राग दरबारी

जानेमाने साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल की रचना "राग-दरबारी" समकालीन साहित्य में एक मील का पत्थर है जिसके लिये उन्हें 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला।

Saturday, January 06, 2007

11.यह पालिसी इन्सानियत के खिलाफ़ है

छत पर कमरे के सामने टीन पड़ी थी। टीन के नीचे रंगनाथ था। रंगनाथ के नीचे चारपाई थी। दिन के दस बजे थे। अब आप मौसम का हाल सुनिए।

कल रात को बादल दिखायी दिये थे, वे अब तक छट चुके थे। हवा तेज और ठण्डी थी। पिछले दिनों गरज के साथ छींटे पड़े थे और इस घपले के खत्म हो जाने पर पूस का जाड़ा अब बाकायदा शुरु हो गया था। बाजार मे बिकनेवाली नब्बे फ़ीसदी
मिठाइयों की तरह धूप खाने में नहीं, पर देखने में अच्छी लग रही थी। वह सब तरफ़ थी। पर लगता था सिर्फ़ सामने नीम के पेड़ पर ही फ़ैली है। रंगनाथ नीम पर पड़ती धूप को देख रहा था। नीम के पेड़ शहर में भी थे और धूप को उन पर पड़ने
की और रंगनाथ को उसे देखने की वहां कोई मुमानियत नही थी। पर उसने यह धूप गांव ही आकर देखी। ऎसा उसी के नहीं, बहुत से लोगो के साथ हुआ करता है।

वास्तव में यहां आ जाने पर रंगनाथ का रवैया उन टूरिस्टों का-सा हो गया था जो सड़कें, हवा, इमारतें, पानी, धूप, देश-प्रेम, पेड़-पौधे, कमीनापन, शराब, कर्मनिष्ठा, लड़कियां और विश्वविद्यालय आदि वस्तुएं अपने देश में नहीं पहचान पाते और उन्हें विदेशों में जाने पर ही देख पाते है। तात्पर्य यह है कि रंगनाथ की आंखें धूप की ओर देख रही थीं। पर दिमाग हमारी प्राचीन संस्कृति में खोया हुआ था, जिसमें पहले से ही सैकड़ो चीजें खोयी हुई हैं और शोधकरताओं के खोजने से ही मिलती हैं।

रंगनाथ ने शोध के लिए एक ऎसा ही विषय चुना था। हिन्दुस्तानियों ने अपनी पुरानी जिन्दगी के बारे में अंग्रेजो की मदद से एक विषय की ईजाद की है जिसका नाम इण्डोलाजी है। रंगनाथ के शोध का सम्बन्ध इसी से था। इण्डोलाजी के शोधकर्ताओं को पहले इस विषय के शोधकर्ताओं का शोध करना पड़ता है और रंगनाथ वही कर रहा था। दो दिन पहले शहर जाकर यूनिवर्सिटी के पुस्तकालय से वह बहुत-सी किताबें उठा लाया था और इस समय नीम पर फ़ैली धूप की मार्फ़त उनका अध्ययन कर रहा था। उनके दायें मार्शल और बायीं ओर कनिंधम विराजमान थे। विण्टरनीत्ज बिल्कुल नाक के नीचे थे। कीथ पीछे की ओर पायजामें से सटे थे। स्मिथ पैताने की ओर ढकेल दिये थे और वहीं उल्टी-पल्टी हालत में राइस डेविस की झलक दिखायी दे रही थी। परसी ब्राउन को तकिये ने ढक लिया था। ऎसी भीड़-भाड़ में काशीप्रसाद जायसवाल बिस्तर की एक सिकुड़न के बीच औधे-मुंह पड़े थे। भण्डारकर चादर के नीचे से कुछ सहमे हुए झांक रहे थे। इण्डोलांजी की रिचर्स का समां बंध गया था।

इसीलिए रंगनाथ को जब अचानक 'हाउ-हाउ' की आवाज सुनायी दी तो स्वाभाविक था कि वह समझता, कोई ऋषि सामवेद का गान कर रहा था। थोड़ी देर में 'हाउ-हाउ' और नजदीक आ गया, उसने समझा कि कोई हरिषेंण समुद्रगुप्त की दिग्विजय फ़ेफ़ड़ा फ़ाड़कर सुना रहा है। इतने में वह 'हाउ-हाउ' बिल्कुल नीचे की गली में सुनायी दिया और उसमें 'मार डालूंगा साले को' जैसे दो-चार ओजस्वी वाक्यों की मिलावट भी जान पड़ी। तब रंगनाथ समझ गया कि मामला खालिस गंजहा है।

