राग दरबारी

जानेमाने साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल की रचना "राग-दरबारी" समकालीन साहित्य में एक मील का पत्थर है जिसके लिये उन्हें 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला।

Thursday, December 14, 2006

9. कभी न उखड़ने वाला गवाह- पंडित राधेलाल

कोऑपरेटिव यूनियन का गबन बड़े ही सीधे-सादे ढ़ंग से हुआ था। सैकड़ों की संख्या में रोज होते रहनेवाले ग़बनों की अपेक्षा इसका यही सौन्दर्य था कि यह शुद्ध गबन था, इसमें ज्यादा घुमाव-फिराव न था। न इसमें जाली दस्तखतों
की जरुरत पड़ी थी, न फर्जी हिसाब बनाया गया था, न नकली बिल पर रुपया निकाला गया था। ऐसा गबन करने और ऐसे गबन को समझने के लिए किसी टेक्नीकल योग्यता की नहीं, केवल इच्छा-शक्ति की जरुरत थी।
कोऑपरेटिव यूनियन का गबन बड़े ही सीधे-सादे ढ़ंग से हुआ था। सैकड़ों की संख्या में रोज होते रहनेवाले ग़बनों की अपेक्षा इसका यही सौन्दर्य था कि यह शुद्ध गबन था, इसमें ज्यादा घुमाव-फिराव न था।


कोऑपरेटिव यूनियन का एक बीज गोदाम था जिसमें गेहूँ भरा हुआ था। एक दिन यूनियन का सुपरवाइजर रामसरुप दो ट्रक साथ में लेकर बीजगोदाम पर आया। ट्रकों पर गेहूँ के बोरे लाद लिये गये और दूर से देखने वाले लोगों ने समझा कि यह तो कोऑपरेटिव में रोज होता ही रहता है। उन्हें पड़ोस के दूसरे बीजगोदाम में पहुँचाने के लिए रामसरुप खुद एक ड्राइवर के बगल में बैठ गया और ट्रक चल पड़े। सड़क से एक जगह कच्चे रास्ते पर मुड़ जाने से पाँच मील आगे दूसरा बीजगोदाम मिल जाता; पर ट्रक उस जगह नहीं मुडे़, वे सीधे चले गये।

यहीं से गबन शुरु हो गया। ट्रक सीधे शहर की गल्ला मण्डी में पहुँच गये। वहाँ गेहूँ के बोरे उतारकर दोनों ट्रक गबन के बारे में सबकुछ भूल गये और दूसरे दिन आस-पास के क्षेत्र में पूर्ववत कोयला और लकड़ी ढ़ोने लगे। रामसरुप का उसके बाद काफी दिन तक पता नहीं चला और लोगों ने विश्वास कर लिया कि गेहूँ बेचकर, कई हजार रुपये जेब में भरकर वह बम्बई की ओर भाग गया है। यह पूरी घटना स्थानीय थाने में गबन की एक रिपोर्ट की शक्ल में आ गयी और बकौल वैद्यजी के, 'काँटा-सा निकल गया।'

पर यूनियन के एक डाइरेक्टर ने कल शहर जाकर एक ऐसा दृश्य देखा जिससे पता चला कि रामसरुप ने वे रुपये खर्च करने के लिए बम्बई को नहीं अपने इलाके के शहर को ही प्राथमिकता दी है। डाइरेक्टर साहब यों ही, सिर्फ़ शहर देखने के मतलब से, शहर देखने गये थे। इन अवसरों पर और कार्यक्रमों के साथ उनका कम -से-कम एक स्थायी कार्यक्रम होता था-किसी पार्क में पहुँचना, किसी पेड़ के नीचे बेंच पर बैठना, लैया-चना चबाना, रंगीन फूलों और लड़कियों को ध्यानपूर्वक देखना और किसी कम-उम्र छोकरे से सिर पर तेल मालिश कराना।

जब वे इस कार्यक्रम की मद आखिरी मद पर पहूँचे तो एक घटना हुई। वे उस समय पेड़ के नीचे बेंच पर बैठे थे, उनकी आँखें मुँदी हुई थीं और उनके सिर पर छोकरे की पतली और मुलायम उँगलियाँ 'तिड़-तिड़-तिड़-तिड़' की आवाज निकाल रही थीं। लड़का उल्लास के साथ उनके बालों पर तबले के कुछ टेढ़े-मेढ़े बोल निकाल रहा था और वे आँखें मूँदे अफसोस के साथ सोच रहे थे कि शायद वह तेल-मालिश का कार्यक्रम जल्द ही खत्म कर देगा। एक बार उन्होंने आँख खोलकर पीछे की ओर
गरदन घुमाने की कोशिश की, पर तेल-मालिश का असर-उसमें इतनी अफ़सरी आ गयी थी कि वह घूमी ही नहीं। अतः उन्होंने लड़के का मुँह तो नहीं देखा, जो कुछ सामने था उसे ही देखकर सन्तोष करना चाहा।

