राग दरबारी

जानेमाने साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल की रचना "राग-दरबारी" समकालीन साहित्य में एक मील का पत्थर है जिसके लिये उन्हें 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला।

Sunday, December 03, 2006

7. पुरुष बली नहिं होत है...

छत के ऊपर एक कमरा था जो हमेशा संयुक्त परिवार के पाठ्य पुस्तक जैसा खुला पड़ा रहता था। कोने मे रखी हुई मुगदरो की जोड़ी इस बात का ऐलान करती थी कि सरकारी तौर पर यह कमरा बद्री पहलवान का है। वैसे परिवार के दूसरे प्राणी भी कमरॆ का अपने-अपने ढंग से प्रयोग करते थे। घर की महिलायें कांच और मिट्टी के बरतनों मे ढेरों अचार भरकर छत पर धूप में रखती थीं ओर शाम होते-होते कमरे मे जमा कर देती थीं। यही हाल छत पर सूखनेवाले कपड़ों का भी था। कमरे के आर-पार एक रस्सी लटकती थी | जिस पर शाम के वक़्त लंगोट ओर चोलियां, अंगौछे और पेटीकोट साथ-साथ झूलते नजर आते थे। वैद्यजी के दवाखाने की अनावश्यक शीशियां भी कमरे की एक आलमारी में जमा थी। प्राय: सभी शीशियां खाली थीं। उन पर चिपके हुए सचित्र विज्ञापन 'इस्तेमाल के पहले' शीर्षक पर एक अर्धमानव की तस्वीर से और 'इस्तेमाल के बाद' शीर्षक के अन्तर्गत एक ऎसे आदमी की तस्वीर से, जिसकी मूंछे ऎठी हुई है, लंगोट कसा हुआ है और परिणामत: स्वास्थ्य बहुत अच्छा है, पता चलता था कि ये वही शीशियां है जो हजारों इन्सानों को शेर के मानिन्द बना देती हैं; यह दूसरी बात है कि वे अपने गुसलखाने और शयन-कक्ष में ही कमर लपलपाते हुए शेर की तरह घूमा करते है, बाहर बकरी-के-बकरी बने रहते हैं।

एक साहित्य है जो गुप्त कहलाता है, जो भारत मे अंग्रेजी राज जैसी पुस्तकों से भी ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि उसका छापना १९४७ के पहले तो जुर्म था ही आज भी जर्म है, जो बहुत-सी दफ़्तरी बातों की तरह गुप्त होकर भी गुप्त नहीं रहता, जो आहार-निद्रा-भय आदि मे फंसे हुए आदमियों की जिन्दगी में एक बड़े सुखद लिटरेरी सप्लीमेण्ट का काम करता है और जो विशिष्ट साहित्य और जन-साहित्य की बनावट श्रेणियों को लांघकर व्यापक रुप से सबके ह्र्दय में प्रतिष्ठित है। वैसे उसमें कोई खास बात नहीं होती सिर्फ यही बताया जाता है कि किसी आदमी ने किसी आदमी या किसी औरत के साथ किसी तरह से क्या बर्ताव किया यानी उसमे सुमित्रानन्दन पन्त की दार्शनिक भाषा में कहा जाये तो 'मानव मानव के चिरन्तन' सम्बन्धों का वर्णन होता है।
एक साहित्य है जो गुप्त कहलाता है, जो भारत मे अंग्रेजी राज जैसी पुस्तकों से भी ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि उसका छापना १९४७ के पहले तो जुर्म था ही आज भी जर्म है, जो बहुत-सी दफ़्तरी बातों की तरह गुप्त होकर भी गुप्त नहीं रहता
इस कमरे का प्रयोग ऎसे साहित्य के अध्ययन के लिए भी होता था और वह अध्ययन जाहिर है, परिवार मे अकेले विद्यार्थी होने के नाते, रुप्पन बाबू ही करते थे। रुप्पन बाबू कमरे का प्रयोग और कामों के लिए भी करते थे। जिस सुख के लिए दूसरे लोगों को रोटी के टुकडे, पेड़ की छांव, कविता, शराब की सुराही, प्रेमिका आदि उमरखैयामी पदार्थों की जरुरत होती है, वह सुख रुप्पन बाबू इस कमरे में अपने-आप ही खींच लेते थे।

परिवार के सभी लोगों में शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व का नारा बुलन्द करनेवाले इस कमरे को देखकर लोगों के मन में स्थानीय संस्कृति के लिए श्रद्धा पैदा हो सकती थी। इसे देख लेने पर कोई भी समाजशास्त्री यह नहीं कह् सकता था कि पूर्वी गोलार्द्ध मे संयुक्त परिवार की व्यवस्था को कहीं से कोई खतरा है।