वह मुंडेर के पास जाकर खड़ा हो गया। गली में झांकने पर उसे एक नौजवान लड़की दिखायी दी। उसका सिर खुला था, साड़ी इधर-उधर हो रही थी, बाल रुखे और ऊलजलूल थे, उसके होंठ बराबर चल रहे थे। पर इन्हीं बातों से यह न सोच बैठना चाहिए कि लड़की शहर की थी या ताजे फ़ैशन की थी। वह ठेठ देहात की थी, निहायत गन्दी थी और उसके होठ च्यूइंग गम खाने की वजह से नहीं, बल्कि अपने साथ की बकरियों को 'हले-हले-हले' कहने की वजह से हिल रहे थे। चार छ:
छोटी-बड़ी बकरियां दीवार की दरार में उगते हुए एक पीपल के पौधे को चर रही थी, या चरकर किसी दूसरी दरार की ओर उसमें उगनेवाले किसी दूसरे पीपल की तलाश कर रही थी। रंगनाथ चरागाही वातावरण का यह दृश्य देखता रहा और उसमें
'हाउ-हाउ' के उदगम की खोज करता रहा। वहां 'हाउ-हाउ' नहीं था। निगाह हटाते-हटाते उसने लड़की के चेहरे को भी देख लिया। जो लड़की का जिक्र आते ही ताली बजाकर नाचने लगते है और फ़र्श से उछलकर छत से टकरा जाते है, उनके लिए
जैसे कोई भी लड़की ,वैसे ही यह लड़की भी खूबसुरत थी। पर सच बात तो यह है कि बकरियां उससे ज्यादा खूबसूरत थीं।

'हाउ-हाउ' के उदगम का पता नही चला, पर वह आवाज कान में बराबर गूंजती रही। रंगनाथ ने परसी ब्राउन, कनिंघम आदि को छत पर वैसे ही पड़ा रहने दिया और नीचे उतकर दरवाजे पर आ गया। इस समय वैद्यजी दवाखाने का काम कर रहे थे। चार-छ: मरीजों और सनीचर को छोड़कर वहां और कोई नहीं था। 'हाउ-हाउ' की आवाज अब बिल्कुल नुक्कड़ पर आ गयी थी।

रंगनाथ ने सनीचर से पूछा "यह सुन रहे हो?"

सनीचर चबूतरे पर बैठा हुआ कुलहाड़ी में बेंट जड़ रहा था। उसने अपनी जगह से घूमकर हवा की ओर कान उठाया और कुछ क्षणों तक 'हाउ-हाउ' सुनता रहा। अचानक उसके माथे से चिन्ता की झुर्रियां खत्म हो गयीं। उसने इत्मीनान से कहा,"हां, कुछ 'हाउ-हाउ' जैसा सुनायी तो दे रहा है। लगता है, छोटे पहलवान से कुसहर की फ़िर लड़ाई हुई है।"

यह बात उसने इस अन्दाज से कही जैसे किसी भैंस ने दीवार में सींग रगड़ दिये हों। वह घूमकर फ़िर अपने प्रारम्भिक आसन से बैठ गया और बसूले से कुलहाड़ी कें बेंट को पतला करने लगा।

अचानक 'हाउ-हाउ' सामने आ गया। वह लगभग साठ साल का एक बुड्ढा आदमी था। देह से मजबूत। नंगे बदन। पहलवानी ढंग से घुटनों तक धोती बांधे हुए। उसके सिर पर तीन चोटें थी और तीनों से अलग-अलग दिशाओं में खून बहकर दिखा रहा था कि यह एक तरफ़ का खून भी आपस में मिलना पसन्द नहीं करता। वह जोर-जोर से 'हाउ-हाउ' करता हुआ, दोनो हाथ उठाकर हमदर्दी की भीख मांग रहा था।

रंगनाथ खून का दृश्य देख कर घबरा गया। सनीचर से उसने पूछा,"ये? ये कौन है?इन्हें किसने मारा?"