उन्होंने देखा, सामने एक पेड़ था और उसके नीचे बेंच पर रामसरुप सुपरवाइजर बैठा था। वह भी एक लड़के से सिर पर तेल-मालिश करा रहा था और 'तिड़-तिड़-तिड़-तिड़' की सुखपूर्ण अनुभूति में खोया हुआ था। दोनों पक्ष उस समय परमहंसों के भाव से अपने-अपने जगत में तल्लीन थे। शान्तिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए यह आदर्श स्थिति थी। अतः उन्होंने एक-दूसरे के मामले में हस्तक्षेप नहीं किया। लगभग पन्द्रह मिनट वे अपनी-अपनी बेंच पर अच्छे पड़ोसियों की तरह बैठे हुए एक-दूसरे को देखकर भी अनदेखा करते रहे। फिर देह तोड़कर दोनों पक्ष उठ खडे हुए और अपने-अपने मालिशकर्ता को यथोचित पारिश्रमिक देकर, उन्हें दोबारा वहीं मिलने के लिए प्रोत्साहित करके,पंचशील के सिद्धांतों के अनुसार वे अपने-अपने रास्ते लग गये।

शिवपालगंज की ओर लौटते समय डाइरेक्टर को जान पड़ने लगा कि मालिश के सुख के पीछे उन्होंने कोऑपरेटिव आन्दोलन के साथ विश्वासघात किया है। उन्हें याद आया कि रामसरुप फ़रार है और पुलिस उसकी तलाश में है। अगर वे रामसरुप को पकड़वा दे तो गबन का मुकदमा चल निकलता। शायद उनका नाम अखबार में भी छपता। यह सब सोचकर वे दुखी हुए। उनकी आत्मा उनको कुरेदने लगी। अतः वापस आते ही आत्मा के संतोष के लिए वे वैद्यजी से मिले और हिंग्वाष्टक चूर्ण की पुड़िया फाँककर उनसे बोले, "मुझे आज पार्क में ऐसा आदमी दिखायी दिया था जो बिल्कुल रामसरुप-जैसा था।"

वैद्यजी ने कहा, "होगा। कुछ आदमियों की आकृतियाँ एक-सी होती हैं।"

डाइरेक्टर को लगा कि इतने से उनकी आत्मा उनका पीछा न छोड़ेगी, थोड़ी देर इधर-उधर देखकर उन्होंने कहा, "मैंने तभी सोचा था कि हो-न-हो, यह रामसरुप ही है।"

वैद्यजी ने डाइरेक्टर पर अपनी आँखें गड़ा दीं। उन्होंने फिर कहा, "रामसरुप ही था। मैंने सोचा कि यह साला यहाँ क्या कर रहा है। मालिश करा रहा था।"

"तुम वहाँ क्या कर रहे थे?"

डाइरेक्टर थोड़ी देर सोचते रहे। फिर सोच-समझकर बोले, "मैंने सोचा, कहीं रामसरुप यह जान न जाये कि उसे देख लिया गया है। इसीलिए पुलिस को इत्तला नहीं दी।"
सनीचर पृथ्वी पर वैद्यजी को एकमात्र आदमी और स्वर्ग में हनुमानजी को एकमात्र देवता मानता था और दोनों से अलग-अलग प्रभावित था। हनुमानजी सिर्फ़ लँगोटा लगाते हैं, इस हिसाब से सनीचर भी सिर्फ़ अण्डरवियर से काम चलाता था। जिस्म पर बनियान वह तभी पहनता जब उसे सज-धजकर कहीं के लिए निकलना होता। यह तो हुआ हनुमानजी का प्रभाव; वैद्यजी के प्रभाव से वह किसी भी राह-चलते आदमी पर कुत्ते की तरह भौंक सकता था, पर वैद्यजी के घर का कोई कुत्ता भी हो, तो उसके सामने वह अपनी दुम हिलाने लगता था।

गबन का अभियुक्त बम्बई में नहीं, बल्कि पन्द्रह मील की दूरी पर ही है और तेल-मालिश कराने के लिए उसका सिर अब भी कन्धों पर सही-सलामत रखा है, इस सूचना ने वैद्यजी को उलझन में डाल दिया। डाइरेक्टरों की बैठक बुलाना जरुरी हो गया। पूरी बात उन्होंने खाली-पेट सुनी थी, उसे भंग पीकर भी सुना जा सके इसलिए बैठक का समय सायंकाल के लिए रखा गया।

सनीचर पृथ्वी पर वैद्यजी को एकमात्र आदमी और स्वर्ग में हनुमानजी को एकमात्र देवता मानता था और दोनों से अलग-अलग प्रभावित था। हनुमानजी सिर्फ़ लँगोटा लगाते हैं, इस हिसाब से सनीचर भी सिर्फ़ अण्डरवियर से काम चलाता था। जिस्म पर बनियान वह तभी पहनता जब उसे सज-धजकर कहीं के लिए निकलना होता। यह तो हुआ हनुमानजी का प्रभाव; वैद्यजी के प्रभाव से वह किसी भी राह-चलते आदमी पर कुत्ते की तरह भौंक सकता था, पर वैद्यजी के घर का कोई कुत्ता भी हो, तो उसके सामने वह अपनी दुम हिलाने लगता था। यह दूसरी बात है कि वैद्यजी के घर पर कुत्ता नहीं था और सनीचर के दुम नहीं थी। उसे शहर की हर चीज में, और इसलिए रंगनाथ में काफी दिलचस्पी थी। जब रंगनाथ दरवाजे पर होता, सनीचर भी उसके आसपास देखा जा सकता था। आज भी यही हुआ।