यही कमरा रंगनाथ को रहने के लिए दिया था। उसे यहां चार-पांच महीने रहना था। वैद्यजी ने ठीक ही बताया था। एम.ए करते-करते किसी भी सामान्य विद्यार्थी की तरह वह कमजोर पड़ गया था। उसे बुखार रहने लगा था। किसी भी सामान्य हिन्दुस्तानी की तरह उसने डाक्टरी चिकित्सा में विश्वास न रहते हुए भी डाक्टरी दवा खाई थी। उससे वह अभी बिल्कुल ठीक नहीं हो पाया था। किसी भी सामान्य शहराती की तरह उसकी भी आस्था थी कि शहर की दवा और देहात की हवा बराबर होती है। इसलिए वह यहां रहने के लिए चला आया था। किसी भी सामान्य मूर्ख की तरह उसने एम.ए करने के बाद तत्काल नौकरी न मिलने के कारण रिसर्च शुरु कर दी थी, पर किसी भी सामान्य बुद्धिमान की तरह वह जानता था कि रिसर्च करने के लिए विश्वविद्यालय में रहना और नित्यप्रति पुस्तकालय में बैठना जरुरी नहीं है। इसलिए उसने सोचा था कि कुछ दिन वह गांव मे रहकर आराम करेगा, तन्दुरुस्ती बनायेगा, अध्ययन करेगा, जरुरत पड़ने पर शहर जाकर किताबों की अदला-बदली कर आयेगा और वैद्यजी को हर स्टेज पर शिष्ट भाषा में यह कहने का मौका देगा कि काश ! हमारे नवयुवक निकम्मे न होते तो हम बुजुर्गो को ये जिम्मेदारियां न उठानी पड़तीं।
किसी भी सामान्य मूर्ख की तरह उसने एम.ए करने के बाद तत्काल नौकरी न मिलने के कारण रिसर्च शुरु कर दी थी, पर किसी भी सामान्य बुद्धिमान की तरह वह जानता था कि रिसर्च करने के लिए विश्वविद्यालय में रहना और नित्यप्रति पुस्तकालय में बैठना जरुरी नहीं है।
ऊपर का कमरा का काफ़ी बडा था और उसके एक हिस्से पर रंगनाथ ने आते ही अपना व्यक्तिवाद फ़ैला दिया था। उसकी सफ़ाई कराके एक चारपाई स्थायी रुप से डाल दी गयी थी, उस पर एक स्थायी बिस्तर पड गया था। पास की आलमारी में उसकी किताबें लग गयीं थीं और उनमे जेबी जासूस या गुप्त साहित्य के प्रवेश का निषेध कर दिया गया था। वही एक छोटी-सी मेज और कुर्सी भी कालिज से मंगाकर लगा दी गयी थी। चारपायी के पास ही दीवाल में एक खिड़की थी, जो खुलने पर बागों और खेतों का दृश्य पेश करती थीं। यह दृश्य रंगनाथ की जिन्दगी को कवित्वमय बनाने के काम आता था और वहां उसे सचमुच ही कभी-कभी लगता था कि उसके सामने न जाने कितने वर्डस्वर्थ, कितने राबर्ट फ़्रास्ट, कितने गुरुभक्तसिंह एक आर्केस्ट्रा बजा रहे हैं और उनके पीछे अनगिनत आंचलिक कथाकार मुंह में तुरही लगायें, सांस फ़ुलाये खडे हुये हैं।

रुप्पन बाबू कहीं से कुछ ईंट-रोडा उठा लाये थे और उसे जोड़-गांठकर उन्होंने एक रेडियो-जैसा तैयार कर दिया था। कमरे के ऊपर बांसो और आस-पास के पेडों के सहारे उन्होंने लम्बे-लम्बे तार दौडा दिये थे जिससे लगता था कि वहां एशिया का सबसे बडा ट्रान्समिशन सेण्टर है। पर अन्दर का रेडियो एक हेड-फ़ोन के सहारे ही सुना जा सकता था, जिसे कान पर चिपकाकर रंगनाथ कभी-कभी स्थानीय खबरे और वैष्णव सन्तों के शोकपूर्ण भजन सुन लेता था और इत्मीनान कर लेता था कि आल इण्डिया रेडियो अब भी वैसा ही है जैसा कि पिछले दिनो में था और हजार गालिया खाकर भी वह बेहया अपने पुराने ढर्रे से टस-से-मस नहीं हुआ है।

रंगनाथ का कार्यक्रम वैद्यजी की सलाह से बना था; बहुत सबेरे उठना, उठकर सोचना कि कल का खाया हजम हो चुका है। (ब्राह्रमे मुहूर्त उत्तिष्ठेत जीर्णीजीर्ण निरुपयेत),तांबे के लोटे में रखा हुआ ठण्डा पानी पीना, दूर तक टहलने निकल जाना, नित्यकर्म (क्योकि संसार में वही एक कर्मनित्य है, बाकी अनित्य हैं), टहलते हुए लौटना (पर चंक्रमणं हितम) मुंह-हाथ धोना, लकडी़ चबाना और उसी क्रम में लगे हाथ दांत साफ़ करना (निम्बस्य तिक्तके कषाये बब्बुलस्त्था) गुनगुने पानी से कुल्ले करना (सुखोष्णोदकगण्ड्षै: जायते वक्तलाघवम), व्यायाम करना दूध पीना, अध्ययन करना, दोपहर को भोजन करना, विश्राम, अध्ययन, सायंकाल टहलने जाना, लौटकर फ़िर साधारण व्यायाम, बादाम-मुनक्के आदि के द्रव का प्रयोग, अध्ययन, भोजन, अध्ययन, शयन।

रंगनाथ ने इस पूरे कार्यक्रम को ईमानदारी से अपना लिया था। इसमें सिर्फ़ इतना संशोधन हुआ था की अध्ययन की जगह वैद्यजी की बैठक में गंजहो की सोहबत ने ले ली थी। चूंकि इससे रंगनाथ के वीर्य की प्रतिरक्षा को कोई खतरा नहीं था और कुल मिलाकर उसके पूरे दैनिक कार्यक्रम पर कोई असर नहीं पड़ता था, इसलिए वैद्यजी को इस संसोधन में कोई ऎतराज ना था। बल्कि एक तरह से वे इसे पसन्द करते थे कि एक पढ़ा-लिखा आदमी उनके पास बैठा रहता है और हर बाहरी आदमी के सामने परिचय कराने के लिए हर समय तैयार मिलता है।

