,"जानता हूं। मेंढकवाला किस्सा यहां सभी को मालूम है। पर मैं आपसे एक बात साफ़-साफ़ बता दूं। खन्ना से मुझे हमदर्दी नहीं है, पर मै समझता हूं कि यहां एक वाइस-प्रिंसिपल का होना जरुरी है। आप नहीं रह्ते रो यहां सभी मास्टर कुत्ते-बिल्लियों की तरह लड़ते है। टीचर्स-रुम में वह गुण्डागर्दी
होती है कि क्या बतायें। वहीं हे-हे, ठे-ठे, फ़े,फ़े!" वे गम्भीर हो गये और आदेश के ढंग से कहने लगे,"प्रिंसिपल साहब, मै समझता हू कि हमारे यहां एक वाइस प्रिंसिपल भी होना चाहिए। खन्ना सबसे ज्यादा सीनियर है। उन्हीं को
बन जाने दीजिए। सिर्फ़ नाम की बात है, तनख्वाह तो बढ़नी नही है।"

प्रिसिपल साहब का दिल इतनी जोर से धड़का कि लगा, उछलकर फ़ेफ़ड़े में घुस जायेगा। वे बोले," ऎसी बात अब कभी भूलकर भी न कहना रुप्पन बाबू! ये खन्ना-वन्ना चिल्लाने लगेंगे कि तुम उनके साथ हो। यह शिवपालगंज है। मजाक
में भी सोच कर बोलना चाहिए।"

"मै तो सच्ची बात कहता हूं। खैर, देखा जायेगा।"कहते-कहते रुप्पन बाबू आगे बढ़ गये।

प्रिंसिपल साहब तेजी से अपने कमरे में आ गये। ठण्डक थी, पर उन्होंने कोट उतार दिया। शिक्षा-सम्बन्धी सामानों की सप्लाई करनेवाली किसी दुकान का एक कैलेण्डर ठीक उनकी नाक के सामने दीवार पर टंगा हुआ था जिसमें नंगे बदन पर लगभग एक पारदर्शक साड़ी लपेटे हुए कोई फ़िल्म-एक्ट्रेस एक आदमी की ओर लड्डू जैसा बढ़ा रही थी। आदमी चेहरे पर बड़े-बड़े बाल बढ़ाये हुए, एक हाथ आंखो के सामने उठाये, ऎसा मुंह बना रहा था जैसे लड्डू खाकर उसे अपच हो गया हो। ये मेनका और विश्वामित्र थे। वे इन्हीं को थोड़ी देर देखते रहे, फ़िर घण्टी बजाने की जगह जोर से चिल्लाकर उन्होंने चपरासी को बुलाया और कहा,"खन्ना को बुलाओ।"

चपरासी ने रहस्य के स्वर में कहा," फ़ील्ड की तरफ़ गये हैं। मालवीयजी साथ में हैं।"

प्रिंसिपल ने उकताकर सामने रखे हुए कमलदान को घसीटकर दूर रख दिया। कमलदान भी नमूने के तौर पर किसी ऎजुकेशन एम्पोरियम से मुफ़्त में मिला था और जिस तरह प्रिंसिपल साहब ने उसे दूर पर पटका था, उससे लगता था, उस साल
एम्पोरियम का कोई भी माल कालिज में नहीं खरीदा जायेगा। पर प्रिंसिपल साहब का मतलब यह नही था; वे इस वक्त चपरासी को सिर्फ़ यह बताना चाहते थे कि वे उसकी खुफ़िया रिपोर्ट अभी सुनने को तैयार नहीं है। उन्होंने कड़ककर कहां,"मै कहता हूं, खन्ना को इसी वक्त बुलाओ।"

चपरासी गाढ़े का साफ़ कुर्ता और साफ़ धोती पहने हुए था। उसके पैरों में खड़ाऊं और माथे पर तिलक था। उसने शान्तिपूर्वक कहा," जा रहा हू। खन्ना को बुलाये लाता हूं। इतना नाराज क्यों हो रहे हैं?"

प्रिंसिपल साहब दांत पीसते हुए तिरछी निगाहो से मेज पर रखे हुए टीन के एक टुकड़े को देखते रहे। इस पर पालिश करके एक लाल गुलाब का फ़ुल बना दिया गया था। नीचे तारीख और महीना बताने के लिए कैलेण्डर लगाया गया था। इसे शराब
बनाने की एक प्रसिद्ध फ़र्म ने पं. जवाहरलाल नेहरु की यादगार में बनवाया था और मुफ़्त मे चारो दिशाओं में इस विश्वास के साथ भेजा था कि जहां यह कैलेण्डर जायेगा वहां की जनता पं. जवाहरलाल नेहरु के आदर्शो को और इस फ़र्म की शराब को कभी न भूलेगी। पर इस वक्त कैलेण्डर का प्रिंसिपल साहब पर कोई असर नही हुआ। पं. नेहरु के लाल गुलाब ने उन्हें शान्ति नहीं दी; न फ़ेनदार बियर की कल्पना ने उनकी आखों को मूंदने के लिए मजबूर किया। वे दांत पीस रहे थे और पीसते रहे। अचानक, जिस वक्त चपरासी का खड़ाऊं दरवाजे की चौखट पार कर रहा था, उन्होंने कहा, "रामाधीन इन्हें वाइस-प्रिंसिपली
दिलायेंगे! टुच्चे कहीं के!"

चपरासी घूम पड़ा। दरवाजे पर खड़े-खड़े बोला, "गाली दे रहे हो, प्रिंसिपल साहब?"

उन्होंने कहां, "ठीक है, ठीक है, जाओ, अपना काम करो।"

"अपना काम तो कर ही रहा हू। आप कहें तो अब न करूं।"

प्रिंसिपल माथे पर झुर्रिया डालकर दीवार पर टंगे दूसरे कैलेण्डर को देखने लगे थे। चपरासी ने उसी तरह पूछा," कहें तो खन्ना पर निगाह रखना बन्द कर दूं।"

प्रिंसिपल साहब चिढ़ गये। बोले,"भाड़ मे जाओ।"

चपरासी उसी तरह सीना ताने खड़ा रहा। लापरवाही से बोला," मुझे खन्ना-वन्ना न समझ लीजिएगा। काम चौबीस घंटे करा लीजिए, वह मुझे बरदाश्त है, पर यह अबे-तबे तू-तड़ाका मुझे बरदाश्त नही।"

प्रिंसिपल साहब उसकी ओर देखते रह गये। चपरासी ने कहा,"आप बांभन है और मैं भी बांभन हूं। नमक से नमक नहीं खाया जाता। हां!"

प्रिंसिपल साहब ने ठण्ड सुरों में कहा," तुम्हें धोखा हुआ है। मैं तुम्हें नहीं खन्ना दे लिए कह रहा था। टुच्चा है। रामाधीन से मिलकर मीटिंग करने का नोटिस भिजवाता है।" चपरासी को यकीन दिलाने के लिए कि यह गाली खन्ना को ही समर्पित है, उन्होंने फ़िर कहां "टुच्चा!"

"अभी बुलाये लाता हूं।"चपरासी की आवाज भी ठण्डी पड़ गयी। प्रिंसिपल साहब खड़ाऊंओं की धीमी पड़ती हुई 'खट-खट' सुनते रहे। उनकी निगाह एक तीसरे कैलेण्डर पर जाकर केन्द्रित हो गयी जिसमें पांच-पांच साल के दो बच्चे बड़ी-बड़ी राइफ़ले लिये बर्फ़ पर लेटे थे और शायद चीनियों की फ़ौज का इन्तजार कर रहे थे और इस तरह बड़े कलात्मक ढंग से बता रहे थे कि फ़ैक्ट्री में जुट के थैले सबसे अच्छे बनते है।

प्रिंसिपल साहब इस कैलेण्डर पर निगाह जमाकर बैठे हुए खन्ना का इन्तजार करते रहे और सोचते रहे कि इसे वाइस-प्रिंसिपल का शौक न चर्राया होता तो कितना अच्छा होता! वे भूल गये कि सबके अपने-अपने शौक है। रामाधीन भीखमखेड़वी को चिठ्ठी के आरम्भ में उर्दू-कविता लिखने का शौक है; खुद उन्हें अपने दफ़्तर में रंग-बिरंगे कैलेण्डर लटकाने का शौक है, और चपरसी को, जो कि क्लर्क ही की तरह वैद्यजी का रिश्तेदार था, अकडकर बात करने का शौक है।