वैद्यजी कोऑपरेटिव यूनियन की बैठक में गये थे। दरवाजे पर सिर्फ़ रंगनाथ और सनीचर थे। सूरज डूबने लगा था और जाड़े की शाम के साथ हर घर से उठनेवाला कसैला धुआँ मकानों के उपर लटक गया था। कोई रास्ते पर खट-खट करता हुआ निकला। किसी भी शारीरिक विकार के लिए हम भारतीयों के मन में जो सात्विक घृणा होती है, उसे थूककर बाहर निकालते हुए सनीचर ने कहा, "लँगड़वा जा रहा है, साला!" कहकर वह उछलता हुआ बाहर चबूतरे पर आ गया और वहाँ मेंढक की तरह बैठ गया।

रंगनाथ ने पुकारकर कहा, "लंगड़ हो क्या?"

वह कुछ आगे निकल गया था। आवाज सुनकर वह वहीं रुक गया और पीछे मुड़कर देखते हुए बोला, "हाँ बापू, लंगड़ ही हूँ।"
"मिल गयी नकल?"

रंगनाथ के इस सवाल का जवाब सनीचर ने दिया, "नकल नहीं, इन्हें मिलेगा सिकहर*। उसी में टाँग लटकाकर झूला करेंगे।"

लंगड़ पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वहीं से उसने पुकारकर कहा, " नकल तो नहीं मिली बापू, आज नोटिस-बोर्ड पर ऐतराज छपा है।"

"क्या हुआ? फिर से फीस कम पड़ गयी क्या?"

"फीस नहीं बापू," वह अपनी बात को सुनाने के लिए चिल्ला रहा था, "इस बार मुकदमे के पते में कुछ गलती है। प्रार्थी के दस्तखत गलत खाने में हैं। तारीख के ऊपर दो अंक एक में मिल गये हैं। एक जगह कुछ कटा है, उस पर दस्तखत नहीं हैं। बहुत गलती निकाली गयी है।"

* सिकहर रस्सी का बुना हुआ एक झोला होता है। अवध के देहातों में इसे छत से लटका देते हैं। प्रायः उस पर दूध, दही आदि की हाँडियाँ रखी जाती हैं।

रंगनाथ ने कहा," वे दफ्तरवाले बड़े शरारती हैं। कैसी-कैसी गलतियाँ निकालते हैं।"

जैसे गाँधीजी अपनी प्रार्थना-सभा में समझा रहे हों कि हमें अंग्रेजों से घृणा नहीं करनी चाहिए, उसी वजह पर लंगड़ ने सिर हिलाकर कहा, "नहीं बापू, दफ्तरवाले तो अपना काम करते हैं। सारी गड़बड़ी अर्जीनवीस ने की है। विद्या का लोप हो रहा है। नये-नये अर्जीनवीस गलत-सलत लिख देते हैं।"

रंगनाथ ने मन में इतना तो मंजूर कर लिया कि विद्या का लोप हो रहा है, पर लंगड़ के बताये हुए कारण से वह सहमत न हो सका। वह कुछ कहने जा रहा था, तब तक लंगड़ ने जोर से कहा, "कोई बात नहीं बापू, कल दरख्वास्त ठीक हो
जायेगी।" वह खट-खट-खट करता चला गया। सनीचर ने कहा,"जाने किस-किस देश के बाँगडू शिवपालगंज में इक्ट्ठा हो रहे हैं।"

रंगनाथ ने उसे समझाया,"सब जगह ऐसा ही है। दिल्ली का भी यही हाल है।"
जैसे भारतीयों की बुद्धि अंग्रेजी की खिड़की से झाँककर संसार का हालचाल देती है, वैसे ही सनीचर की बुद्धि रंगनाथ की खिड़की से झाँकती हुई दिल्ली के हालचाल लेने लगी।


वह सनीचर को दिल्ली के किस्से सुनाने लगा। जैसे भारतीयों की बुद्धि अंग्रेजी की खिड़की से झाँककर संसार का हालचाल देती है, वैसे ही सनीचर की बुद्धि रंगनाथ की खिड़की से झाँकती हुई दिल्ली के हालचाल लेने लगी। दोनों कुछ देर उसी में अटके रहे।

अँधेरा हो चला था, पर अभी हालत ऐसी नहीं थी कि आँख के सामने खड़े हुए आदमी और जानवर में तमीज न की जा सके। वैद्यजी की बैठक में एक लालटेन लटका दी गयी। सामने रास्ते से तीन नौजवान जोर-जोर से ठहाके लगाते हुए निकले। उनकी बातचीत किसी एक ऐसी घटना के बारे में होती रही जिसमें 'दोपहर', 'फण्टूश','चकाचक', 'ताश' और 'पैसे' का जिक्र उसी बहुतायत से हुआ जो प्लानिंग कमीशन के अलहकारों में 'इवैल्यूएशन', 'कोआर्डिनेशन', 'डवटेलिंग'या साहित्यकारों में 'परिप्रेक्ष्य', 'आयाम', 'युगबोध', 'सन्दर्भ' आदि कहने में पायी जाती है। कुछ कहते-कहते तीनों नौजवान बैठक से आगे जाकर खड़े हो गये। सनीचर ने कहा, "बद्री भैया इन जानवरों को कुश्ती लड़ना सिखाते हैं। समझ लो, बाघ के हाथ में बन्दूक दे रहे हैं। वैसे ही सालों के मारे लोगों का रास्ता चलना मुश्किल है, दाँव-पेंच सीख गये तो गाँव छोड़ देना होगा।"