कुछ दिनों में ही रंगनाथ को शिवपालगंज के बारे में ऎसा लगने लगा कि महाभारत की तरह, जो कहीं नहीं है वह यहां है, और जो यहां नहीं है वह कहीं नही है। उसे जान पड़ा कि हम भारतवासी एक है और हर जगह हमारी बुद्धि एक-सी है। उसने देखा कि जिसकी प्रशंसा में सभी मशहूर अखबार पहले प्रष्ट से ही मोटे-मोटे अच्छरों में चिल्लाना शुरु करते है, जिसके सहारे बड़े-बड़े निगम,आयोग और प्रशासन उठते है, गिरते है, घिसटते है, वही दांव-पेंच और पैतरेंबाजी की अखिल भारतीय प्रतिभा यहां कच्चे माल के रुप में इफ़रात से फ़ैली पड़ी है। ऎसा सोचते ही भारत की सांस्कृतिक एकता में उसकी आस्था और भी मजबूत हो गयी।
कुछ दिनों में ही रंगनाथ को शिवपालगंज के बारे में ऎसा लगने लगा कि महाभारत की तरह, जो कहीं नहीं है वह यहां है, और जो यहां नहीं है वह कहीं नही है। उसे जान पड़ा कि हम भारतवासी एक है और हर जगह हमारी बुद्धि एक-सी है।
पर कमजोरी सिर्फ़ एक बात को लेकर थी। उसने देखा था कि शहरों में वाद-विवाद का एक नया रुप पुरानी और नयी पीड़ी को लेकर उजागर हो रहा है। उसके पीछे पुरानी पीढ़ी का यह विश्वास था कि हम बुद्धिमान है और हमारे बुद्धिमान हो चुकने के बाद दुनिया से बुद्धि नाम का तत्त्व खत्म हो गया है और नयी पीड़ी के लिए उसका एक कतरा भी नही बचा है। वही पर नयी पीड़ी की यह आस्था थी कि पुरानी पीड़ी जड़ थी, थोड़े से खुश हो जाती थी और अपने और समाज के प्रति ईमानदार न थी, जबकि हम चेतन है, किसी भी हालत में खुश नहीं होते है और अपने प्रति ईमानदार है और समाज के प्रति कुछ नही है. क्योकि समाज कुछ नहीं है।

यह वाद-विवाद खास तौर से साहित्य और कला क्षेत्र में ही चल रहा था, क्योंकि औरों के मुकाबले वाद-विवाद के लिए साहित्य और कला के क्षेत्र ही
ज्यादा-से-ज्यादा फ़ैलावदार और कम-से-कम हानिकारक हैं। पिछ्ली पीड़ी के मन में अगली पीड़ी को मूर्ख और अगली के मन में पिछ्ली को जोकर समझनें का चलन
वहां इतना बढ़ गया था कि अगर क्षेत्र साहित्य या कला का न होता, तो अब तक गृहयुद्ध हो चुका होता। रंगनाथ कुछ दिन तक समझता रहा कि शिवपालगंज में
अभी तक ऎसे पीढ़ी-संघर्ष का उदय नही हुआ है। पर एक दिन उसका भ्रम दूर हो गया। उसने देख लिया कि यहां भी उसी तरह का संघर्ष है। वह समझ गया कि यहां
की राजनीति इस पहलू से भी कमजोर नहीं है।
पुरानी पीढ़ी का यह विश्वास था कि हम बुद्धिमान है और हमारे बुद्धिमान हो चुकने के बाद दुनिया से बुद्धि नाम का तत्त्व खत्म हो गया है और नयी पीड़ी के लिए उसका एक कतरा भी नही बचा है।
बात एक चौदह साल के लड़के को लेकर चली थी। एक शाम बैठक में किसी आदमी ने शिवपालगंज के उस लड़के का जीवन-चरित्र बताना शुरु किया। उससे प्रकट हुआ कि लड़के में बदमाश बनने की क्षमता कुछ इस तरह से पनपी थी कि बड़े-बड़े मनोवैज्ञानिक और समाज-वैज्ञानिक भी उसे प्रभु का चमत्कार मानने को मजबूर हो गये थे। सुना जाता है कि अमरीका से पढ़कर लौटे हुये कई विद्वानों ने उस लड़के के बारे में छानबीन की। उन्होंने टूटे हुए परिवार, बुरी सोहबत, खराब वातावरण, अपराधशील वंश-परम्परा आदि रटी-रटायी किताबी थ्योरियों को उस पर खपाना चाहा, पर लड़के ने खपने से इन्कार कर दिया और बाद में वे विद्वान इसी नतीजे पर पहुंचे कि हो-न-हो, यह प्रभु का चमत्कार है।