प्रिंसिपल साहब खन्ना का इन्तजार करते रहे। उधर होनेवाली घटना को ऎतिहासिक बनाने के लिए बाहर के बरामदे में क्लर्क साहब आकर खड़े हो गये। दीवार के पीछे और खिड़की के नीचे ड्रिल-मास्टर टांग पसारकर खड़े-खड़े, पेशाब करने के बजाय बीड़ी पीने लगे। इस बात का खतरा नहीं रहा कि खन्ना और प्रिंसिपल साहब का संवाद जनता तक पहुंचने के पहले ही हवा में उड़ जायेगा।

रात रंगनाथ और बद्री छत पर कमरे में लेटे थे और सोने के पहले के पहले की बेतरतीब बातें शुरू हो गयीं थीं। रंगनाथ ने
अपनी बात खत्म करते हुये कहा," पता नहीं चला कि प्रिंसिपल और खन्ना मास्टर में क्या बात हुई। ड्रिल-मास्टर बाहर खड़ा था। खन्ना मास्टर ने चीखकर कहा, आपकी यही इन्सानियत है!,"वह सिर्फ़ इतना ही सुन पाया।

बद्री ने जम्हाई लेते हुए कहा," प्रिंसिपल ने गाली दी होगी। उसी के जवाब में उसने इन्सानियत की बात कही होगी। यह खन्ना इसी तरह बात करता है। साला बांगडू है।"

रंगनाथ ने कहा," गाली का जवाब तो जूता है।"

बद्री ने इसका कोई जवाब नहीं दिया। रंगनाथ ने फ़िर कहा," मै तो देख रहा हूं, यहां इन्सानियत का जिक्र ही बेकार है।"
बद्री ने सोने के लिए करवट बदल ली। गुड नाइट' कहने की शैली में बोले,"सो तो ठीक है। पर यहां जो भी क-ख-ग-घ पढ़ लेता है,उर्दू भूंकने लगता है। बात-बात में इन्सानियत-इन्सानियत करता है। कल्ले में जब बूता नही होता,तभी इन्सानियत के लिए जी हुड़कता है।"

बात ठीक थी। शिवपालगंज में इन दिनों इन्सानियत का बोलबाला था। लौण्डे दोपहर की घनी अमराइयों में जुआ खेलते थे। जीतनेवाले जीतते थे, हारनेवाले कहते थे, 'यही तुम्हारी इन्सानियत है? जीतते ही तुम्हारा पेशाब उतार आता
है। टरकने का बहाना ढुंढने लगते हो।"

कभी-कभी जीतनेवाला भी इन्सानियत का प्रयोग करता था। वह कहता,'क्या इसी का नाम इन्सानियत है? एक दांव हारने में ही पिलपिला गये। यहां चार दिन बाद हमारा एक दांव लगा तो उसी में हमारा पेशाब बन्द कर दोगें?"

ताड़ीघर में मजदूर लोग सिर को दांये-बाये हिलाते रहते। १९६२ मे भारत को चीन के विश्वासघात से जितना सदमा पहुचा था, उसी तरह के सदमे का दुश्य पेश करते हुए वे कहते,'बुधुवा ने पक्का मकान बनवा डाला। कारखानेवलों के ठाठ हैं। हमने कहा, पाहुन आये है। ताड़ी के लिए दो रुपये निकाल दो, तो उसने सीधे बात नही की, पिछल्ला दिखा के चला गया। बताओ नगेसर, क्या यही इन्सानियत है?"

यानी इन्सानियत का प्रयोग शिवपालगंज में उसी तरह और चालाकी का लक्षण माना जाता था जिस तरह राजनीति में नैतिकता का। यह दूसरी बात है कि बद्री पहलवान इसे कल्ले की कमजोरी समझते थे। यह संदेश देकर और नैतिकता पर उसे
लागू करने के लिए रंगनाथ को जागता छोड़कर वे बात-की-बात में सो गये।

रंगनाथ कम्बल ओढ़े छत की ओर देखता हुआ लेटा रहा। दरवाजा खुला था और बाहर चांदनी फ़ैली थी। थोड़ी देर उसने सोफ़िया लारेन और एलिजाबेथ का ध्यान किया, पर कुछ छण बाद ही इसे चरित्रहीनता की अलामत मानकर वह अपने शहर के धोबी की
लड़की के बारे में सोचने लगा जो धुलाई के कपड़ो से अपने लिए पोशाक निकालते वक्त पिछले दिनों बिना बांह के ब्लाउजों को ज्यादा तरजीह देने लगी थी। कुछ देर में इस परिस्थिति को भी कुछ घटिया समझकर फ़िल्मी अभिनेत्रियों पर उसने दोबारा ध्यान लगाया और इस बार राष्ट्रीयता और देश-प्रेम के नाम पर लिज टेलर आदि को भुलाकर वहीदा रहमान और सायरा बानू का सहारा पकड़ा। दो-चार मिनट बाद ही वह इस नतीजे पर पहुंचने लगा कि हर बात में विलायत से प्रेरणा लेना ठीक नहीं है और ठीक से मन लग जाये तो देश-प्रेम में भी बड़ा मजा है। अचानक उसे नींद-सी आने लगी और बहुत कोशिश करने पर भी सायरा बानू के समूचे जिस्म के सामने उसके ध्यान का रकबा छोटा पड़ने लगा। उसमें कुछ शेर और भालू छलांगे लगाने लगे। उसने एक बार पूरी कोशिश से सायरा बानू को धड़ से पकड़कर घसीटना चाहा, पर वह हाथ से बाहर फ़िसल गयी और उसी सौदे में शेर और भालू भी बाहर निकल गये। तभी उसके दिमाग में खन्ना मास्टर की बनती-बिगड़ती हुई तस्वीर दो-एक बार लुपलुपायी और एक शब्द गूंजने लगा 'इन्सानियत-इन्सानियत!'

पहले लगा कोई यह शब्द फ़ुस्फ़ुसा रहा है। फ़िर जान पड़ा, इसे कोई मंच पर बड़ी गम्भीर आवाज में पुकार रहा है। उसके बाद ही ऎसा जान पड़ा, कहीं दंगा हो रहा है और चारों ओर से लोग चीख रहे है, 'इन्सानियत! इन्सानियत!इन्सानियत!!!'

वह जाग पड़ा और जागते ही शोर सुनायी दिया," चोर! चोर! चोर! जाने ना पाये! पकड़ लो! चोर! चोर! चोर!"

एकाध क्षणों के बाद पूरी बात 'चोर! चोर! चोर! ' पर आकर टूट रही थी, जैसे ग्रामोफ़ोन की सुई रिकार्ड में इसी नुक्ते पर फ़ंस गयी हो। उसने देखा, शोर गांव में दूसरी तरफ़ हो रहा था। बद्री पहलवान चारपाई से कूद कर पहले ही नीचे खड़े हो गये है। वह भी उठ बैठा। बद्री ने कहा,"छोटे कहता ही था। चोरों का एक गिरोह आसपास घूम रहा है। लगता है, गांव में भी आ गये।"

दोनों जल्दी-जल्दी कपड़े पहनकर बाहर आये। कपड़े का अर्थ यही नहीं कि बद्री ने चूड़ीदार पैजामा और शेरवानी पहनी हो। नंगे बदन पर ढीली पड़ी हुई तहमद उन्होंने कमर के चारों ओर कस ली और एक चादर ओढ़ लिया। बस, कपड़े पहनने की क्रिया पूरी हो गयी। रंगनाथ परमहंसों की इस गति तक नही पहुंच पाया था। उसने कमीज डाल ली। दरवाजे तक पहुंचते-पहुंचते उसके कदम और भी तेज हो गये। तब तक चारों ओर से 'चोर!चोर!' के नारे उठने लगे थे। शोर हाथों-हाथ इतना बढ़ गया
कि अंग्रेजो ने अगर उसे १९२१ मे सुन लिया होता तो हिन्दुस्तान छोड़कर वे तभी अपने देश भाग गये होते।

दोनों जीने से उतर कर नीचे आये। बैठक से बाहर निकलते-निकलते बद्री पहलवान ने रंगनाथ से कहा,"तुम यहीं दरवाजा बन्द करके घर बैठो। मैं बाहर जाकर देखता हूं।"

ऐसा लगा जैसे बाहर जाने का मतलब जौहर दिखाना था या चक्रव्यूह भेदना था। दोनों भाई बाहर जाने की जिद पकड़ गये। रंगनाथ ने शहीदों की-सी अदा में कहा," यह है, तो जाइए आप लोग बाहर। मै ही घर पर रहूगां।"

सामने सड़क से चांदनी में तीन आदमी 'चोर! चोर!' चोखते हुए निकले उनके पीछे दो आदमी उसी तरह 'चोर! चोर' का नारा बुलन्द करते हुए निकल गये। फ़िर एक आदमी उसी तरह 'चोर! चोर!' का हल्ला मचाता हुआ निकला। फ़िर तीन आदमी और; सबके हाथो में लाठियां थी। सभी दौड़ रहे थे। तभी चोरों को दौड़ा रहे जुलूस में सबसे बाद में निकलनेवालों में से बद्री ने कुछ को पहचाना । वह भी दौड़कर उन्हीं से मिल गये। पुकारकर बोले," कौन है? चोर कहां है?"