सनीचर ने कुल्हाड़ी का बेट और बसूला धीरे से जमीन पर रख दिया। घायल बुजुर्ग को उसने हाथ पकड़ कर चबूतरे पर बैठाया। बुजुर्ग ने असहयोग के जोश में उसका हाथ झटक दिया, पर बैठने से इन्कार नहीं किया। सनीचर ने आंखे सिकोड़कर उनके घांव का मुआइना किया और फ़िर वैद्यजी की ओर होंठ बिदकाकर इशारे से बताया कि घाव गहरे नहीं है। उधर बुजुर्ग का 'हाउ-हाउ' अब द्रुत लय छोड़कर विलम्बित की तरफ़ आने लगा और बाद में बड़े ही ठस किस्म की ताल में अटक गया। ऎसी बात गायकी की पद्धति के हिसाब से उल्टी पड़ती थी, पर मतलब साफ़ था कि वे उखड़ नहीं रहे हैं बल्कि जमकर बैठ रहे हैं। सनीचर ने सन्तोष की सांस ली, जिसे दूर-दूर तक लोगों ने सुना ही नहीं, देख भी लिया।

रंगनाथ हक्का-बक्का खड़ा था। सनीचर ने एक अलमारी से रुई निकालते हुए कहा,"तुम पूछते हो, इन्हें किसने मारा?यह भी कोई पूछने की बात है?"

एक लोटे में पानी और रुई लेकर वह बुजुर्ग के पास पहुंचा और वहीं से बोला,"इन्हें और कौन मारेगा? ये छोटे पहलावान के बाप है। उसे छोड़कर किस साले मे दम है कि इनको हाथ लगा दे?"

शायद छोटे पहलवान की इस प्रशंसा से कुसहर के-जिनका पूरा नाम कुसहरप्रसाद था- मन को कुछ शान्ति पहुंची। वही से वे वैद्यजी से बोले,"महाराज, इस बार तो छोटुआ ने मार ही डाला। अब मुझे बरदाश्त नही होता। हमारा बंटवारा कर दो, नहीं तो आगे कभी मेरे ही हाथों उसका खून हो जायेगा।"

वैद्यजी तख्त से उतरकर चबूतरे तक आये। घाव को देखकर अनुभवी आदमियों की तरह बोले,"चोट बहुत गहरी नही जान पड़ती। यहां की अपेक्षा अस्पताल जाना ही उचित होगा। वहीं जाकर पट्टी-वट्टी बंधवा लो।" उसके बाद उपस्थित लोगों को
संबोधित करते हुये बोले,"छोटे का आज से यहां आना बन्द! ऐसे नारकीय लोगों के लिए यहां स्थान नहीं है।"

रंगनाथ का खून उफ़नाने लगा। बोला,"ताज्जुब है, इस तरह के लोगों को बद्री दादा अपने पास बैठालते है।"

बद्री पहलवान धीरे से घर के बाहर आ गये। लापरवाही से बोले,"पढे़-लिखे आदमी को समझ-बूझकर बोलना चाहिए। क्या पता किसका कसूर है? ये कुसहर भी किसी से कम नहीं है। इनके बाप गंगादयाल जब मेरे थे तो यह उनकी अर्थी तक नहीं निकलने दे रहे थे। कहते थे कि घाट तक घसीटकर डाल आयेगे।"

कुसहरप्रसाद ने एक बार फ़िर बड़े कष्ट से 'हाउ-हाउ' कहां, जिसका अर्थ था कि बद्री ऎसी बात कहकर बड़ा अत्याचार कर रहे हैं। फ़िर वे अचानक उठकर खड़े हो गये और दहाड़कर बोले,"बैद महाराज, अपने लड़के को रोको। ये सब इसी तरह की बातें कहकर एकाध लाशें गिरवाने पर तुले हैं। इन्हें चुप करों, नही तो खून हुए बिना नही रहेगा। अस्पताल तो मै बाद में जाऊंगा, पहले मैं थाने पर जा रहा हूं। छोटुआ को इस बार अदालत का मुंह न दिखाया तो गंगादयाल की नही,दोगले की औलाद कहना। मैं तो यहां तुम्हें सिर्फ़ घाव दिखाने आया था। देख लो बैद महाराज, यह खून बह रहा है अच्छी तरह देख लो तुम्हीं को गवाही में चलना पड़ेगा।