वास्तव में इससे इन विद्वानो की अयोग्यता नहीं, अपने देश की योग्यता ही प्रमाणित होती है जो आजकल अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, राजनीति-विज्ञान,मनोविज्ञान आदि के क्षेत्र में ऎसी-ऎसी व्यावहारिक समस्याएं चुटकियों में पैदा कर सकता है कि अमरीका में कीमती कागजों पर छपी हुई किताबों के बेशकीमत सिद्धान्त पोच साबित होने लगते हैं और उनका हल निकालने के लिए बड़े-बड़े भारतीय विद्वानो को घबराकर फ़िर अमरीका की ओर ही भागना पड़ता है। इस लड़के की केस-हिस्ट्री ने भी कुछ ऎसा तहलका मचाया था कि एक बहुत बड़े विद्वान ने अपनी अगली अमरीका-यात्रा में उसका समाधान ढूढ़ने की प्रतिज्ञा कर डाली थी।

लड़का शिवपालगंज के इतिहास में अचानक ही दो-तीन साल के लिए उदित हुआ, चमका और फ़िर पुलिस के झांपड़, वकीलों के व्याख्यान और मजिस्ट्रेट की सजा को निस्संग भाव से हज़म करता हुआ बाल-अपराधियों के जेल के इतिहास का एक अंग बन गया। वहीं पता चला कि उस लड़के का व्यक्तिगत चरित्र देश के विद्वानो के लिए समस्या बना हुआ है और उसे सुलझाने के लिए भारतवर्ष और अमरीका की मित्रता का सहारा लिया जानेवाला है। यह बात शिवपालगंज में आते-आते लोक-कथा बन गयी थी और तब से वहां उस लड़के का लीला-संवरण बड़े अभिमान के साथ किया जाने लगा था।

रंगनाथ को बताया गया कि वह लड़का दस साल की उमर में ही इतना तेज दौड़ने लगा था कि पन्द्रह साल के लड़के भी उसे पकड़ नही पाते थे। ग्यारह साल की उम्र
में यह रेल में बिना टिकट चलने और टिकट-चेकर को धोखा देने में उस्ताद हो गया था। एक साल बाद वह मुसाफ़िरों के देखते-देखते उनका सामान कुछ इस तरह
से गायब करने लगा जैसे लोकल अनीस्थीशिया देकर होशियार सर्जन आपरेशन कर डालते है और मेज पर लेटे हुए आदमी को पता ही नही चलता कि शरीर का एक
हिस्सा कहां चला गया। इस तरह की चोरी में उसकी ख्याति सबसे ज्यादा इस आधार पर हुई कि वह कभी पकड़ा नही गया। बाद में, चौदह वर्ष की अवस्था में, जब वह
पकड़ा गया तो पता चला कि वह ऊपर का शीशा तोड़कर दरवाजे की भीतरी सिटकनी खोलने की कला में दक्ष हो चुका है, बंगलो में चोरियां करता है और चोरियां
भी रोशनदान से नहीं, बल्कि उपयुक्त तरकीब से दरवाजा खोलकर, भले आदमियों की तरह कायदे के रास्ते मकान में घुस कर करता है।

इस लड़के की प्रशंसा करते-करते किसी आदमी ने बहराम चोट्टा का भी जिक्र किया जो किसी जमानें में उस क्षेत्र में ऎतिहासिक महत्त का चोर माना जाता
था। पर उसका नाम सुनते ही एक लड़के ने बड़े जोर-शोर से विरोध किया और बतर्ज विधान सभा की स्पीचों के बिना किसी तर्क के, सिर्फ़ आवाज ऊंची करके, साबित
करने की कोशिश की कि 'बहराम चोट्टा भी कोई चोट्टा था! रामस्वरुप ने बारह साल की उम्र में जितना उठाकर फ़ेक दिया, वह बहराम चोट्टा के जनम-भर भी
हिलाये न हिलेगा।'

रंगनाथ को इस बातचीत में पीड़ी-संघर्ष की झलक दीख पड़ी। उसने सनीचर से पूछा, 'क्या आजकल के चोट्टे सचमुच ही ऎसे तीसमारखां है? पहले भी तो एक से एक खतरनाक चोट्टे हुआ करते थे।'

सनीचर उस उम्र का था जिसे नयी पीढ़ी वाले पुरानी के साथ और पुरानी पीढ़ी वाले नयी के साथ लगाते है और आयु को लेकर पीढ़ियों में वैज्ञानिक विभाजन न होने
के कारण जिसे दोनों वर्ग अपने से अलग समझते है। इसी कारण उसके ऊपर किसी भी पीढ़ी का समर्थन करने की मजबूरी न थी। साहित्य और कला के सैकड़ो अर्ध-प्रौढ़
आलोचकों की तरह सिर हिलाकर, अपनी राय देने से कतराते हुए, वह बोला, "भैया रंगनाथ, पहले के लोगों का हाल न पूछो। यहीं ठाकुर दुरबीनसिंह थे। मैंने
उनके दिन भी देखे है। पर आजकल के लौण्डों के हाल न पूछो!"
सनीचर उस उम्र का था जिसे नयी पीढ़ी वाले पुरानी के साथ और पुरानी पीढ़ी वाले नयी के साथ लगाते है और आयु को लेकर पीढ़ियों में वैज्ञानिक विभाजन न होने के कारण जिसे दोनों वर्ग अपने से अलग समझते है। इसी कारण उसके ऊपर किसी भी पीढ़ी का समर्थन करने की मजबूरी न थी।

आज से लगभग तीस साल पहले, जब आज की पीढ़ी पैदा नहीं हुई थी और हुई भी थी तो
यशस्वी रहें हे प्रभो ! हे मुरारे!
चिरंजीव रानी व राजा हमारे!