छोटे ने हांफ़ते-हांफ़ते कहा," आगे! आगे निकल गये! " कुछ देर शान्ति रही।

रुप्पन बाबू और रंगनाथ बैठक का दरवाजा बन्द करके, ताला लगाकर छत पर वापस चले आये। नीचे से वैद्यजी खंखारकर बोले,"कौन है?"

रुप्पन बाबू ने जवाब दिया,"चोर हैं पिताजी!"

वैद्यजी घबराहट में गरजकर बोलें," कौन रुप्पन तुम छत पर हो?"

रुप्पन ने गांव में उठते हुए शोर को अपनी ओर से यथाशक्ति बढ़ावा देते हुए कहा, 'हां, हमी हैं। क्यों जान-बूझकर पूछ रहे हो? चैन से सोते क्यों नही?"

वैद्यजी अपने छोटे लड़के की यह आदर- भरी वाणी सुनकर चुप हो गये। छत पर रुप्पन बाबू और रंगनाथ गांव-भर में फैलती-फूटती आवाजों को सुनते रहे।

कोई मकान के पिछवाड़े चिल्लाया,"मार डाला!"

और शोर। किसी ने चीखकर कहा," अरे, नही छोटे! यह तो भगौती है।"

"छोड़ो। इसे छोड़ो। इधर! उधर चोर उधर गये है।"

कोई रो रहा था। किसी ने सान्त्वना दी," अरे,क्यों रांड-जैसा रो रहा है? एक डण्डा पड़ गया, उसी से फ़ांय-फ़ांय कर रहा है।"

रोते-रोते उसने जवाब दिया,"हम भी कसर निकालेंगे। देख लेंगे।"

फ़िर कुहराम,"उधर! उधर! जाने न पाये! दे दायें से एक लाठी! मार उछल के! क्या साला बाप लगता है?"

रंगनाथ को उत्साह और उत्सुकता के साथ-ही-साथ मजा भी आने लगा। यह भी कैसा नियम है! यहां लाठी चलाते समय बाप ही को अपवाद-रुप में छोड़ दिया जाता है।

धन्य है भारत, तेरी पित्र-भक्ति!

रुप्पन बाबू बोले,"भगौती और छोटॆ की चल रही थी। लगता है, इसी धमाचौकड़ी में छोटे ने कुछ कर दिया।"

रंगनाथ ने कहा,"यह तो बड़ी गड़बड़ बात है।"

रुप्पन बाबू उपेक्षा के साथ बोले,"गड़बड़ क्या है? दांव लग जाने की बात है।

छोटे देखने में भोंदू लगता है, पर बड़ा घाघ है।"

दोनों फ़िर चारों ओर की भगदड़ और शोर की ओर कान लगाये रहे। रंगनाथ ने कहा, "शायद चोर निकल गये।"

"वह तो यहां हमेशा ही होता है।"

रंगनाथ ने रुप्पन बाबू के ग्राम-प्रेम की चापलूसी करनी चाही। बोले,"शिवपालगंज में चोर आकर निकल जायें, यह तो सम्भव नहीं। बद्री दादा बाहर निकले हैं तो एक-दो पकड़े ही जायेगे।"

किसी पुरानी पीढ़ी के नेता की तरह अतीत की ओर हसरत के साथ देखते हुए रुप्पन बाबू ने ठण्डी सांस भरी। कहने लगे," नहीं रंगनाथ दादा, अब वह पहलेवाले दिन गये। वह ठाकुर दुरबीनसिंह का जमाना था। बड़े-बड़े चोर शिवपालगंज के नाम से थर्राते थे। रुप्पन बाबू की आंखे वीर-पूजा की भावना से चमक उठी। पर बात यहीं रुक गयी। शोर का आखिरी दौर चल निकला था और लोग आसमान फ़ाड़ने से उद्देश्य से बजरंग बली की जय बोलने लगे थे। रंगनाथ ने कहा,"लगता है, कोई चोर पकड़ा गया।"

रुप्पन बाबू ने कहा,"नहीं, मैं गंजहा लोगो को खूब जानता हू। चोरों को गांव से बाहर खदेड़ दिया होगा, चोरों ने खुद इन्हें गांव के बाहर नही खदेड़ा, यही क्या कम है? इसी खुशी मे जय-जयकार लगाई जा रही है।"

चांदनी में लोग दो-दो, चार-चार के गुट बनाकर किचमिच-किचमिच करते हुए सड़क और दूसरे रास्तों से आ-जा रहे थे। रुप्पन बाबू ने मुंडेर के पास खड़े होकर देखा। एक गुट ने नीचे से कहा,"जागते रहना रुप्पन बाबू! रात-भर होशियारी
से रहना।"

रुप्पन बाबू घ्रणा के साथ वहीं से बोले,"जाओ, बहुत नक्शेबाजी न झाड़ो।"

रंगनाथ की समझ मे नही आया कि इतनी अच्छी सलाह का रुप्पन बाबू इस तरह क्यों तिरस्कार कर रहे हैं। थोड़ी देर बाद यही सलाह गांव के कोने-कोने में गूंजने लगी,"जागते रहो, जागते रहो!"

शोर अब रह-रहकर हो रहा था। चारों ओर सीटियां भी सुनायी देने लगी थी। रंगनाथ ने कहां," ये सीटियां कैसी है?"

रुप्पन बाबू बोले,"क्या पुलिस शहर मे गश्त नही लगाती?"

"ओह! तो पुलिस भी अब मौके पर आ गयी है।"

"जी हां! पुलिस ने ही तो गंववालों की मदद से डाकुओं का मुकाबला किया है।

पुलिसवालों ही ने तो उन्हें यहां से मार भगाया है।"

रंगनाथ आश्चर्य से रुप्पन बाबू को देखने लगा, "डाकू?"

"हां-हां डाकू नही तो और क्या? चांदनी रात कभी चोर भी आते हैं। ये डाकू तो थे ही।"
रुप्पन बाबू जोर से ठठाकर हंसे। बोले,"दादा, ये गंजहा लोगों की बातें है, मुश्किल से समझोगे। मैं तो, जो अखबार में छपनेवाला है, उसका हाल आपको बता रहा हूं।"

एक सीटी मकान के बिल्कुल नीचे सड़क पर बजी। रुप्पन बोले,"तुमने मास्टर मोतीराम को देखा है कि नहीं? पुराने आदमी हैं दारोगाजी उनकी बड़ी इज्जत करते हैं। वे दारोगाजी की इज्जत करते है। दोनो की इज्जत प्रिंसिपल साहब करते है। कोई साला काम तो करता नही है, सब एक-दूसरे की इज्जत करते हैं।

"यही मास्टर मोतीराम शहर के अखबार के संवाददाता हैं। उन्होंने चोरों को डाकू भी न बताया तो मास्टर मोतीराम होने से फ़ायदा ही क्या?"

रंगनाथ हंसने लगा। सीटियां और 'जागते रहो' की आवाजे दूर-दूर तक बिखरने लगी। इधर-उधर के मकानों पर लोगों ने दरवाजे खुलवाने के लिए चीखना-चिल्लाना शुरु कर दिया। 'दरवाजा खोल दो मुन्ना' से लेकर 'मर गये ससुरे','अरे हम पुकार रहे है, तुम्हारे बाप' तक की शैलियां दरवाजा खुलवाने के लिए प्रयोग में आने लगीं। वैद्यजी के मकान पर भी किसी ने सदर दरवाजे के सांकल खटखटायी। बाहर लेटनेवाला एक हलवाहा जोर से खांसा। सांकल दोबारा खटकी। रंगनाथ ने कहा,"बद्री दादा होगे। चलो ताला खोल दे।"

वे लोग नीचे आ गये। ताला खोलते-खोलते रुप्पन ने पूछा,"कौन?"

बद्री ने दहाड़कर कहां,'खोलते हो कि नहीं? कौन-कौन लगाये हो?"

रुप्पन ने ताला खोलना बन्द कर दिया। बोले,"क्या नाम है?"

उधर से गला-फ़ाड़ आवाज आयी,"रुप्पन, कहे देता हूं, चुपचाप दरवाजा खोल दो......"

"कौन? बद्री दादा?"