अचानक नौजवानों ने एक विशेष प्रकार का ठहाका लगाया। सब वर्गों की हँसी और ठहाके अलग-अलग होते हैं। कॉफी-हाउस में बैठे हुए साहित्यकारों का ठहाका कई जगहों से निकलता है, वह किसी के पेट की गहरई से निकलता है, किसी के गले से, किसी के मुँह से और उनमें से एकाध ऐसे भी रह जाते हैं जो सिर्फ सोचते हैं कि ठहाका लगाया क्यों गया है। डिनर के बाद कॉफी पीते हुए, छके हुए अफसरों का ठहाका दूसरी ही किस्म का होता है। वह ज्यादातर पेट के बड़ी ही अन्दरुनी गहराई से निकलता है। उस ठहाके के घनत्व का उनकी साधारण हँसी के साथ वही अनुपात बैठता है जो उनकी आमदनी का उनकी तनख्वाह से होता है। राजनीतिज्ञों का ठहाका सिर्फ़ मुँह के खोखल से निकलता है और उसके दो ही आयाम होते हैं, उसमें प्रायः गहराई नहीं होती। व्यापारियो का ठहाका होता ही नही है और अगर होता भी है तो ऎसे सुक्ष्म और सांकेतिक रुप में,कि पता लग जाता है, ये इनकम-टैक्स के डर से अपने ठहाके का स्टाक बाहर नहीं निकालना चाहते। इन नौजवानों ने ठहाका लगाया था, वह सबसे अलग था। यह् शोहदों का ठहाका था, जो आदमी के गले से निकलता है, पर जान पडता है, मुर्गों, गीदड़ों और घोड़ों के गले से निकला है।
डिनर के बाद कॉफी पीते हुए, छके हुए अफसरों का ठहाका दूसरी ही किस्म का होता है। वह ज्यादातर पेट के बड़ी ही अन्दरुनी गहराई से निकलता है। उस ठहाके के घनत्व का उनकी साधारण हँसी के साथ वही अनुपात बैठता है जो उनकी आमदनी का उनकी तनख्वाह से होता है। राजनीतिज्ञों का ठहाका सिर्फ़ मुँह के खोखल से निकलता है और उसके दो ही आयाम होते हैं, उसमें प्रायः गहराई नहीं होती।


ठहाका सुनते ही सनीचर ने अधिकार-भरी आवाज में कहा,"यहां खड़े-खड़े क्या उखाड़ रहे हो? जाओ, रास्ता नापो।"

नौजवान अपनी हंसी के पांकेट बुक-संस्करण प्रकाशित करते हुए अपना रास्ता नापने लगे। तब तक अंधेरे से एक औरत छम-छम करती हुई निकली और लालटेन की धीमी रोशनी में लपलपाती हुई परछाई छोड़ती दूसरी ओर निकल गयी। वह बड़बड़ाती जा रही थी, जिसका तात्पर्य था कि कल के छोकरे जो उसके सामने नंगे-नंगे घूमा करते थे, आज उससे इश्कबाजी करने चले हैं। सारे मुहल्ले को यह समाचार देकर कि लड़के उसे छेड़ते है और वह अब भी छेड़ने लायक है, वह औरत वहीं अंधेरे में गायब हो गयी। सनीचर ने रंगनाथ से कहां,"न जाने वह काना इस कुतिया को कहां से घसीट लाया है! जब निकलती है तो कोई-न-कोई इसे छेड़ ही देता है।"

'काना' से पं. राधेलाल का अभिप्राय था। उनकी एक आंख दूसरी से छोटी थी और इसी से गंजहे उनको काना कहने लगे थे। यही हमारी प्राचीन परम्परा है, वैसे तो हमारी हर बात प्राचीन परम्परा है, कि लोग बाहर जाते है और जरा-जरा-सी बात पर शादी कर बैठते है। अर्जुन के साथ चित्रांगदा आदि को लेकर यही हुआ था, यही भारतवर्ष के प्रवर्त्तक भरत के पिता दुष्यन्त के साथ हुआ था, यही ट्रिनिडाड और टोबैगो, वर्मा और बैंकाक जानेवालो के साथ होता था, यही अमेरिका और यूरोप जाने वालो के साथ हो रहा है और यही पण्डित राधेलाल के साथ हुआ। अर्थात अपने मुहल्ले में रहते हुए जो बिरादरी के एक इंच भी बाहर जाकर शादी करने की कल्पना-मात्र से बेहोश हो जाते है वे भी अपने क्षेत्र से बाहर निकलते ही शादी के मामले में शेर हो जाते है। अपने मोहल्ले में देवदास पार्वती से शादी नहीं कर सका और एक समूची पीढ़ी को कई वर्षो तक रोने का मसाला दे गया था। उसे विलायत भेज दिया जाता तो वह निश्चय ही बिना हिचक किसी गोरी ऒरत से शादी कर लेता। बाहर निकलते ही हम लोग प्राय: पहला काम यह करते है कि किसी से शादी कर डालते है फ़िर सोचना शुरु करते है कि हम यहां क्या करने आये थे। तो पं. राधेलाल ने भी, सुना जाता है, एक बार पूरब जाकर कुछ करना चाहा था, पर एक महीने में ही वे इस'कुतिया' से शादी करके शिवपालगंज वापस लौट आये।
अपने मोहल्ले में देवदास पार्वती से शादी नहीं कर सका और एक समूची पीढ़ी को कई वर्षो तक रोने का मसाला दे गया था।