वैद्यजी ने घाव देखने की इच्छा नहीं दिखायी। वे अपनें मरीजों की ओर देखने लगे। साथ ही प्रवचन देने लगे कि पारस्परिक कलह शोक का मूल है। यह कहते हुए, उदाहरण देने के लिए, वे झपटकर इतिहास के कमरें में घुसे और यही कहते हुए पुराण के रोशनदान से बाहर कूद आये।पारस्परिक कलह को शोक का मूल साबित करके उन्होनें कुसहर को सलाह दी कि थाना-कचहरी के चक्कर में न पड़ना चाहिए। उसके बाद वे दूसरे प्रवचन पर आ गये। जिसका विषय था कि थाना-कचहरी भी शोक का मूल हैं।

कुसहर ने दहाड़कर कहा,"महाराज, यह ज्ञान अपने पास रखो। यहां खून की नदी बह गयी और तुम हम पर गांधीगीरी ठांस रहे हो। यदि बद्री पहलवान तुम्हारी छाती पर चढ़ बैठे तो देखूंगा, इहलोक बांचकर कैसे अपने मन को समझाते हो!"

वैद्यजी की मूंछे थरथरायी, जिससे लगा कि वे अपमानित हुए है। पर उनके मुंह पर मुस्कान छिटक गयी, जिससे लगा कि वे अपमानित होना नहीं जानते। उपस्थित लोगों के चेहरे खिंच गये और साफ़ जाहिर हो गया कि कुसहर को अब यहां हमदर्दी की भीख नही मिलेगी। बद्री पहलवान ने दुत्कारकर कहा,"जाओ, जाओ!लगता है, छोटुआ से लड़कर लड़ास पूरी नही हुई हैं। जाकर पट्टी-वट्टी बंधवा लो। यहां बहुत न टिलटिलाओ।"

छोटे पहलवान, जैसाकि अब तक जाहिर हो चूका होगा, खानदानी आदमी थे। उन्हें अपने परदादा तक का नाम याद था और हर खानदानी आदमी की तरह वे उनके किस्से बयान किया करते थे। कभी-कभी अखाड़े पर वे अपने साथियों से कहते:

"हमारे परदादा का नाम भोलानाथ था। उन्हें बड़ा गुस्सा आता था। नथुने हमेशा फ़ड़का ही करते थे। रोज सवेरे उठकर वे पहले अपने बाप से टुर्र-पुर्र करते थे, तब मुहं में पानी डालते थे। टुर्र-पुर्र न होती तो उनका पेट गड़गड़ाया करता।"

छोटे पहलवान की बातों से अतीत का मोह टपकता था। उनके किस्से सुनते ही उन्नीसवी सदी के किसी गांव की तस्वीर सामने आ जाती थी, जिसमें गाय-बैलों से भरे-पूरे दरवाजे पर, गोबर और मूत की ठोस खुशबू के बीच,नीम की छांव तले, जिस्म पर टपकी हुई लसलसी निमकौड़िया झाड़ते हुए दो महापुरुष नंगे बदन अपनी-अपनी चारपाईयों से उठ बैठते थे और उठते ही एक-दूसरे को देर तक सोते रहने के लिए गाली देने लगते थे। दो में एक बाप होता था, एक बेटा। फ़िर दोनो एक-दूसरे को जमीन में जिन्दा गाड़ देने की बात करते हुए अपनी-अपनी चारपाइयां छोड़ देते और मुख्य विषय से दूर जाकर, दो-चार अनर्गल बातें कहकर, अपने-अपने काम में लग जाते। एक बैलो की पूंछ उमेठता हुआ अपने खेतों की ओर चला जाता, दूसरा भैंस चराने के लिए दूसरों के खेतों की ओर चला जाता।

छोटे पहलवान इसी तरह का कोई किस्सा खत्म करके बाद मे कहते,"अपने बाप के मर जाने पर बाबा भोलानाथ बहुत दुखी हुए....।"

छोटे पहलवान ये बातें शेखी बघारने के लिए नहीं कहते थे। ये बिल्कुल सच थी। उनका खानदान ही ऎसा था। उनके यहां बाप-बेटे में हमेशा से बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध चला आ रहा था। प्रेम करना होता तो एक-दूसरे से प्रेम करते,लाठी चलाना होता तो एक-दूसरे पर लाठी चलाते। जो भी अच्छा-बुरा गुण उनके हाथ में था उसकी आजमाइश एक-दूसरे पर ही किया करते।