"हां-हां, बद्री दादा ही बोल रहा हू। खोलो जल्दी।"

रुप्पन ने ढीले-ढाले हाथों से ताला खोलते हुए कहा,"बद्री दादा अपने बाबा का भी नाम बता दो।"

उन्होंने उसी तरह कोसते हुए बाबा का नाम बताया। फ़िर पूछा गया,"परबाबा का नाम?"

बद्री ने दरवाजे पर मुक्का मारा। कहा," अच्छा न खोलो, जाते हैं।

रुप्पन बाबू ने कहा,"दादा जमाना जोखिम का है। बाहर चोर लोग घूम रहे हैं, इसलिए पूछ रहा हूं। परबाबा का नाम भूल गये हो तो न बताओ, पर गुस्सा दिखाने से कोई फ़ायदा नहीं। गुस्से का काम बुरा है।"

बद्री पहलवान की असलियत की परीक्षा ले चुकने और क्रोध की निस्सारता पर अपनी राय देने के बाद रुप्पन बाबू ने दरवाजा खोला। बद्री पहलवान बिच्छू के डंक की तरह तिलमिलाते हुये अन्दर आये। रुप्पन बाबू ने पूछा,"क्या हुआ दादा? सभी
चोर भाग गये।

बद्री पहलवान ने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप जीना चढ़कर ऊपर आ गये। रुप्पन बाबू नीचे ही अन्दर चले गये। ऊपर के कमरे में रंगनाथ और बद्री पहलवान जैसे ही अपनी-अपनी चारपाई पर लेटे, तभी नीचे गली से किसी ने पुकारा,"वस्ताद, नीचे आओ। मामला बड़ा गिचपिच हो गया है।"

बद्री ने कमरे के दरवाजे से ही पुकारकर कहा,"क्या हुआ छोटे? सोने दोगें कि रात भर यही जोते रहोगे?"

छोटे ने वही से जवाब दिया,"वस्ताद, सोने-वोने की बात छोड़ो। अब तो रपट की बात हो रही है। इधर तो साले गली-गली में 'चोर-चोर' करते रहें, उधर इसी चिल्लपों में किसी ने हाथ मार दिया। गयादीन के यहां चोरी हो गयी! उतर
जाओ।"

लेखक: श्रीलाल शुक्ल
टंकण सहयोग: कु. शहनाज़
अध्याय:
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Thursday, December 14, 2006

9. कभी न उखड़ने वाला गवाह- पंडित राधेलाल

कोऑपरेटिव यूनियन का गबन बड़े ही सीधे-सादे ढ़ंग से हुआ था। सैकड़ों की संख्या में रोज होते रहनेवाले ग़बनों की अपेक्षा इसका यही सौन्दर्य था कि यह शुद्ध गबन था, इसमें ज्यादा घुमाव-फिराव न था। न इसमें जाली दस्तखतों
की जरुरत पड़ी थी, न फर्जी हिसाब बनाया गया था, न नकली बिल पर रुपया निकाला गया था। ऐसा गबन करने और ऐसे गबन को समझने के लिए किसी टेक्नीकल योग्यता की नहीं, केवल इच्छा-शक्ति की जरुरत थी।
कोऑपरेटिव यूनियन का गबन बड़े ही सीधे-सादे ढ़ंग से हुआ था। सैकड़ों की संख्या में रोज होते रहनेवाले ग़बनों की अपेक्षा इसका यही सौन्दर्य था कि यह शुद्ध गबन था, इसमें ज्यादा घुमाव-फिराव न था।


कोऑपरेटिव यूनियन का एक बीज गोदाम था जिसमें गेहूँ भरा हुआ था। एक दिन यूनियन का सुपरवाइजर रामसरुप दो ट्रक साथ में लेकर बीजगोदाम पर आया। ट्रकों पर गेहूँ के बोरे लाद लिये गये और दूर से देखने वाले लोगों ने समझा कि यह तो कोऑपरेटिव में रोज होता ही रहता है। उन्हें पड़ोस के दूसरे बीजगोदाम में पहुँचाने के लिए रामसरुप खुद एक ड्राइवर के बगल में बैठ गया और ट्रक चल पड़े। सड़क से एक जगह कच्चे रास्ते पर मुड़ जाने से पाँच मील आगे दूसरा बीजगोदाम मिल जाता; पर ट्रक उस जगह नहीं मुडे़, वे सीधे चले गये।

यहीं से गबन शुरु हो गया। ट्रक सीधे शहर की गल्ला मण्डी में पहुँच गये। वहाँ गेहूँ के बोरे उतारकर दोनों ट्रक गबन के बारे में सबकुछ भूल गये और दूसरे दिन आस-पास के क्षेत्र में पूर्ववत कोयला और लकड़ी ढ़ोने लगे। रामसरुप का उसके बाद काफी दिन तक पता नहीं चला और लोगों ने विश्वास कर लिया कि गेहूँ बेचकर, कई हजार रुपये जेब में भरकर वह बम्बई की ओर भाग गया है। यह पूरी घटना स्थानीय थाने में गबन की एक रिपोर्ट की शक्ल में आ गयी और बकौल वैद्यजी के, 'काँटा-सा निकल गया।'

पर यूनियन के एक डाइरेक्टर ने कल शहर जाकर एक ऐसा दृश्य देखा जिससे पता चला कि रामसरुप ने वे रुपये खर्च करने के लिए बम्बई को नहीं अपने इलाके के शहर को ही प्राथमिकता दी है। डाइरेक्टर साहब यों ही, सिर्फ़ शहर देखने के मतलब से, शहर देखने गये थे। इन अवसरों पर और कार्यक्रमों के साथ उनका कम -से-कम एक स्थायी कार्यक्रम होता था-किसी पार्क में पहुँचना, किसी पेड़ के नीचे बेंच पर बैठना, लैया-चना चबाना, रंगीन फूलों और लड़कियों को ध्यानपूर्वक देखना और किसी कम-उम्र छोकरे से सिर पर तेल मालिश कराना।

जब वे इस कार्यक्रम की मद आखिरी मद पर पहूँचे तो एक घटना हुई। वे उस समय पेड़ के नीचे बेंच पर बैठे थे, उनकी आँखें मुँदी हुई थीं और उनके सिर पर छोकरे की पतली और मुलायम उँगलियाँ 'तिड़-तिड़-तिड़-तिड़' की आवाज निकाल रही थीं। लड़का उल्लास के साथ उनके बालों पर तबले के कुछ टेढ़े-मेढ़े बोल निकाल रहा था और वे आँखें मूँदे अफसोस के साथ सोच रहे थे कि शायद वह तेल-मालिश का कार्यक्रम जल्द ही खत्म कर देगा। एक बार उन्होंने आँख खोलकर पीछे की ओर
गरदन घुमाने की कोशिश की, पर तेल-मालिश का असर-उसमें इतनी अफ़सरी आ गयी थी कि वह घूमी ही नहीं। अतः उन्होंने लड़के का मुँह तो नहीं देखा, जो कुछ सामने था उसे ही देखकर सन्तोष करना चाहा।

उन्होंने देखा, सामने एक पेड़ था और उसके नीचे बेंच पर रामसरुप सुपरवाइजर बैठा था। वह भी एक लड़के से सिर पर तेल-मालिश करा रहा था और 'तिड़-तिड़-तिड़-तिड़' की सुखपूर्ण अनुभूति में खोया हुआ था। दोनों पक्ष उस समय परमहंसों के भाव से अपने-अपने जगत में तल्लीन थे। शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए यह आदर्श स्थिति थी। अतः उन्होंने एक-दूसरे के मामले में हस्तक्षेप नहीं किया। लगभग पन्द्रह मिनट वे अपनी-अपनी बेंच पर अच्छे पड़ोसियों की तरह बैठे हुए एक-दूसरे को देखकर भी अनदेखा करते रहे। फिर देह तोड़कर दोनों पक्ष उठ खडे हुए और अपने-अपने मालिशकर्ता को यथोचित पारिश्रमिक देकर, उन्हें दोबारा वहीं मिलने के लिए प्रोत्साहित करके,पंचशील के सिद्धांतों के अनुसार वे अपने-अपने रास्ते लग गये।

शिवपालगंज की ओर लौटते समय डाइरेक्टर को जान पड़ने लगा कि मालिश के सुख के पीछे उन्होंने कोऑपरेटिव आन्दोलन के साथ विश्वासघात किया है। उन्हें याद आया कि रामसरुप फ़रार है और पुलिस उसकी तलाश में है। अगर वे रामसरुप को पकड़वा दे तो गबन का मुकदमा चल निकलता। शायद उनका नाम अखबार में भी छपता। यह सब सोचकर वे दुखी हुए। उनकी आत्मा उनको कुरेदने लगी। अतः वापस आते ही आत्मा के संतोष के लिए वे वैद्यजी से मिले और हिंग्वाष्टक चूर्ण की पुड़िया फाँककर उनसे बोले, "मुझे आज पार्क में ऐसा आदमी दिखायी दिया था जो बिल्कुल रामसरुप-जैसा था।"

वैद्यजी ने कहा, "होगा। कुछ आदमियों की आकृतियाँ एक-सी होती हैं।"

डाइरेक्टर को लगा कि इतने से उनकी आत्मा उनका पीछा न छोड़ेगी, थोड़ी देर इधर-उधर देखकर उन्होंने कहा, "मैंने तभी सोचा था कि हो-न-हो, यह रामसरुप ही है।"

वैद्यजी ने डाइरेक्टर पर अपनी आँखें गड़ा दीं। उन्होंने फिर कहा, "रामसरुप ही था। मैंने सोचा कि यह साला यहाँ क्या कर रहा है। मालिश करा रहा था।"

"तुम वहाँ क्या कर रहे थे?"