या

'खुदाया, जार्ज पंजुम की,हिफ़ाजत कर, हिफ़ाजत कर' का कोरस गाने के लिए हुई थी, शिवपालगंज के सबसे प्रमुख गंजहा का नाम ठाकुर दुरबीनसिंह था। उनके
मां-बाप ने उनके नाम के साथ 'दुरबीन' लगाकर शायद चाहा था कि उनका लड़का हर काम वैज्ञानिक ढंग से करें। बड़े होकर उन्होने ऎसा ही किया भी। जिस चीज
में उन्होने दिलचस्पी दिखायी, उसे बुनियाद से पकड़ा! उन्हें अंग्रजी कानून कभी अच्छा नही लगा। इसलिए जब महात्मा गांधी सिर्फ़ नमक-कानून तोड़ने
के लिए दाण्डी-यात्रा की तैयारी कर रहे थे उन दिनों दुरबीनसिंह ने इण्डियन पेनल कोड की सभी दफ़ाओ को एक-एक करके तोड़ने का बुनियादी काम शुरु
कर दिया था।

स्वभाव से वे बड़े परोपकारी थे। परोपकार एक व्यक्तिवादी धर्म है और उसके बारे में हर व्यक्ति की अपनी-अपनी धारणा होती है। कोई चीटियों को आटा
खिलाता है, कोई अविवाहित प्रौढ़ाओ का मानसिक स्वास्थ्य ढीक रखने के लिए अपने मत्थे पर 'प्रेम करने के लिए हमेशा तैयार' की तख्ती लगाकर घूमता है,
कोई किसी को सीधे रिश्वत न लेनी पड़े, इसलिए रिश्वत देनेवालों से खुद सम्पर्क स्थापित करके दोनों पक्षों के बीच दिन रात दौड़-धूप करता रहता है। ये
जब महात्मा गांधी सिर्फ़ नमक-कानून तोड़ने के लिए दाण्डी-यात्रा की तैयारी कर रहे थे उन दिनों दुरबीनसिंह ने इण्डियन पेनल कोड की सभी दफ़ाओ को एक-एक करके तोड़ने का बुनियादी काम शुरु कर दिया था।
सब परोपकार-सम्बन्धी व्यक्तिगत धारणाएं हैं और दुरबीनसिंह की भी परोपकार के विषय में अपनी धारणा थी। वे कमजोर आदमीयों की रक्षा करने के लिए हमेशा व्याकुल रहते थे। इसलिए लड़ाई-भिड़ाई के हर मौके पर वे बिना बुलाये पहुंच जाते थे और कमजोर की तरफ़ से लाठी चला दिया करते थे। उन शान्तिपूर्ण दिनों में ये सब बातें बंधी दर से चलती थीं और सारे इलाके मे मशहूर था कि शहर में जैसे बाबू जयरामप्रसाद वकील मारपीट के मुकदमें में खड़े होने के लिए
पचास रुपया हर पेशी पर लेते है, उसी तरह दुरबीनसिंह भी मुकदमें के पहलेवाली मारपीट के लिए पचास रुपये लेते हैं। बड़ी लड़ाईयों में, जहां आदमी जमा करने पड़ते, यह रकम प्रति व्यक्ति के हिसाब से बढ़ती जाती थी, पर उसकी भी दरें निश्चित थी और उसमें कोई धोखेबाजी नही थी। उनके आदमियों को गोश्त और शराब भी देनी पड़ती थी, पर वे स्वयं इन मौको पर गोश्त नही खाते थे और शराब नहीं पीते थे। इससे उनका पेट हल्का और दिमाग साफ़ रहता था जो कि युद्ध के समय बड़ी ही वांछ्नीय स्थिति है; और चूंकि गोश्त और शराब देखकर भी 'नहीं' कहनेवाला आदमी सदाचारी कहलाता है, इसलिए वे सदाचारी कहलाते थे।

दुरबीनसिंह की एक विशेषता यह भी थी कि वे सेंध नहीं लगाते थे। वे दीवार फ़ांदने के उस्ताद थे। और कहीं भी आसानी से पोल जम्प के चैम्पियन हो सकते थे। शुरु में रुपये की कमी होने पर वे कभी-कभी दीवार फ़ांदने का काम करते थे। बाद में वे ऎसा काम सिर्फ़ कभी-कभी अपने नये चेलों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देने की नीयत से ही करने लगे थे। यह वह जमाना था जब चोर चोर थे और डाकू डाकू। चोर घर में सिर्फ़ चोरी करने के लिए घुसते थे और एक पांच साल का बच्चा भी पैर फ़टफटा दे तो वे जिस सेंध से अन्दर आये थे उसी से विनम्रतापूर्वक बाहर निकल जाते थे। डाकूओं की दिलचस्पी मारपीट में ज्यादा होती थी, माल लूटने में कम। इस परिपेक्ष्य में दुरबीनसिंह ने अपने इलाके में चोरी करते समय घर में जग जानेवालों को पीटने का चलन चलाया और यह तरीका उनके समयामयिक चोरों में बड़ा ही लोकप्रिय हो गया, इस तरह दुरबीनसिंह ने चोरों और डकैतो के बीच के फ़ासले को कम करने का एक बुनियादी काम किया और उनकी पद्धतियों (मेथडालाजी) में क्रान्तिकारी परिवर्तन किये।
दुरबीनसिंह की एक विशेषता यह भी थी कि वे सेंध नहीं लगाते थे। वे दीवार फ़ांदने के उस्ताद थे। और कहीं भी आसानी से पोल जम्प के चैम्पियन हो सकते थे।