बाबा भोलानाथ अपने बाप के मर जाने पर सचमुच ही बहुत दुखी हुए। उनके जीवन में एक रीतापन आ गया। उनके न रहने पर सबेरे से ही किसी से झगड़ा करने के लिए उनका पेट गड़गड़ाने लगता। मुंह में पानी डालने का मन न होता। दिन-रात
खेतों पर बैल की तरह जुते रहने पर भी उन्हें अपच की शिकायत रहने लगी। अब उनके लड़के गंगादयाल उनके काम आये। कहा भी है कि लड़का बुढ़ापे में आंख की ज्योति होता है। तो गंगादयाल ने एक दिन सत्रह साल की उमर में ही अपने बाप
भोलानाथ को इतने जोर से लाठी मारी कि वे वहीं जमीन पर गिर गये, उनकी आंखे कौड़ी-जैसी निकल आयीं और उनकी आंखों के सामने ज्योति की वर्षा होने लगी।

उसके बाद बाप-बेटे का सम्बन्ध हमेशा के लिए सुस्थिर हो गये। भोलानाथ अपने बाप की जगह पर आ गये और उनकी जगह गंगादयाल ने ले ली। कुछ दिनों बाद हाथ-पांव-पीठ दर्द रहने के कारण उनका अपच तो ठीक हो गया, पर उनके कानों में बराबर सांय-सांय सी होने लगी। शायद कान के पर्दो को फ़ाड़नेवाली गंगादयाल की गालियां सुनते-सुनते उनके कानो में एक स्थायी अनुगुंज बस गयी थी। जो भी हो, अब सबेरे-सबेरे घर में टुर्र-पुर्र करने के लिए गंगादयाल का पेट गड़गड़ाने लगा।

गंगादयाल के लड़के कुसहरप्रसाद छोटू पहलवान के बाप थे। कुसहरप्रसाद स्वभाव से गम्भीर थे, इसलिए वे गंगादयाल से व्यर्थ गाली-गलौज नहीं करते थे। उन्होनें रोज सवेरे खेतों पर जाने से पहले अपने बाप से झगड़ा करने की परम्परा भी खत्म कर दी। इसकी जगह उन्होनें मासिक रुप से युद्ध करने का चलन चलाया। बचपन से ही गंगादयाल को फ़ूहड़ गालियां देने में ऎसी दक्षता प्राप्त हो गयी थी कि नौजवान गंजहे उनके पास शाम को आकर बैठने लगे थे। वे उनकी मौलिक गालियों को सुनते और बाद में उन्हें अपनी बनाकर प्रचारित करते। गालियों और ग्राम गीतों का कापीराइट नही होता। इस हिसाब से गंगादयाल की गालियां हजार कण्ठों से ह्जार पाठान्तरों के साथ फ़ूटा करती थीं। पर कुसहरप्रसाद अपने बाप की इस प्रतिभा से ज्यादा प्रभावित नहीं हुए। चुपचाप उनकी गालियां सुनते रहते और महीने में एक बार उन पर दो-चार लाठियां झाड़कर फ़िर अपने काम में लग जाते। यह पद्धति अपच की पारिवारिक बीमारी के लिए बड़ी लाभप्रद साबित हुई, क्योकिं खानदान में अपच की शिकायत गंगादयाल के साथ ही खत्म हो गयी।

कुसहरप्रसाद के दो भाई थे। एक बड़कऊ और एक छोटकऊ। बड़कऊ और छोटकऊ शान्तिप्रिय और निरस्त्रीकरण के उपासक थे। उमर-भर उन्होनें कभी कुत्ते पर लाठी नही उठायी। बिल्लियां स्वच्छन्दतापूर्वक उनका रास्ता काट जाती थीं,पर उन्होनें कभी उन्हें ढेला तक नहीं मारा। उन्होंने अपने बाप से गाली देने की कला सीख ली थी और उसके सहारे रोज शाम को सभी पारिवारिक झगड़ों को बिना किसी मार-पीट के सुलझाया करते थे। रोज शाम को दोनो भाइयों और उनकी औरतों में कांव-कांव शुरु होता और बैठक रात के दस बजे तक चलती। इस प्रकार से इन बैठकों का महत्व सुरक्षा-समिति की बैठकों का-सा था जहां लोग कांव-कांव करके युद्ध की स्थिति को काफ़ी हद तक टालने में मदद करते हैं।