डाइरेक्टर थोड़ी देर सोचते रहे। फिर सोच-समझकर बोले, "मैंने सोचा, कहीं रामसरुप यह जान न जाये कि उसे देख लिया गया है। इसीलिए पुलिस को इत्तला नहीं दी।"
सनीचर पृथ्वी पर वैद्यजी को एकमात्र आदमी और स्वर्ग में हनुमानजी को एकमात्र देवता मानता था और दोनों से अलग-अलग प्रभावित था। हनुमानजी सिर्फ़ लँगोटा लगाते हैं, इस हिसाब से सनीचर भी सिर्फ़ अण्डरवियर से काम चलाता था। जिस्म पर बनियान वह तभी पहनता जब उसे सज-धजकर कहीं के लिए निकलना होता। यह तो हुआ हनुमानजी का प्रभाव; वैद्यजी के प्रभाव से वह किसी भी राह-चलते आदमी पर कुत्ते की तरह भौंक सकता था, पर वैद्यजी के घर का कोई कुत्ता भी हो, तो उसके सामने वह अपनी दुम हिलाने लगता था।

गबन का अभियुक्त बम्बई में नहीं, बल्कि पन्द्रह मील की दूरी पर ही है और तेल-मालिश कराने के लिए उसका सिर अब भी कन्धों पर सही-सलामत रखा है, इस सूचना ने वैद्यजी को उलझन में डाल दिया। डाइरेक्टरों की बैठक बुलाना जरुरी हो गया। पूरी बात उन्होंने खाली-पेट सुनी थी, उसे भंग पीकर भी सुना जा सके इसलिए बैठक का समय सायंकाल के लिए रखा गया।

सनीचर पृथ्वी पर वैद्यजी को एकमात्र आदमी और स्वर्ग में हनुमानजी को एकमात्र देवता मानता था और दोनों से अलग-अलग प्रभावित था। हनुमानजी सिर्फ़ लँगोटा लगाते हैं, इस हिसाब से सनीचर भी सिर्फ़ अण्डरवियर से काम चलाता था। जिस्म पर बनियान वह तभी पहनता जब उसे सज-धजकर कहीं के लिए निकलना होता। यह तो हुआ हनुमानजी का प्रभाव; वैद्यजी के प्रभाव से वह किसी भी राह-चलते आदमी पर कुत्ते की तरह भौंक सकता था, पर वैद्यजी के घर का कोई कुत्ता भी हो, तो उसके सामने वह अपनी दुम हिलाने लगता था। यह दूसरी बात है कि वैद्यजी के घर पर कुत्ता नहीं था और सनीचर के दुम नहीं थी। उसे शहर की हर चीज में, और इसलिए रंगनाथ में काफी दिलचस्पी थी। जब रंगनाथ दरवाजे पर होता, सनीचर भी उसके आसपास देखा जा सकता था। आज भी यही हुआ।

वैद्यजी कोऑपरेटिव यूनियन की बैठक में गये थे। दरवाजे पर सिर्फ़ रंगनाथ और सनीचर थे। सूरज डूबने लगा था और जाड़े की शाम के साथ हर घर से उठनेवाला कसैला धुआँ मकानों के उपर लटक गया था। कोई रास्ते पर खट-खट करता हुआ निकला। किसी भी शारीरिक विकार के लिए हम भारतीयों के मन में जो सात्विक घृणा होती है, उसे थूककर बाहर निकालते हुए सनीचर ने कहा, "लँगड़वा जा रहा है, साला!" कहकर वह उछलता हुआ बाहर चबूतरे पर आ गया और वहाँ मेंढक की तरह बैठ गया।

रंगनाथ ने पुकारकर कहा, "लंगड़ हो क्या?"

वह कुछ आगे निकल गया था। आवाज सुनकर वह वहीं रुक गया और पीछे मुड़कर देखते हुए बोला, "हाँ बापू, लंगड़ ही हूँ।"
"मिल गयी नकल?"

रंगनाथ के इस सवाल का जवाब सनीचर ने दिया, "नकल नहीं, इन्हें मिलेगा सिकहर*। उसी में टाँग लटकाकर झूला करेंगे।"

लंगड़ पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वहीं से उसने पुकारकर कहा, " नकल तो नहीं मिली बापू, आज नोटिस-बोर्ड पर ऐतराज छपा है।"

"क्या हुआ? फिर से फीस कम पड़ गयी क्या?"

"फीस नहीं बापू," वह अपनी बात को सुनाने के लिए चिल्ला रहा था, "इस बार मुकदमे के पते में कुछ गलती है। प्रार्थी के दस्तखत गलत खाने में हैं। तारीख के ऊपर दो अंक एक में मिल गये हैं। एक जगह कुछ कटा है, उस पर दस्तखत नहीं हैं। बहुत गलती निकाली गयी है।"

* सिकहर रस्सी का बुना हुआ एक झोला होता है। अवध के देहातों में इसे छत से लटका देते हैं। प्रायः उस पर दूध, दही आदि की हाँडियाँ रखी जाती हैं।

रंगनाथ ने कहा," वे दफ्तरवाले बड़े शरारती हैं। कैसी-कैसी गलतियाँ निकालते हैं।"

जैसे गाँधीजी अपनी प्रार्थना-सभा में समझा रहे हों कि हमें अंग्रेजों से घृणा नहीं करनी चाहिए, उसी वजह पर लंगड़ ने सिर हिलाकर कहा, "नहीं बापू, दफ्तरवाले तो अपना काम करते हैं। सारी गड़बड़ी अर्जीनवीस ने की है। विद्या का लोप हो रहा है। नये-नये अर्जीनवीस गलत-सलत लिख देते हैं।"

रंगनाथ ने मन में इतना तो मंजूर कर लिया कि विद्या का लोप हो रहा है, पर लंगड़ के बताये हुए कारण से वह सहमत न हो सका। वह कुछ कहने जा रहा था, तब तक लंगड़ ने जोर से कहा, "कोई बात नहीं बापू, कल दरख्वास्त ठीक हो
जायेगी।" वह खट-खट-खट करता चला गया। सनीचर ने कहा,"जाने किस-किस देश के बाँगडू शिवपालगंज में इक्ट्ठा हो रहे हैं।"

रंगनाथ ने उसे समझाया,"सब जगह ऐसा ही है। दिल्ली का भी यही हाल है।"
जैसे भारतीयों की बुद्धि अंग्रेजी की खिड़की से झाँककर संसार का हालचाल देती है, वैसे ही सनीचर की बुद्धि रंगनाथ की खिड़की से झाँकती हुई दिल्ली के हालचाल लेने लगी।


वह सनीचर को दिल्ली के किस्से सुनाने लगा। जैसे भारतीयों की बुद्धि अंग्रेजी की खिड़की से झाँककर संसार का हालचाल देती है, वैसे ही सनीचर की बुद्धि रंगनाथ की खिड़की से झाँकती हुई दिल्ली के हालचाल लेने लगी। दोनों कुछ देर उसी में अटके रहे।