किसी पूर्वी जिले की एक शकर-मिल में एक बार पं. राधेलाल को नौकरी मिलने की सम्भावना नजर आयी। नौकरी चौकीदारी की थी। वे वहां जाकर एक दूसरे चौकीदार के साथ रुक गये। तब पं. राधेलाल की शादी नहीं हुई थी और उनके जीवन की सबसे बड़ी समस्या यह् थी कि ऒरत के हाथ का खाना नही मिलता। उनके साथी चौकीदार की बीवी ने कुछ दिनो के लिए इस समस्या को सुलझा दिया। वहां रहते हुए वह उसका बनाया हुआ खाना खाने लगा और जैसे कि एक जगत-प्रसिद्ध् कहावत है, स्त्री पेट के रास्ते आदमी के ह्र्दय पर कब्जा करती है, उसने पं. राधेलाल के पेट में सुरंग लगा दी और ह्रदय की ओर बढ़ने लगी। उन्हें उसका बनाया हुआ खाना ऎसा पसंद आया और वह खुद अपनी बनायी हुई सुरंग मे इस तरह फंस गयी कि महीने-भर के भीतर ही वे उसे अपना खाना बनाने के लिये शिवपालगंज ले आये। चलते-चलते उसके घर से ही उन्होने साल-दो-साल के लिए खाने का इन्तजाम भी साथ मे ले लिया। इस घटना के बाद मिल के क्षेत्र में लोगो ने सोचा कि पं. राधेलाल का साथी चौकीदार उल्लू है। शिवपालगंज में गजहों ने सोचा कि राधेलाल मर्द का बच्चा है। अब तक उस क्षेत्र में पं.राधेलाल की प्रतिष्ठा 'कभी न उखड़नेवाले गवाह' के रुप में थी, अब वे 'कभी न चूकनेवाले मर्द' के रुप में भी विख्यात हो गये।

वैसे,'कभी न उखड़नेवाले गवाह' की ख्याति ही पं. राधेलाल की जीविका का साधन थी। वे निरक्षरता और साक्षरता की सीमा पर रहते थे और जरुरत पड़ने पर अदालतों में 'दस्तखत कर लेता हू,' 'मैं पढ़ा-लिखा नही हूं' इनमें कोई भी बयान दे
सकते थे। पर दीवानी और फ़ौजदारी कानूनों का उन्हें इतना ज्ञान सहज रुप में मिल गया था कि वे किसी भी मुकदमें में गवाह की हैसियत से बयान दे सकते थे और जिरह में अब तक उन्हें कोई भी वकील उखाड़ नही पाया था। जिस तरह कोई भी जज अपने सामने किसी भी मुकदमे का फ़ैसला दे सकता है, कोई भी वकील किसी भी मुकदमे की वकालत कर सकता है, वैसे ही पं. राधेलाल किसी भी मामले के चश्मदीद गवाह बन सकते थे। संक्षेप में, मुकदमेबाजी की जंजीर में वे भी जज,
वकील, पेशकार आदि की तरह एक अनिवार्य कड़ी थे और जिस अंग्रेजी कानून की मोटर पर चढ़कर हम बड़े गौरव के साथ 'रुल आफ़ ला' की घोषणा करते हुए निकलते है, उसके पहियों में वे टाइराड की तरह बंधे हुए उसे मनमाने ढंग से
मोड़ते चलते थे।
जिस तरह कोई भी जज अपने सामने किसी भी मुकदमे का फ़ैसला दे सकता है, कोई भी वकील किसी भी मुकदमे की वकालत कर सकता है, वैसे ही पं. राधेलाल किसी भी मामले के चश्मदीद गवाह बन सकते थे।

एक बार इजलास में खड़े होकर जैसे ही वे शपथ लेते,'गंगा-कसम, भगवान-कसम, सच-सच कहेगे, वैसे ही विरोधी पक्ष से लेकर मजिस्ट्रेट तक समझ जाते कि अब यह सच नही बोल सकता। पर ऎसा समझना बिलकुल बेकार था, क्योंकि फ़ैसला समझ से नहीं कानून से होता है और पं. राधेलाल की बात समझने में चाहे जैसी लगे, कानून पर खरी उतरती थी।