इस दृष्टि से रोज शाम को कुसहरप्रसाद के खानदान में उठनेवाले कोहराम को गिरी निगाह से देखना प्रतिक्रियावाद की निशानी होगी; पर पास-पड़ोसवालों का राजनीतिक बोध इतना विकसित न था। अत: जैसे शाम को छोटकऊ और बड़कऊ की गालियां व हाहाकार गाली के कुत्तों की भूंक-भांक के ऊपर उठकर शिवपालगंज के आसमान में बर्छियां-सी चुभोने लगते, पड़ोसियों की आलोचनायें शुरु हो जाती।

"अब यह कुकरहाव आधी रात तक चलेगा।"

"किसी दिन एक फ़टा जूता लेकर इन पर पिल पड़ा जाये, तभी काम बनेगा।"

"इनकी जुबान को संग्रहणी लग गयी है। चलती है तो चलती ही रहती है।"

'कुकरहाव' गंजही बोली का शब्द है। कुत्ते आपस में लड़ते है और एक-दूसरे को बढा़वा देने के लिए शोर मचाते हैं। उसी को कुकरहाव कहते हैं।

शब्द-शास्त्र के इस पेंच को देखते हुए छोटकऊ और बड़कऊ के वार्त्तालाप को कुकरहाव कहना गलत होगा। सच तो यह है कि वे दोनों-सपत्नीक-बंदरहाव करते थे।

वे बन्दरों की तरह खों-खों करते हुए एक-दूसरे पर झपटते, फ़िर बिना किसी के रोक हुए, अपने-आप रुक जाते। अगर उस समय कोई बाहरी आदमी रुककर उनकी ओर देखने लगता या शान्ति के फ़ाख्ते की तजवीज करता, तो दोनों खों-खों करते हुए
एक साथ उसी पर झपट पड़ते। बंदरहाव के ये नियम सभी गजहों को मालूम थे: इसलिए छोटकऊ बड़कऊ की पारिवारिक बैठकों की समीक्षाएं छिपे-छिपे होती थी और उधर वे बैठके निबाध रूप से आधी रात तक चला करती थीं।

छोटे पहलवान के पिता कुसहरप्रसाद अपने भाइयों के वाग्विलास को न समझ पाते थे। जैसे बताया गया, वे कम बोलनेवाले कर्मशील आदमी थे। रह-रहकर चुपचाप किसी को मार बैठना उनके स्वभाव की अपनी विशेषता थी, जो इन आदमियों के
जीवन-दर्शन से मेल नहीं खाती थी। इसलिए, अपने बाप गंगादयाल के मरने पर, कुछ साल बाद, वे अपने भाइयों से अलग हो गये: अर्थात बिना बोले हुए, लाठी के जोर से उन्होने अपने भाइयों को घर के बाहर खदेड़ा, उन्हें एक बाग में झोपड़ी डालकर, वाणप्रस्थ-आश्रम में रहने के लिए ढकेल दिया और खुद अपने नौजवान लड़के के साथ अपने पैतृक घर में पूरी पैतृक परम्पराओं के साथ गृहस्थी चलाने लगे।

महीने में एक बार अपने बाप पर लाठी उठाते-उठाते कुसहरप्रसाद के हाथों की कुछ ऎसी आदत पड़ गयी थी कि गंगादयाल के मर जाने पर उनके हाथ महीनें में दो-चार दिन तक सुन्न रहने लगे। लकवा के खतरे को दूर करने के लिए एक दिन उन्होंने फ़िर लाठी उठायी और छोटे की कमर पर तिरछी करके जड़ दी। छोटे अभी पहलवान नहीं बने थे, पर उनके गांव के पास रेलवे लाइन थी। उसके किनारे तार के खम्भे थे, खम्भों पर सफ़ेद-सफ़ेद इंसुलेटर लगे थे। उनके तोड़ते-तोड़ते केवल अभ्यास की बदौलत, छोटे के ढेले का निशान छोटी उम्र में ही अचूक हो गया था। जिस दिन कुसहरप्रसाद ने छोटे की कमर पर लाठी मारी, उसी दिन छोटे ने एक खम्भे के सभी इंसुलेटर रेलवे के द्धारा दिये गये पत्थरों से तोड़कर रेलवे-लाइन के ही किनारे बिछा दिये थे। लाठी खाकर वे रेलवे-लाइन की दिशा में बीस कदम भागे और वही से उन्होंने अपने बाप की खोपड़ी को इंसुलेटर समझकर एक ढेला फ़ेका। बस, उसी दिन से बाप-बेटे में उनके परिवार का सनातन-धर्म प्रतिष्ठित हो गया। फ़िर तो, लगभग हर महीने कुसहर की देह पर घाव का एक छोटा-सा निशान स्थायी ढंग से दिखने लगा और कुछ वर्षो के बाद वे अपने इलाके के राणा सांगा बन गये।