पर वक्त की बात! (शिवपालगंज में जो बात भी वक्त के खिलाफ़ पड़ती थी, वक्त की बात हो जाती थी) यही ठाकुर दुरबीनसिंह अपने नशेबाज भतीजे का एक जोरदार
तमाचा बुढ़ापे में खाकर कुंए की जगत से नीचे गिर गये। उनकी रीढ़ टूट गयी। कुछ दिनो तक कोने में रखी हुई अपने लाठी को देख-देखकर दुरबीनसिंह अपने
भतीजे के मुंह मे उसे ठूंस देने का संकल्प करते रहे और अन्त में लाठी और भतीजे के मुंह को यथावत छोड़कर वे शिवपालगंज की मिट्टी को वीर-विहीन बनाते
हुए वीरगति को प्राप्त हुए, यानी, 'टें' हो गये।

सनीचर ने दुरबीनसिंह के विषय में अपना संस्मरण सुनाया:
'भैया रंगनाथ, अंधेरी रात थी और मैं भोलूपुर के तिवारियों के बाग के बीच से आ रहा था। तब हमारा भी बचपन था और हम बाघ-बकरी को एक निगाह से देखते
थे। देह में ऎसा जोश कि हवा में डण्डा मारते और पत्ता भी खड़क जाये तो छिटककर मां की गाली देते थे। तो, अंधेरी रात थी और हम हाथ में डण्डा लिये
सटासट चले आ रहे थे, तभी एक पेड़ के पीछे से किसी ने कहा,'खबरदार!'

"हमने समझा कि कोई जिन्न आ गया। उनके सामने तो लाठी-डण्डा सभी बेकार। मैने लाल लंगोटवाले का ध्यान किया, पर भैया, लाल लंगोटवाला तभी काम देगा जब
भूत, प्रेत, जिन्न से मुचेहटा हो। यहां पेड़ के पीछे से काला-कलूटा, गंठी देह का जवान निकलकर मेरे सामने आया और बोला, 'जो कुछ हो, चुपचाप रख दो। धोती- कुर्ता भी उतार दो।'

"मैनें मारने को डण्डा ताना तो क्या देखा कि चारों तरफ़ से पांच-छ: आदमी घेरा डाले हुए हैं। सब बड़ी-बड़ी लाठियां और भाले लिये हुए। हमने भी कहा कि
चलो सनीचर, तुम्हारी भी जोड़-बाकी आज से फ़िस्स। डण्डा मेरा तना-का-तना रह गया, चलाने की हिम्मत न पड़ी।

"एक बोला,'तान के रह क्यो गया? चलता क्यो नही? असल बाप की औलाद हो तो चला दे डण्डा।'

"बड़ा गुस्सा लगा। पर भैया, मैं जब गुस्से में बोला तो रोना आ गया। मैंने कहा' जान न लो माल ले लो।'

"दूसरे ने कहा, 'साले की अधेला-भर की जान, उसके लिए सियार-जैसा फ़े-फ़े कर रहा है। इतना माल छोड़ दे रहा है। अच्छी बात है। धर दे सब माल।'

"बस भैया, एक झोला था, उसमे सत्तू था। एक बढ़िया मुरादाबादी लोटा था। मामा के घर से मिला था। फ़स्ट किलास सूत की डोरी। लोटा क्या था, बिल्कुल
बाल्टी था। कुएं से दो सेर पानी खीचता था। पूड़ियां थी असली घी की। तब यह बनास्पती साला कहां चला था! सब उन्होने गिनकर धरा लिया। फ़िर धोती
उतरवायी, टेंट में एक रुपया था, उसे भी छीन लिया। कुरता और लंगोटा पहने हुये जब मैं खड़ा हो गया, तो एक ने कहां,'अब मुंह में ताला लगाये चुपचाप
अपने घर चले जाओ। चूं-भर किया तो इसे बाग में खोद कर गाड़ दूगां।'

"मैं चलने को हुआ तो एक ने पूछा,' कहां रहता है?

"मैनें कहां,'गंजहा हूं।'

"फ़िर न पूछो, भैया! सब लुटेरे खड़े-खड़े मुहं ताकने लगे। किसी एक ने मुझसे शिवपालगंज के मुखिया का नाम पूछा, दूसरे ने लम्बरदार का, तीसरे ने कहां,'
दुरबीनसिंह को जानते हो?'

"मैने कहा,'दुरबीनसिंह की तरफ़ से लाठी भी चलाने जा चुका हूं। जब रंगपुर में जमावड़ा हुआ था' सुलह न होती तो हजारों लोग वहीं खेत हो जाते। दुरबीनसिंह को गांव के रिश्ते से काका कहता हूं।'

"बस! राम-राम सीताराम! जैसे काले आदमियों में कोई गोरा फ़ौजी पहुंच गया हो। भगदड़ मच गयी। कोई मेरी धोती वापस ला रहा है, कोई कुरता, एक ने जूता
दिया, एक ने मेरे हाथ में झोला पकड़ाया। एक मेरे सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया, बोला, 'तुम्हारी दो पूड़ियां खा ली हैं। इनके दाम ले लो। पर दुरबीनसिंह से न बताना कि हमने तुम्हें घेरा था। चाहे कुछ पैसा ले लो। और कहो तो पेट फ़ाड़कर पूड़ीं निकाल दूं। हमे क्या पता कि भैया, तुम गंजहा हो!