अँधेरा हो चला था, पर अभी हालत ऐसी नहीं थी कि आँख के सामने खड़े हुए आदमी और जानवर में तमीज न की जा सके। वैद्यजी की बैठक में एक लालटेन लटका दी गयी। सामने रास्ते से तीन नौजवान जोर-जोर से ठहाके लगाते हुए निकले। उनकी बातचीत किसी एक ऐसी घटना के बारे में होती रही जिसमें 'दोपहर', 'फण्टूश','चकाचक', 'ताश' और 'पैसे' का जिक्र उसी बहुतायत से हुआ जो प्लानिंग कमीशन के अलहकारों में 'इवैल्यूएशन', 'कोआर्डिनेशन', 'डवटेलिंग'या साहित्यकारों में 'परिप्रेक्ष्य', 'आयाम', 'युगबोध', 'सन्दर्भ' आदि कहने में पायी जाती है। कुछ कहते-कहते तीनों नौजवान बैठक से आगे जाकर खड़े हो गये। सनीचर ने कहा, "बद्री भैया इन जानवरों को कुश्ती लड़ना सिखाते हैं। समझ लो, बाघ के हाथ में बन्दूक दे रहे हैं। वैसे ही सालों के मारे लोगों का रास्ता चलना मुश्किल है, दाँव-पेंच सीख गये तो गाँव छोड़ देना होगा।"

अचानक नौजवानों ने एक विशेष प्रकार का ठहाका लगाया। सब वर्गों की हँसी और ठहाके अलग-अलग होते हैं। कॉफी-हाउस में बैठे हुए साहित्यकारों का ठहाका कई जगहों से निकलता है, वह किसी के पेट की गहरई से निकलता है, किसी के गले से, किसी के मुँह से और उनमें से एकाध ऐसे भी रह जाते हैं जो सिर्फ सोचते हैं कि ठहाका लगाया क्यों गया है। डिनर के बाद कॉफी पीते हुए, छके हुए अफसरों का ठहाका दूसरी ही किस्म का होता है। वह ज्यादातर पेट के बड़ी ही अन्दरुनी गहराई से निकलता है। उस ठहाके के घनत्व का उनकी साधारण हँसी के साथ वही अनुपात बैठता है जो उनकी आमदनी का उनकी तनख्वाह से होता है। राजनीतिज्ञों का ठहाका सिर्फ़ मुँह के खोखल से निकलता है और उसके दो ही आयाम होते हैं, उसमें प्रायः गहराई नहीं होती। व्यापारियो का ठहाका होता ही नही है और अगर होता भी है तो ऎसे सुक्ष्म और सांकेतिक रुप में,कि पता लग जाता है, ये इनकम-टैक्स के डर से अपने ठहाके का स्टाक बाहर नहीं निकालना चाहते। इन नौजवानों ने ठहाका लगाया था, वह सबसे अलग था। यह् शोहदों का ठहाका था, जो आदमी के गले से निकलता है, पर जान पडता है, मुर्गों, गीदड़ों और घोड़ों के गले से निकला है।
डिनर के बाद कॉफी पीते हुए, छके हुए अफसरों का ठहाका दूसरी ही किस्म का होता है। वह ज्यादातर पेट के बड़ी ही अन्दरुनी गहराई से निकलता है। उस ठहाके के घनत्व का उनकी साधारण हँसी के साथ वही अनुपात बैठता है जो उनकी आमदनी का उनकी तनख्वाह से होता है। राजनीतिज्ञों का ठहाका सिर्फ़ मुँह के खोखल से निकलता है और उसके दो ही आयाम होते हैं, उसमें प्रायः गहराई नहीं होती।


ठहाका सुनते ही सनीचर ने अधिकार-भरी आवाज में कहा,"यहां खड़े-खड़े क्या उखाड़ रहे हो? जाओ, रास्ता नापो।"

नौजवान अपनी हंसी के पांकेट बुक-संस्करण प्रकाशित करते हुए अपना रास्ता नापने लगे। तब तक अंधेरे से एक औरत छम-छम करती हुई निकली और लालटेन की धीमी रोशनी में लपलपाती हुई परछाई छोड़ती दूसरी ओर निकल गयी। वह बड़बड़ाती जा रही थी, जिसका तात्पर्य था कि कल के छोकरे जो उसके सामने नंगे-नंगे घूमा करते थे, आज उससे इश्कबाजी करने चले हैं। सारे मुहल्ले को यह समाचार देकर कि लड़के उसे छेड़ते है और वह अब भी छेड़ने लायक है, वह औरत वहीं अंधेरे में गायब हो गयी। सनीचर ने रंगनाथ से कहां,"न जाने वह काना इस कुतिया को कहां से घसीट लाया है! जब निकलती है तो कोई-न-कोई इसे छेड़ ही देता है।"

'काना' से पं. राधेलाल का अभिप्राय था। उनकी एक आंख दूसरी से छोटी थी और इसी से गंजहे उनको काना कहने लगे थे। यही हमारी प्राचीन परम्परा है, वैसे तो हमारी हर बात प्राचीन परम्परा है, कि लोग बाहर जाते है और जरा-जरा-सी बात पर शादी कर बैठते है। अर्जुन के साथ चित्रांगदा आदि को लेकर यही हुआ था, यही भारतवर्ष के प्रवर्त्तक भरत के पिता दुष्यन्त के साथ हुआ था, यही ट्रिनिडाड और टोबैगो, वर्मा और बैंकाक जानेवालो के साथ होता था, यही अमेरिका और यूरोप जाने वालो के साथ हो रहा है और यही पण्डित राधेलाल के साथ हुआ। अर्थात अपने मुहल्ले में रहते हुए जो बिरादरी के एक इंच भी बाहर जाकर शादी करने की कल्पना-मात्र से बेहोश हो जाते है वे भी अपने क्षेत्र से बाहर निकलते ही शादी के मामले में शेर हो जाते है। अपने मोहल्ले में देवदास पार्वती से शादी नहीं कर सका और एक समूची पीढ़ी को कई वर्षो तक रोने का मसाला दे गया था। उसे विलायत भेज दिया जाता तो वह निश्चय ही बिना हिचक किसी गोरी ऒरत से शादी कर लेता। बाहर निकलते ही हम लोग प्राय: पहला काम यह करते है कि किसी से शादी कर डालते है फ़िर सोचना शुरु करते है कि हम यहां क्या करने आये थे। तो पं. राधेलाल ने भी, सुना जाता है, एक बार पूरब जाकर कुछ करना चाहा था, पर एक महीने में ही वे इस'कुतिया' से शादी करके शिवपालगंज वापस लौट आये।
अपने मोहल्ले में देवदास पार्वती से शादी नहीं कर सका और एक समूची पीढ़ी को कई वर्षो तक रोने का मसाला दे गया था।


किसी पूर्वी जिले की एक शकर-मिल में एक बार पं. राधेलाल को नौकरी मिलने की सम्भावना नजर आयी। नौकरी चौकीदारी की थी। वे वहां जाकर एक दूसरे चौकीदार के साथ रुक गये। तब पं. राधेलाल की शादी नहीं हुई थी और उनके जीवन की सबसे बड़ी समस्या यह् थी कि ऒरत के हाथ का खाना नही मिलता। उनके साथी चौकीदार की बीवी ने कुछ दिनो के लिए इस समस्या को सुलझा दिया। वहां रहते हुए वह उसका बनाया हुआ खाना खाने लगा और जैसे कि एक जगत-प्रसिद्ध् कहावत है, स्त्री पेट के रास्ते आदमी के ह्र्दय पर कब्जा करती है, उसने पं. राधेलाल के पेट में सुरंग लगा दी और ह्रदय की ओर बढ़ने लगी। उन्हें उसका बनाया हुआ खाना ऎसा पसंद आया और वह खुद अपनी बनायी हुई सुरंग मे इस तरह फंस गयी कि महीने-भर के भीतर ही वे उसे अपना खाना बनाने के लिये शिवपालगंज ले आये। चलते-चलते उसके घर से ही उन्होने साल-दो-साल के लिए खाने का इन्तजाम भी साथ मे ले लिया। इस घटना के बाद मिल के क्षेत्र में लोगो ने सोचा कि पं. राधेलाल का साथी चौकीदार उल्लू है। शिवपालगंज में गजहों ने सोचा कि राधेलाल मर्द का बच्चा है। अब तक उस क्षेत्र में पं.राधेलाल की प्रतिष्ठा 'कभी न उखड़नेवाले गवाह' के रुप में थी, अब वे 'कभी न चूकनेवाले मर्द' के रुप में भी विख्यात हो गये।