छोटे पहलवान के जवान हो जाने पर बाप-बेटों ने शब्दों का प्रयोग बन्द ही कर दिया। अब वे उच्च कोटि के कलाकारों की तरह अपना अभिप्राय छापों, चिन्हों और बिम्बों की भाषा में प्रकट करने लगे। उनके बीच में मारपीट की घटनाएं भी कम होने लगी और धीरे-धीरे उसने एक रस्म का-सा रुप ले लिया, जो बड़े-बड़े नेताओं की वर्ष-गांठ की तरह साल में एक बार, जनता की मांग हो या न हो, नियमित रुप से मनायी जाने लगी।

कुसहरप्रसाद के चले जाने पर एक आदमी ने चबूतरे के नीचे खड़े-खड़े कहा," इसी को कलजुग कहते है! बाप के साथ बेटा ऎसा सलूक कर रहा है!"

आसमान की ओर आंखें उठाकर, सिर पर फ़ैली हुई नीम की टहनियों में झांकते हुए,उसने फ़िर कहा,"कहां हो प्रभो? अब लोगे कलंकी अवतार?"

जवाब में आकाशवाणी नहीं हुई। एक कौआ तक नहीं बोला। किसी अबाबील ने बीट तक नही की। कलंकी अवतार की याद करनेवाले का चेहरा गिर गया। पर सनीचर ने कुल्हाड़ी के बेंट को परखते हुए तीखी आवाज में कहां,"जाओ, तुम भी कुसहर के
साथ चले जाओ। गवाही में जाकर खड़े हो जाना। रुपया-धेली वहां भी मिल ही जायेगी।"

बद्री पहलवान ने मुस्कराकर इस बात का समर्थन किया। रंगनाथ ने देखा, कलंकी अवतार की याद करनेवाला व्यक्ति एक पुरोहितनुमा बुड्ढा है। पिचके हुए गाल। खिचड़ी दाढ़ी। बिना बटन का कुरता। सिर पर अस्त-व्यस्त गांधीटोपी, जिसके पीछे
चुटिया निकलकर आसमानी बिजली गिरने से शरीर की रक्षा कर रही थी। माथे पर लाल चंदन का टीका। गले मे रुद्राक्ष की माला।

वह आदमी सचमुच ही कुसहरप्रसाद के पीछे चला गया। सनीचर ने कहा,"यही राधेलाल है। आज तक इन्हें बड़े-से-बड़ा वकील भी जिरह करके नही उखाड़ पाया।"

सनीचर के पास एक तमाशबीन खड़ा था। उसने श्रद्धा से कहा, "राधेलाल महाराज को किसी देवता का इष्ट है। झूठी गवाही सटासट देते चले जाते है। वकील टुकर-टुकर देखते रहते है। बड़ों-बड़ों की बोलती बन्द हो जाती है।"

कुछ देर तक राधेलाल की प्रशंसा होती रही। सनीचर और तमाशबीन में लगभग एक बहस-सी हो गयी। सनीचर की राय थी कि राधेलाल बड़ा काइयां है और शहर के वकील बड़े भोदूं हैं, तभी वे उसे जिरह मे नही उखाड़ पाते। उधर तमाशबीन इसे चमत्कार और देवता के इष्ट के रूप में मानने पर तुला था। तर्क और आस्था की लड़ाई हो रही थी और कहने की जरूरत नहीं कि आस्था तर्क को दबाये दे रही थी।

उसी समय छोटे पहलवान बगल एक गली से अकड़ते हुए निकले। वैद्यजी के दरवाजें आकर उन्होने इधर-उधर ताक-झांक की। फ़िर पूछा,"चले गये?"

सनीचर ने कहा,"हां, गये। पर पहलवान, यह पालिसी इन्सानियत के खिलाफ़ है।"

छोटे ने दांत पीसकर कहा,"इन्सानियत की तो ऎसी की तैसी, और तुम्हें क्या कहूं?"

सनीचर कुल्हाड़ी हाथ में लेकर खड़े हो गये। पुकारकर बोले,"बद्री भैया,देखो, तुम्हारा बछेड़ा मुझ पर दुलती झाड़ रहा है। संभालो!"