"फ़िर तो सब हमें गांव के पास के ताल तक पहुंचाने आये। बहुत रिरियाते रहे। मैने भी समझाकर उनके आंसू पोछ दिये। कहां कि जब तुम घर के आदमी निकले तो
फ़िर पूड़ी खाने का क्या अफ़सोस! लो, दो-एक और खाओ।

"वह आदमी भागा। कहा,'दादा हमने भर पाया। हमें क्या पता था कि तुम गंजहा हो! बस दादा दुरबीनसिंह से न कहना।'

"हमने कहां,'घर चलो, पानी-पत्ता करके जाना। भूखे हो तो भोजन-भाव कर लेना। पर उन्होंने कहा,'दादा अब हमें जाने दो। तुम भी जाकर सोऒ। कल सवेरे तक यह
सब भूल जाना। किसी से कहना नहीं।'

"सो भैया, मैं घर आकर पड़ रहा। सवेरा होते ही मैने दुरबीनसिंह के जाकर पैर पकड़े कि काका, तुम्हारे नाम में लाल लंगोटवाले का जोर बोल रहा है। तुम्हारा नाम लेकर जान बचा पाया हूं। दुरबीनसिंह ने पांव खीच लिये। बोले,'जा सनिचरा, कोई फ़िकर नहीं। जब तक मै हूं, अंधेरे-उजाले में जहां मन हो वहां घूमा कर। किसी का डर नहीं है। सापं-बिच्छू तू खुद ही निबटा ले, बाकी को हमारे लिए छोड़ दे'।" यहां सनीचर सांस खीचकर चुप हो गया। रंगनाथ समझ गया कि घटिया कहानी-लेखकों की तरह मुख्य बात पर आते-आते वह हवा बांध रहा है। उसने पूछा,"फ़िर तो जब तक दुरबीनसिंह थे, गंजहा लोगों के ठाठ काटते रहे होगे?"
तब रुप्पन बाबू बोले। उन्होनें रंगनाथ की जानकारी में पहली बार एक साहित्यिक बात कही। सांस भरकर कहा:

कि पुरुस बली नहिं होत है, कि समै होत बलवान।
कि भिल्लन लूटी गोपिका, कि वहि अरजुन वहि बान॥

रंगनाथ ने पूछा,"क्या हो गया रुप्पन बाबू? क्या शिवपालगंज से कोई तुम्हारी गोपिकाएं लूट ले गया?"

रुप्पन बाबू ने कहां," सनीचर दूसरावाला किस्सा भी सुना दो।"

सनीचर ने दूसरा अध्याय शुरु किया:
"भैया, लठैती का काम कोई असेम्बली का काम तो नही। असेम्बली में जितने ही बूढ़े होते जाओ, जितने अकल सठियाती जाये, उनकी ही तरक्की होती है। यही
हरनामसिंह को देखो। चलने को उठते है तो लगता है कि गिरकर मर जायेंगे। पर दिन-पर-दिन वहां उनकी पूछ बड़ रही है। यहां लठैती में कल्ले के जोर की बात
है। जब तक चले,तब तक चले। जब नहीं चले, तब हलाल हो गये।
लठैती का काम कोई असेम्बली का काम तो नही। असेम्बली में जितने ही बूढ़े होते जाओ, जितने अकल सठियाती जाये, उनकी ही तरक्की होती है।
"अभी पांच-छ: साल हुए होगें, मै कातिक के नहान के लिए गंगा घाट गया था लौटते-लौटते रात हो गयी। यही भोलूपुर के पास रात हुई। बढ़िया चटक चांदनी। बाग के भीतर हम मौज मे आ गये तो एक चौबोला गाने लगे। तभी किसी ने पीछे से पीठ पर दायें से लाठी मारी। न राम-राम,न दुआ-सलाम, एक दम से लाठी मार दी। अब भैया, चौबोला तो जहां का तहां छूटा, झोला बीस हाथ पर जाकर गिरा। डण्डा अलग छिटक गया। मैं चिल्लाने को हुआ कि तीन-चार आदमी ऊपर आ गये। एक ने मुहं दबाकर कहां,'चुप बे साले! गर्दन ऎंठ दूंगा!' मैने तड़पड़ाकर उठने की कोशिश की, पर भैया, अचकचे में कोई गामा पहलवान पर लाठी छोड़ दे तो वहीं लोट जायेगा, हमारी क्या बिसात? वहीं मुंह बन्द किये पड़े रहे। थोड़ी देर मैं हाथ-पांव जोड़ता रहा। इशारा करके मुझसे कहा कि मैं चिल्लाऊंगा नहीं। तब कहीं उन्होंने मुंह से कपड़ा निकाला। एक ने मूझसे पूछा, रुपया कहां हैं?

"मैने कहा,'बापू, जो कुछ है, इसी झोले मे है।'

"झोले में डेढ़ रुपये की रेजगारी थी। एक लुटेरे ने उसे हाथ में खनखनाकर कहा, लंगोट खोलकर दिखाओगे?'