वैसे,'कभी न उखड़नेवाले गवाह' की ख्याति ही पं. राधेलाल की जीविका का साधन थी। वे निरक्षरता और साक्षरता की सीमा पर रहते थे और जरुरत पड़ने पर अदालतों में 'दस्तखत कर लेता हू,' 'मैं पढ़ा-लिखा नही हूं' इनमें कोई भी बयान दे
सकते थे। पर दीवानी और फ़ौजदारी कानूनों का उन्हें इतना ज्ञान सहज रुप में मिल गया था कि वे किसी भी मुकदमें में गवाह की हैसियत से बयान दे सकते थे और जिरह में अब तक उन्हें कोई भी वकील उखाड़ नही पाया था। जिस तरह कोई भी जज अपने सामने किसी भी मुकदमे का फ़ैसला दे सकता है, कोई भी वकील किसी भी मुकदमे की वकालत कर सकता है, वैसे ही पं. राधेलाल किसी भी मामले के चश्मदीद गवाह बन सकते थे। संक्षेप में, मुकदमेबाजी की जंजीर में वे भी जज,
वकील, पेशकार आदि की तरह एक अनिवार्य कड़ी थे और जिस अंग्रेजी कानून की मोटर पर चढ़कर हम बड़े गौरव के साथ 'रुल आफ़ ला' की घोषणा करते हुए निकलते है, उसके पहियों में वे टाइराड की तरह बंधे हुए उसे मनमाने ढंग से
मोड़ते चलते थे।
जिस तरह कोई भी जज अपने सामने किसी भी मुकदमे का फ़ैसला दे सकता है, कोई भी वकील किसी भी मुकदमे की वकालत कर सकता है, वैसे ही पं. राधेलाल किसी भी मामले के चश्मदीद गवाह बन सकते थे।

एक बार इजलास में खड़े होकर जैसे ही वे शपथ लेते,'गंगा-कसम, भगवान-कसम, सच-सच कहेगे, वैसे ही विरोधी पक्ष से लेकर मजिस्ट्रेट तक समझ जाते कि अब यह सच नही बोल सकता। पर ऎसा समझना बिलकुल बेकार था, क्योंकि फ़ैसला समझ से नहीं कानून से होता है और पं. राधेलाल की बात समझने में चाहे जैसी लगे, कानून पर खरी उतरती थी।

पं. राधेलाल की जो भी प्रतिष्ठा रही हो, उनकी प्रेयसी की स्थिति बिल्कुल साफ़ थी। वह भागकर आयी थी, इसलिए कुतिया थी। लोग उससे मजाक कर सकते थे और हमेशा यह समझकर चल सकते थे कि उसे मजाक अच्छा लगता है। यह शिवपालगंज के नौजवानों का सौभाग्य था कि कुतिया ने भी उनको निराश नही किया। उसे सचमुच ही मजाक अच्छा लगता था और इसी से मजाक होने पर छूटते ही गाली देती थी, जो कि गंजहो मे आत्माभिव्यक्ति का बड़ा जनप्रिय तरीका माना जाता था।

सनीचर रंगनाथ को पं. राधेलाल का किस्सा बड़े ही नाटकीय ढंग से सुना रहे थे। तभी उन तीनो नौजवानों में से एक बैठक के दरवाजे पर जा कर खड़ा हो गया। वह नंगे बदन था। उसके जिस्म पर अखाड़े की मिट्टी लगी हुई थी। लंगोटे की पट्टी कमर से पैरों तक हाथी की सूड़ की तरह लटकी हुई थी। उन दिनों शिवपालगंज में लंगोटा पहनकर चलनेवालों में यही फ़ैशन लोकप्रिय हो रहा था। सनीचर ने पूछा,"क्या मामला है छोटे पहलवान?"

पहलवान ने शरीर के जोड़ों पर दाद खुजलाते हुए कहा,"बद्री भैया आज अखाड़े में नही आये? कहां लपक गये?"

"लपक कहां जायेगे, इधर-उधर कहीं होगे?"

"कहां होगे?"
"यूनियन का सुपरवाइजर गेहूं लदवाकर भाग गया है। उसी की मीटिंग यूनियन में हो रही है। बद्री भी गये होगे।"

पहलवान ने लापरवाही से चबूतरे पर थूक दिया। कहा,"बद्री भैया मीटिंग में बैठ कर क्या अण्डा देगें? सुपरवाइजर को पकड़कर एक धोबीपाट मारते, उसी में साला टें हो जाता! मीटिंग-शीटिंग मे क्या होगा?"

रंगनाथ को बात पसन्द आ गयी। बोला,"क्या तुम्हारें यहां मीटिंग मे अण्डा दिया जाता है?"

पहलवान ने इधर से किसी सवाल की आशा न की थी। उसने कहा," अण्डा नही देगें तो क्या बाल उखाड़ेगे? सब मीटिंग मे बैठ कर रांडो की तरह फ़ांय-फ़ांय करते है, काम धाम के वक्त खूंटा पकड़ कर बैठ जाते है।"

रंगनाथ को हिन्दी-भाषा के इस रुप का विशेष ज्ञान न था। उसने मन में सोचा, लोग यों ही कहा करते है कि हमारी भाषा में सशक्त शब्दों की कमी है। यदि हिन्दी के विद्वानों को छोटे पहलवान की तरह अखाड़े मे चार महीने रखा जाये तो बिना किसी व्यक्तिगत असुविधा के वे वहां की मिट्टी के जर्रे-जर्रे से इस तरह के शब्दकोश निकालने लगेंगे। रंगनाथ ने अब छोटे पहलवान को आदर की निगह से देखा। इतमिनान से बात करने के मतलब से कहा," अन्दर आ जाओ पहलवान।"

"बाहर कौन गाज गिर रही है? हम यही चुर्रेट है।" इतना कहकर छोटे पहलवान ने बातचीत मे कुछ आत्मीयता दिखायी। पूछा,"तुम्हारे क्या हाल है रंगनाथ गुरु"?

रंगनाथ पहलवान से अपने बारे में ज्यादा बात नहीं करना चाहता था। दोनों वक्त दूध-बादाम पीने और कसरत करने की बात काफ़ी-हाउसों मे भले ही लोगो की उत्सुकता न जगाये,पर छोटे पहलवान के लिए यह विषय पूरी रात पार करने को काफ़ी था। रंगनाथ बोला ,"हम तो बिल्कुल फ़िट है पहलवान, अपने हाल बताओ। इस सुपरवाइजर को गेहूं बेचने की क्या जरुरत पड़ी?"

पहलवान ने फ़िर नफ़रत के साथ चबूतरे पर थूका, लंगोट की पट्टी को खींचकर कसा और इस प्रकार असफ़ल चेष्टा से यह शुभेच्छा प्रकट की कि वह नंगा नहीं है। इसके बाद अपने को रंगनाथ की समकक्षता में लाकर बोला,"अरे गुरु कहा है,'तन पर नही लत्ता, पान खाया अलबत्ता' वही हाल था। लखनऊ में दिन रात फ़ुटट्फ़ैरी करता था। तो, बिना मसाले के फ़ुटट्फ़ैरी कैसी? गेहूं तो बेचेगा ही।"

"यह फ़ुटट्फ़ैरी क्या चीज है?"

पहलवान हंसा,"फ़ुटट्फ़ैरी नही समझे। वह ससुरा बड़ा लासेबाज था। तो लासेबाजी कोई हंसी-ठट्ठा है! बड़ों-बड़ों का गूदा निकल आता है। जमुनापुर की रियासत तक इसी में तिड़ी-बिड़ी हो गयी।
देसी विश्वविधालयों के लड़के अंग्रेजी फ़िल्म देखने जाते हैं। अंग्रेजी बातचीत समझ में नहीं आती, फ़िर भी बेचारे मुस्कराकर दिखाते रहते है कि वे सब समझ रहे है और फ़िल्म बड़ी मजेदार है।


देसी विश्वविधालयों के लड़के अंग्रेजी फ़िल्म देखने जाते हैं। अंग्रेजी बातचीत समझ में नहीं आती, फ़िर भी बेचारे मुस्कराकर दिखाते रहते है कि वे सब समझ रहे है और फ़िल्म बड़ी मजेदार है। नासमझी के माहौल में रंगनाथ भी उसी तरह मुस्कुराता रहा। पहलवान कहता रहा,"गुरु,इस रामसरुप सुपरवाइजर की नक्शेबाजी मै पहले से देख रहा था। बद्री पहलवान से मैने तभी कह दिया था कि वस्ताद, यह लखनऊ लासेबाजी की फ़िराक में जाता है। तब तो बद्री वस्ताद भी कहते रहे कि 'टांय-टांय न कर छोटू, साला आग खायेगा तो अंगार हगेगा।' अब वह आग भी खा गया और गेहूं भी तिड़ी कर ले गया। पहले तो बैद महाराज भी छिपाये बैठे रहे, अब जब पाने का हगा उतरा आया है तो सब युनियन के दफ़्तर में बैठकर फ़ुसर-फ़ुसर कर रहे है। सुना है प्रस्ताव पास करेगे। प्रस्ताव न पास करेंगें, पास करेंगा घण्टा। गल्ला गोदाम का सब गल्ला तो रामसरुप निकाल ले गया। अब जैसे प्रस्ताव पास करके ये उसका कुछ उखाड़ ले़गे।"

रंगनाथ ने कहां." बद्री से तुमने बेकार की बात की। बैदजी से अपना शुबहा बताते तो वह तभी इस सुपरवाइजर को यहां से हटवा देते।"

"अरे गुरु, मुंह न खुलवाओ, बैधजी तुम्हारे मामा है, पर हमारे कोई बाप नही लगते। सच्ची बात ठांस दूंगा तो कलेजे में कल्लायेगी, हां!"