वैद्यजी छोटे को देखकर उठ खड़े हुए। रंगनाथ से बोले," ऎसे नीच का मुंह देखना पाप है। इसे यहां से भगा दो।" कहकर वे घर के अन्दर चले गये।

छोटे पहलवान बैठक के अन्दर आ गये थे। धूप फ़ैली हुई थी। सामने नीम के पेड़ पर बहुत- से तोते 'टें-टें' करते हुए उड़ रहे थे। चबूतरे पर सनीचर कुल्हाड़ी लिये खड़ा था। बद्री पहलवान एक कोने में चुपचाप खड़े मुगदर की जोड़ी तौल रहे थे। रंगनाथ वैद्यक की किसी किताब के पन्ने उलट रहा था। छोटे को लगा कि उसके खिलाफ़ विद्रोह की हवा फ़ैली हुई है। जवाब मे वे सीना फ़ुलाकर धचक के साथ रंगनाथ के पास बैठ गये और जबड़े घूमा-घूमाकर मुंह के अन्दर पहले से सुरक्षित सुपारी की जुगाली करने लगे।

छोटे ने रंगनाथ को यों देखा जैसे उनकी निगाह के सामने कोई भुनगा उड़ रहा हो। उखड़ी हुई आवाज में जवाब दिया,"यह बात है तो मैं जाता हू। मैं तो बद्री गुरू का घर समझकर आया हूं। अब तुम्हीं लोगो की हुकूमत है, तो यहां पेशाब करने भी नहीं आऊगां।"

रंगनाथ ने हंसकर बात को हल्का करना चाहा। कहा,"नहीं, नहीं, बैठो पहलवान। दिमाग गरम हो रहा हो तो एक ठण्डा पानी पी लो।"

फ़िर उसी तरह उखड़ी आवाज में छोटे ने कहा,"पानी! मैं यहा टट्टी तक के लिए पानी नहीं लूंगा। सब लोग मिलकर चले है हमको लुलुहाने।"

बद्री ने अब छोटे की ओर बड़प्पन के निगाह से देखा और एक मुगदर को बायें हाथ से तौला। देखते-देखते मुस्कराये। बोले,"गुस्सा तो कमजोरी का काम है। तुम क्यों ऎठ रहे हो? आदमी हो कि पायजामा?"

छोटे पहलवान समझ गये कि उस कोने से उन्हें सहारा मिल रहा है। अकड़ दिखाते हुए बोले,"मुझे अच्छा नही लगा बद्री गुरू! सभी दमड़ी जैसी जान लिये हुये मुझॆ लुलुहाते घूम रहे है। कहते है, बाप को क्यों मारा! बाप को क्यों मारा!! लगता है कुसहरप्रसाद शिवपालगंज में सबके बाप ही लगते है। जैसे मैं ही उनका एक दुश्मन हूं।"

छोटे पहलवान और भी उखड़ गये। बोले,"गुरू साला बाप-जैसा बाप हो, तब तो एक बात भी है।" थोड़ी देर सब चुप रहे।"

रंगनाथ छोटे पहलवान की चढ़ी हुई भौहों को देखता रहा। सनीचर भी अब तक बैठक मे आ गया था। समझाते हुए बोला,"ऎसी बात मुंह से न निकलानी चाहिए। धरती-धरती चलो। आसमान की छाती न फ़ाड़ो। आखिर कुसहर ने तुम्हें पैदा किया है,पाला-पोसा है।"

छोटे ने भुनभुनाकर कहां,"कोई हमने इस्टाम्प लगाकर दरखास्त दी थी कि हमें पैदा करो! चले साले कही के पैदा करनेवाले!"

बद्री चुपचाप यह वार्तालाप सुन रहे थे। अब बोले,"बहुत हो गया छोटे, अब ठण्डे हो जाओ।"

छोटे अनमने होकर बैठे रहे। नीम के पेड़ पर होनेवाली तोतों 'टॆ-टे' सुनते रहे। आखिर में एक सांस खीचकर बोले,"तुम भी मुझी को दबाते हो गुरू! तुम जानते नही, यह बुड्ढा बड़ा कुलच्छनी है। इसके मारे कहारिन ने घर में पानी भरना बन्द कर दिया है। और भी बताऊं? अब क्या बताऊं. कहते जीभ गन्धाती है।"

लेखक: श्रीलाल शुक्ल
टंकण सहयोग: कु. शहनाज़
अध्याय:
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