"मैने कहां,'बापू लंगोट न खुलवाओ। उसके नीचे कुछ नही है। नंगा हो जाऊंगा।'

"बस भैया, वे बिगड़े। उन्होने समझा मै मजाक कर रहा हूं। फ़िर तो उन्होंने देह पर से सभी कुछ उतरवाकर तलाशी ली। गांजा-भांग की खोज में पुलिसवाले भी
ऎसी तलाशी नही लेते। जब कुछ नहीं निकला तो उनमें से एक ने मेरे पीछे एक लात मारी और कहा कि अब चुपचाप मुंह बन्द किये नाक के सामने चले जाओ और
अपने दरबे में घुस जाओ।

"अब तक मेरी बोली लौट आयी थी। मैनें कहा,"बापू तूम लोगो ने हमारी जान छोड़ दी, यह ठीक ही किया है। माल ले लिया तो ले लिया, उसकी फ़िकिर नहीं। हम
भी तुमको बता दें कि तुम नमक से नमक खा रहे हो। तुम हो सरकार के, तो हम भी है दरबार के।'

"वे लोग मेरे पास सिमट आये। पूछने लगे,'कौन हो तुम? कहां रहते हो? किसके साथ हो?'

"मैने कहां,'मै गंजहा हूं। ठाकुर दुरबीनसिंह के साथ रहता आया हूं।'

"फ़िर न पूछो भैया रंगनाथ! सब ठिल्ले मार-मारकर हंसने लगे। एक ने मेरा हाथ पकड़कर अपनी ओर खींचा। मै सोच भी नहीं पाया था कि वह क्या करने जा रहा है,
और उसने एक लंगड़ी मार कर मुझे वही चित कर दिया।'

"मै फ़िर देह से घास-फ़ूस झाड़कर खड़ा हुआ। एक लुटेरे ने जो नयी उमर का सजीला जवान था, कहा,'यह दुरबीनसिंह किस चिड़िया का नाम है? सब फ़िर ठी-ठी करके
उसी तरह हंसने लगे।"

"मैने कहा,'दुरबीनसिंह के नही जानते बापू? क्या बाहर से आये हो? यहां दस कोस के इर्द-गिर्द कोई गंजहा लोगों को नहीं टोकता। दुरबीनसिंह के गांव वालों
को सभी छोड़कर चलते हैं। मगर बापू, तूम नहीं मानते तो ले जाओ मेरा झोला। कोई बात नही।'

"लुटेरे फ़िर ठी-ठी करने लगे। एक बोला, मै,'जानता हूं। अब दुरबीनसिंह के दिन लद गये। ये जितने पुराने लोग थे, थोड़ी लठैती दिखाकर तीसमारखां बन
जाते थे। इनके दुरबीनसिंह लाठी चलाकर, दो-चार दीवारें फ़ादकर बहादुर बन गये। अब बांस के सहारे दीवारें फांदना तो स्कूल तक में सिखा देते हैं।'
ये जितने पुराने लोग थे, थोड़ी लठैती दिखाकर तीसमारखां बन जाते थे। इनके दुरबीनसिंह लाठी चलाकर, दो-चार दीवारें फ़ादकर बहादुर बन गये। अब बांस के सहारे दीवारें फांदना तो स्कूल तक में सिखा देते हैं

"एक लुटेरा बोला,'लाठी चलाना भी तो सिखाते है। मैने खुद वहीं लाठी चलाना सीखा था।'

"पहलेवाला नौजवान बोला, तो यही दुरबीनसिंह बड़े नामवर हो गये। तमंचा तक तो साले के पास है नही। चले हैं जागीरदारी फ़ैलाने।'

"एक दूसरा लुटेरा हाथ में चोर-बत्ती लिये खड़ा था। जेब से उसने एक तमंचा निकाला। कहा,' देख लो बेटा, यही है छ: गोलीवाला हथियार। देसी कारतूस तमंचा नही, असली विलायती,'कहते-कहते उसने तमंचे की नली हमारी छाती पर ठोंक दी। कहता रहा, 'जाकर बता देना अपने बाप को। अन्धों में काना राजा बनने के दिन लद गये। अब वे पड़े-पड़े खटिया पर रोते रहें। कभी अंधेरे-उजाले मे दिख गये तो खोपड़ी का गूदा निकल जायेगा। समझ गये बेटा फ़कीरेदास!'

"इसके बाद भैया, मैं अपने को रोक न पाया। देह में इतना जोश बढा़ कि डण्डा वही फ़ेक-कर बड़े जोर से हिरन की ओर भागा। मेरे पीछे उन लोगो ने फ़िर ठहाका
लगाया। एक चिल्लाकर बोला,'मार साले दुरबीनसिंह को। खड़ा तो रह, अभी मारते-मारते दुरबीन बनाये देता हूं।'

"मगर भैया, भागने में कोई हमारा आज तक मुकाबला नहीं कर पाया। यहां स्कूल-कालिज में लड़कों को सीटी बजा-बजाकर भागना सिखाते है। हम बिना सीखे
ही ऎसा भाग के दिखा दे कि खरगोश तक पछताता रहे। तो भैया गाली-वाली उन्होंने बहुत दी, पर हमें वे पकड़ नही पाये। किसी तरह से मै घर आ पहुंचा।
दुरबीनसिंह के दिन तब तक गिर गये थे। पुलिस भी भीतर-ही-भीतर उनके खिलाफ़ रहने लगी थी। दूसरे दिन हमारा मन बहुत कुलबुलाया, पर हमनें यह बात उनसे
कही नहीं । कह देते तो दुरबीन काका उसी की ठेस में टें बोल जाते।"

रुप्पन बाबू दुखी चेहरे को वजनी चेहरे की तरह लटकाये बैठे थे। सांस खीचकर बोले,"अच्छा ही होता। तब टें हो जाते तो भतीजे के हाथ से न मरते।"


लेखक:श्रीलाल शुक्ल
टंकण सहयोग: कु.शहनाज
अध्याय:
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