पं. राधेलाल की जो भी प्रतिष्ठा रही हो, उनकी प्रेयसी की स्थिति बिल्कुल साफ़ थी। वह भागकर आयी थी, इसलिए कुतिया थी। लोग उससे मजाक कर सकते थे और हमेशा यह समझकर चल सकते थे कि उसे मजाक अच्छा लगता है। यह शिवपालगंज के नौजवानों का सौभाग्य था कि कुतिया ने भी उनको निराश नही किया। उसे सचमुच ही मजाक अच्छा लगता था और इसी से मजाक होने पर छूटते ही गाली देती थी, जो कि गंजहो मे आत्माभिव्यक्ति का बड़ा जनप्रिय तरीका माना जाता था।

सनीचर रंगनाथ को पं. राधेलाल का किस्सा बड़े ही नाटकीय ढंग से सुना रहे थे। तभी उन तीनो नौजवानों में से एक बैठक के दरवाजे पर जा कर खड़ा हो गया। वह नंगे बदन था। उसके जिस्म पर अखाड़े की मिट्टी लगी हुई थी। लंगोटे की पट्टी कमर से पैरों तक हाथी की सूड़ की तरह लटकी हुई थी। उन दिनों शिवपालगंज में लंगोटा पहनकर चलनेवालों में यही फ़ैशन लोकप्रिय हो रहा था। सनीचर ने पूछा,"क्या मामला है छोटे पहलवान?"

पहलवान ने शरीर के जोड़ों पर दाद खुजलाते हुए कहा,"बद्री भैया आज अखाड़े में नही आये? कहां लपक गये?"

"लपक कहां जायेगे, इधर-उधर कहीं होगे?"

"कहां होगे?"
"यूनियन का सुपरवाइजर गेहूं लदवाकर भाग गया है। उसी की मीटिंग यूनियन में हो रही है। बद्री भी गये होगे।"

पहलवान ने लापरवाही से चबूतरे पर थूक दिया। कहा,"बद्री भैया मीटिंग में बैठ कर क्या अण्डा देगें? सुपरवाइजर को पकड़कर एक धोबीपाट मारते, उसी में साला टें हो जाता! मीटिंग-शीटिंग मे क्या होगा?"

रंगनाथ को बात पसन्द आ गयी। बोला,"क्या तुम्हारें यहां मीटिंग मे अण्डा दिया जाता है?"

पहलवान ने इधर से किसी सवाल की आशा न की थी। उसने कहा," अण्डा नही देगें तो क्या बाल उखाड़ेगे? सब मीटिंग मे बैठ कर रांडो की तरह फ़ांय-फ़ांय करते है, काम धाम के वक्त खूंटा पकड़ कर बैठ जाते है।"

रंगनाथ को हिन्दी-भाषा के इस रुप का विशेष ज्ञान न था। उसने मन में सोचा, लोग यों ही कहा करते है कि हमारी भाषा में सशक्त शब्दों की कमी है। यदि हिन्दी के विद्वानों को छोटे पहलवान की तरह अखाड़े मे चार महीने रखा जाये तो बिना किसी व्यक्तिगत असुविधा के वे वहां की मिट्टी के जर्रे-जर्रे से इस तरह के शब्दकोश निकालने लगेंगे। रंगनाथ ने अब छोटे पहलवान को आदर की निगह से देखा। इतमिनान से बात करने के मतलब से कहा," अन्दर आ जाओ पहलवान।"

"बाहर कौन गाज गिर रही है? हम यही चुर्रेट है।" इतना कहकर छोटे पहलवान ने बातचीत मे कुछ आत्मीयता दिखायी। पूछा,"तुम्हारे क्या हाल है रंगनाथ गुरु"?

रंगनाथ पहलवान से अपने बारे में ज्यादा बात नहीं करना चाहता था। दोनों वक्त दूध-बादाम पीने और कसरत करने की बात काफ़ी-हाउसों मे भले ही लोगो की उत्सुकता न जगाये,पर छोटे पहलवान के लिए यह विषय पूरी रात पार करने को काफ़ी था। रंगनाथ बोला ,"हम तो बिल्कुल फ़िट है पहलवान, अपने हाल बताओ। इस सुपरवाइजर को गेहूं बेचने की क्या जरुरत पड़ी?"

पहलवान ने फ़िर नफ़रत के साथ चबूतरे पर थूका, लंगोट की पट्टी को खींचकर कसा और इस प्रकार असफ़ल चेष्टा से यह शुभेच्छा प्रकट की कि वह नंगा नहीं है। इसके बाद अपने को रंगनाथ की समकक्षता में लाकर बोला,"अरे गुरु कहा है,'तन पर नही लत्ता, पान खाया अलबत्ता' वही हाल था। लखनऊ में दिन रात फ़ुटट्फ़ैरी करता था। तो, बिना मसाले के फ़ुटट्फ़ैरी कैसी? गेहूं तो बेचेगा ही।"

"यह फ़ुटट्फ़ैरी क्या चीज है?"