सनीचर ने कहां,"छोटू पहलवान, आज बहुत छानकर चले हो क्या? बड़ी रंगबाजी झाड़ रहे हो।"

छोटे पहलवान बोले,"रंगबाजी की बात नहीं बेटा, मेरा तो रोआं-रोआं सुलग रहा है! जिस किसी की दुम उठाकर देखो, मादा ही नजर आता है। बैद महाराज के हाल हमसे न कहलाओ। उनका खाता खुल गया तो भम्भक-जैसा निकल आयेगा। मुंदना भी मुश्किल हो जायेगा। यहीं रामसरुप रोज बैदजी के मुंह-में-मुंह डालकर तीन-तेरह की बातें करता था और जब दो ठेला गेहूं लदवाकर रफ़ूचक्कर हो गया तो दो दिन से टिलटिला रहे हैं। हम भी युनियन में हैं। कह रहे थे, प्रस्ताव में चलकर हाथ उठा दो। हम बोले कि हमसे हाथ न उठवाओ महराज; मैं हाथ उठाऊंगा तो लोग कांखने लगेंगे। हां! यही रामसरुप रोज शहर में घसड़-फ़सड़ करता घूमता है, उसे पकड़वाकर एकलक्खी इमारत में बन्द कराते नहीं, कहते हैं कि प्रस्ताव कर लो। बद्री वस्ताद खुद बिलबिलाये हुए हैं, पर सगे बाप का मामला, यह जांघ खोलो तो लाज और वह खोलो तो लाज।"

तब तक बैठक के सामने लोगों के आने की आवाजे सुनायी दीं। चबूतरे पर खद्दर की धोती, कुरता, सदरी टोपी और चादर में भव्यमूर्ति वैध महाराज प्रकट हुए। उनके पीछे कई और चेले-चपाड़े। बद्री पहलवान सबसे पीछे थे। चेहरा बिना तोबड़े की सहायता के ही तोबड़ा-जैसा हो रहा था। उन्हें देखते ही छोटे ने कहां,"वस्ताद, एक बड़ा फ़ण्टूश मामला है। बड़ी देर से बताने के लिए खड़ा हूं।"

"खड़े हो तो कौन पिघले जा रहे हो? क्या मामला है? कहकर बद्री पहलवान ने छोटे का स्वागत किया। गुरु-शिष्य चबूतरे के दूसरे छोर पर बातचीत करने के लिए चले गये।

वैधजी और चार-पांच आदमी अन्दर आ गये। एक ने इत्मीनान की बड़ी लम्बी सांस खीची जो खत्म होते-होते एक सिसकी में बदल गयी। दूसरा तख्त पर बैठ गया और उसने इतने जोर से जम्हाई ली कि पहले तो वह जम्हाई रही, पर आखीर मे सीटी पर आकर खत्म हुई। वैधजी ने भी तकिये के सहारे बैठकर अपनी टोपी और कुरता इस अन्दाज से तख्त के दूसरे छोर पर फ़ेका जैसे कोई बड़ा गवैया एक लम्बी तान लगा चुकने के बाद सम पर आ गया यह स्पष्ट हो गया कि सभी लोग कोई बड़ा काम करके थकान उतारने की स्थिति में आ गये हैं।

सनीचर बोला,"महाराज, बहुत थकान आ गयी हो तो एक बार फ़िर छनवा दूं।" वैधजी कुछ नही बोले। यूनियन के एक डाइरेक्टर ने कहां,"दुबारा तो वहीं यूनियन में छन चुकी है। बढ़िया माल। दूधिया। अब घर चलने का नम्बर है।"

वैधजी कुछ देर पूर्ववत चुप बैठे हुए दूसरो की बाते सुनते रहें। यह आदत उन्होंने तभी से डाली थी जब से उन्हें विश्वास हो गया था कि जो खुद कम खाता है, दूसरों को ज्यादा खिलाता है; खुद कम बोलता है, दूसरों को ज्यादा बोलने देता है; वही खुद कम बेवकूफ़ बनता है, दूसरे को ज्यादा बेवकूफ़ बनाता है। फ़िर वे अचानक बोले,"रंगनाथ तुम्हारी क्या राय है?"

जिस तरह बिना बताये हुए वैधजी ने राय मांगी थी, उसी तरह बिना बात समझे हुए रंगनाथ ने कहां,"जी जो होता है अच्छा होता है।"

वैधजी मूंछो-ही-मूंछो मे मुस्कराये। बोले,"तुमने बहुत उचित कहा। बद्री प्रस्ताव के विरुद्ध था, पर बाद मे वह भी चुप हो गया। प्रस्ताव एक मत से पास हो गया। जो हुआ अच्छा ही हुआ!"

रंगनाथ को अब ध्यान आया कि वह अपनी राय यों ही लूटा चुका है। उसने उत्सुकतापूर्वक पूछा,"क्या प्रस्ताव किया आप लोगो ने?"

"हम लोगों ने प्रस्ताव किया है कि सुपरवाइजर ने जो हमारी आठ हजार रुपये की हानि की है, उसकी पूर्ति के लिए सरकार अनुदान दे।" रंगनाथ इस तर्क से लड़खड़ा गया। बोला,"सरकार से क्या मतलब? गबन आपकी यूनियन के सुपरवाइजर ने किया और उसका हरजाना सरकार दे?"

"तो कौन देगा? सुपरवाइजर तो अलछित हो चुका है। हमने पुलिस में सूचना दे दी है। आगे सरकार का दायित्व है। हमारे हाथ मे कुछ भी नही है। होता, तो सुपरवाइजर को पकड़कर उससे गेंहू का मूल्य वसूल लेते। अब जो करना है, सरकार करे। या तो सरकार सुपरवाइजर को बन्दी बनाकर हमारे सामने प्रस्तुत करे या कुछ और करे। जो भी हो, यदि सरकार चाहती है कि हमारी यूनियन जीवित रहे और उसके द्धारा जनता का कल्याण होता रहे तो उसे ही यह हरजाना भरना पड़ेगा। अन्यथा यह यूनियन बैठ जायेगी। हमने अपना काम कर दिया, आगे का काम सरकार का है। उसकी अकर्मण्यता भी हम जानते है।"

वैधजी इतनी तर्कसंगत बाते कर रहे थे कि रंगनाथ का दिमाग चकरा गया। वे 'शासन की अकर्मण्यता "जनता का कल्याण" 'दायित्व' आदि शब्द बार-बार अपनी बात में ला रहे थे। रंगनाथ को यकीन हो गया कि नये जमाने मे लोग जैसी भाषा समझते है, उसके मामा पुरानी पीढ़ी के होकर भी वैसी ही भाषा बोलना जानते हैं।

बद्री पहलवान छोटे से बातचीत करके वापस आ गये थे। बोले,"रामाधीन के यहां डाका तो नहीं पड़ा, पर इधर-उधर चोरियां होने की खबरे आयी हैं।" वे अपने बाप के सामने प्राय: अदब से बोलते थे। यह बात भी उन्होने इस तरह से कही जैसे छोटे और उनके बीच की बात का यही निष्कर्ष था और उसे बताना उनका कर्त्तव्य था।

वैधजी ने कहा,"चोरी! डकैती! सर्वत्र यही सुन पड़्ता है। देश रसातल को जा रहा है।"

बद्री पहलवान ने इसे अनसुना करके, जैसे कोई हेल्थ-इंस्पेक्टर हैजे से बचाव के उपाय बता रहा हो,जनसाधारण से कहा , "पूरे गांव मे चोरी की चर्चा है। जागते हुए सोना चाहिए।"

सनीचर ने उछलकर अपना आसन बदला और पूछा,"जागते हुए कैसे सोया जाता है, पहलवान?"

बद्री ने सीधी लाइन मे कहा,"टिपर-टिपर मत करो। मुझे आज मजाक अच्छा नही लग रहा है।"

चबूतरे पर जाकर अंधेरे में छोटे पहलवान के पास खड़े हो गये।

लेखक: श्रीलाल शुक्ल
टंकण सहयोग: समीरलाल, कु. शहनाज़
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