पहलवान हंसा,"फ़ुटट्फ़ैरी नही समझे। वह ससुरा बड़ा लासेबाज था। तो लासेबाजी कोई हंसी-ठट्ठा है! बड़ों-बड़ों का गूदा निकल आता है। जमुनापुर की रियासत तक इसी में तिड़ी-बिड़ी हो गयी।
देसी विश्वविधालयों के लड़के अंग्रेजी फ़िल्म देखने जाते हैं। अंग्रेजी बातचीत समझ में नहीं आती, फ़िर भी बेचारे मुस्कराकर दिखाते रहते है कि वे सब समझ रहे है और फ़िल्म बड़ी मजेदार है।


देसी विश्वविधालयों के लड़के अंग्रेजी फ़िल्म देखने जाते हैं। अंग्रेजी बातचीत समझ में नहीं आती, फ़िर भी बेचारे मुस्कराकर दिखाते रहते है कि वे सब समझ रहे है और फ़िल्म बड़ी मजेदार है। नासमझी के माहौल में रंगनाथ भी उसी तरह मुस्कुराता रहा। पहलवान कहता रहा,"गुरु,इस रामसरुप सुपरवाइजर की नक्शेबाजी मै पहले से देख रहा था। बद्री पहलवान से मैने तभी कह दिया था कि वस्ताद, यह लखनऊ लासेबाजी की फ़िराक में जाता है। तब तो बद्री वस्ताद भी कहते रहे कि 'टांय-टांय न कर छोटू, साला आग खायेगा तो अंगार हगेगा।' अब वह आग भी खा गया और गेहूं भी तिड़ी कर ले गया। पहले तो बैद महाराज भी छिपाये बैठे रहे, अब जब पाने का हगा उतरा आया है तो सब युनियन के दफ़्तर में बैठकर फ़ुसर-फ़ुसर कर रहे है। सुना है प्रस्ताव पास करेगे। प्रस्ताव न पास करेंगें, पास करेंगा घण्टा। गल्ला गोदाम का सब गल्ला तो रामसरुप निकाल ले गया। अब जैसे प्रस्ताव पास करके ये उसका कुछ उखाड़ ले़गे।"

रंगनाथ ने कहां." बद्री से तुमने बेकार की बात की। बैदजी से अपना शुबहा बताते तो वह तभी इस सुपरवाइजर को यहां से हटवा देते।"

"अरे गुरु, मुंह न खुलवाओ, बैधजी तुम्हारे मामा है, पर हमारे कोई बाप नही लगते। सच्ची बात ठांस दूंगा तो कलेजे में कल्लायेगी, हां!"

सनीचर ने कहां,"छोटू पहलवान, आज बहुत छानकर चले हो क्या? बड़ी रंगबाजी झाड़ रहे हो।"

छोटे पहलवान बोले,"रंगबाजी की बात नहीं बेटा, मेरा तो रोआं-रोआं सुलग रहा है! जिस किसी की दुम उठाकर देखो, मादा ही नजर आता है। बैद महाराज के हाल हमसे न कहलाओ। उनका खाता खुल गया तो भम्भक-जैसा निकल आयेगा। मुंदना भी मुश्किल हो जायेगा। यहीं रामसरुप रोज बैदजी के मुंह-में-मुंह डालकर तीन-तेरह की बातें करता था और जब दो ठेला गेहूं लदवाकर रफ़ूचक्कर हो गया तो दो दिन से टिलटिला रहे हैं। हम भी युनियन में हैं। कह रहे थे, प्रस्ताव में चलकर हाथ उठा दो। हम बोले कि हमसे हाथ न उठवाओ महराज; मैं हाथ उठाऊंगा तो लोग कांखने लगेंगे। हां! यही रामसरुप रोज शहर में घसड़-फ़सड़ करता घूमता है, उसे पकड़वाकर एकलक्खी इमारत में बन्द कराते नहीं, कहते हैं कि प्रस्ताव कर लो। बद्री वस्ताद खुद बिलबिलाये हुए हैं, पर सगे बाप का मामला, यह जांघ खोलो तो लाज और वह खोलो तो लाज।"

तब तक बैठक के सामने लोगों के आने की आवाजे सुनायी दीं। चबूतरे पर खद्दर की धोती, कुरता, सदरी टोपी और चादर में भव्यमूर्ति वैध महाराज प्रकट हुए। उनके पीछे कई और चेले-चपाड़े। बद्री पहलवान सबसे पीछे थे। चेहरा बिना तोबड़े की सहायता के ही तोबड़ा-जैसा हो रहा था। उन्हें देखते ही छोटे ने कहां,"वस्ताद, एक बड़ा फ़ण्टूश मामला है। बड़ी देर से बताने के लिए खड़ा हूं।"

"खड़े हो तो कौन पिघले जा रहे हो? क्या मामला है? कहकर बद्री पहलवान ने छोटे का स्वागत किया। गुरु-शिष्य चबूतरे के दूसरे छोर पर बातचीत करने के लिए चले गये।

वैधजी और चार-पांच आदमी अन्दर आ गये। एक ने इत्मीनान की बड़ी लम्बी सांस खीची जो खत्म होते-होते एक सिसकी में बदल गयी। दूसरा तख्त पर बैठ गया और उसने इतने जोर से जम्हाई ली कि पहले तो वह जम्हाई रही, पर आखीर मे सीटी पर आकर खत्म हुई। वैधजी ने भी तकिये के सहारे बैठकर अपनी टोपी और कुरता इस अन्दाज से तख्त के दूसरे छोर पर फ़ेका जैसे कोई बड़ा गवैया एक लम्बी तान लगा चुकने के बाद सम पर आ गया यह स्पष्ट हो गया कि सभी लोग कोई बड़ा काम करके थकान उतारने की स्थिति में आ गये हैं।

सनीचर बोला,"महाराज, बहुत थकान आ गयी हो तो एक बार फ़िर छनवा दूं।" वैधजी कुछ नही बोले। यूनियन के एक डाइरेक्टर ने कहां,"दुबारा तो वहीं यूनियन में छन चुकी है। बढ़िया माल। दूधिया। अब घर चलने का नम्बर है।"

वैधजी कुछ देर पूर्ववत चुप बैठे हुए दूसरो की बाते सुनते रहें। यह आदत उन्होंने तभी से डाली थी जब से उन्हें विश्वास हो गया था कि जो खुद कम खाता है, दूसरों को ज्यादा खिलाता है; खुद कम बोलता है, दूसरों को ज्यादा बोलने देता है; वही खुद कम बेवकूफ़ बनता है, दूसरे को ज्यादा बेवकूफ़ बनाता है। फ़िर वे अचानक बोले,"रंगनाथ तुम्हारी क्या राय है?"

जिस तरह बिना बताये हुए वैधजी ने राय मांगी थी, उसी तरह बिना बात समझे हुए रंगनाथ ने कहां,"जी जो होता है अच्छा होता है।"

वैधजी मूंछो-ही-मूंछो मे मुस्कराये। बोले,"तुमने बहुत उचित कहा। बद्री प्रस्ताव के विरुद्ध था, पर बाद मे वह भी चुप हो गया। प्रस्ताव एक मत से पास हो गया। जो हुआ अच्छा ही हुआ!"

रंगनाथ को अब ध्यान आया कि वह अपनी राय यों ही लूटा चुका है। उसने उत्सुकतापूर्वक पूछा,"क्या प्रस्ताव किया आप लोगो ने?"

"हम लोगों ने प्रस्ताव किया है कि सुपरवाइजर ने जो हमारी आठ हजार रुपये की हानि की है, उसकी पूर्ति के लिए सरकार अनुदान दे।" रंगनाथ इस तर्क से लड़खड़ा गया। बोला,"सरकार से क्या मतलब? गबन आपकी यूनियन के सुपरवाइजर ने किया और उसका हरजाना सरकार दे?"

"तो कौन देगा? सुपरवाइजर तो अलछित हो चुका है। हमने पुलिस में सूचना दे दी है। आगे सरकार का दायित्व है। हमारे हाथ मे कुछ भी नही है। होता, तो सुपरवाइजर को पकड़कर उससे गेंहू का मूल्य वसूल लेते। अब जो करना है, सरकार करे। या तो सरकार सुपरवाइजर को बन्दी बनाकर हमारे सामने प्रस्तुत करे या कुछ और करे। जो भी हो, यदि सरकार चाहती है कि हमारी यूनियन जीवित रहे और उसके द्धारा जनता का कल्याण होता रहे तो उसे ही यह हरजाना भरना पड़ेगा। अन्यथा यह यूनियन बैठ जायेगी। हमने अपना काम कर दिया, आगे का काम सरकार का है। उसकी अकर्मण्यता भी हम जानते है।"

वैधजी इतनी तर्कसंगत बाते कर रहे थे कि रंगनाथ का दिमाग चकरा गया। वे 'शासन की अकर्मण्यता "जनता का कल्याण" 'दायित्व' आदि शब्द बार-बार अपनी बात में ला रहे थे। रंगनाथ को यकीन हो गया कि नये जमाने मे लोग जैसी भाषा समझते है, उसके मामा पुरानी पीढ़ी के होकर भी वैसी ही भाषा बोलना जानते हैं।

बद्री पहलवान छोटे से बातचीत करके वापस आ गये थे। बोले,"रामाधीन के यहां डाका तो नहीं पड़ा, पर इधर-उधर चोरियां होने की खबरे आयी हैं।" वे अपने बाप के सामने प्राय: अदब से बोलते थे। यह बात भी उन्होने इस तरह से कही जैसे छोटे और उनके बीच की बात का यही निष्कर्ष था और उसे बताना उनका कर्त्तव्य था।

वैधजी ने कहा,"चोरी! डकैती! सर्वत्र यही सुन पड़्ता है। देश रसातल को जा रहा है।"

बद्री पहलवान ने इसे अनसुना करके, जैसे कोई हेल्थ-इंस्पेक्टर हैजे से बचाव के उपाय बता रहा हो,जनसाधारण से कहा , "पूरे गांव मे चोरी की चर्चा है। जागते हुए सोना चाहिए।"

सनीचर ने उछलकर अपना आसन बदला और पूछा,"जागते हुए कैसे सोया जाता है, पहलवान?"

बद्री ने सीधी लाइन मे कहा,"टिपर-टिपर मत करो। मुझे आज मजाक अच्छा नही लग रहा है।"

चबूतरे पर जाकर अंधेरे में छोटे पहलवान के पास खड़े हो गये।

लेखक: श्रीलाल शुक्ल
टंकण सहयोग: समीरलाल, कु. शहनाज़
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