राग दरबारी

जानेमाने साहित्यकार श्रीलाल शुक्ल की रचना "राग-दरबारी" समकालीन साहित्य में एक मील का पत्थर है जिसके लिये उन्हें 1968 में साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला।

Thursday, January 18, 2007

13. वह एक प्रेम पत्र था

तहसील का मुख्यालय होने के बावजूद शिवपालगंज इतना बड़ा गाँव न था कि उसे टाउन एरिया होने का हक मिलता। शिवपालगंज में एक गाँव सभा थी और गाँववाले उसे गाँव-सभा ही बनाये रखना चाहते थे ताकि उन्हें टाउन-एरियावाली दर से ज़्यादा टेक्स न देना पड़े। इस गाँव सभा के प्रधान रामाधीन भीखमखेड़वी के भाई थे जिनकी सबसे बड़ी सुन्दरता यह थी कि वे इतने साल प्रधान रह चुकने के बावजूद न तो पागलख़ाने गये थे, न जेलख़ाने। गँजहों में वे अपनी मूर्खता के लिए प्रसिद्ध थे और उसी कारण, प्रधान बनने के पहले तक, वें सर्वप्रिय थे। बाहर से अफ़सरों के आने पर गाँववाले उनकों एक प्रकार से तश्तरी रखकर उनके सामने पेश करते थे। और कभी-कभी कह भी देते थे कि साहेब, शहर में जो लोग चुनकर जाते हैं उन्हें तो तुमने हज़ार बार देखा होगा, अब एक बार यहाँ का भी माल देखते जाओ।


गाँव-सभा के चुनाव जनवरी के महिने में होने थे और नवम्बर लग चुका था। सवाल यह था कि इस बार किसको प्रधान बनाया जाये? पिछले चुनावों में वैद्यजी ने कोई दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि गाँव-सभा के काम को वे निहायत ज़लील काम मानते थे। और वह एक तरह से ज़लील था भी, क्योंकि गाँव-सभाओं के अफ़सर बड़े टुटपुँजिया क़िस्म के अफ़सर थे। न उनके पास पुलिस का डण्डा था, न तहसीलदार का रूतबा, और उनसे रोज़-रोज़ अपने काम का मुआयना करने में आदमी की इज्जत गिर जाती थी। प्रधान को गाँव-सभा की ज़मीन-जायदाद के लिए मुक़दमें करने पड़ते थे और शहर के इजलास में वकीलों और हाकिमों का उनके साथ वैसा भी सलूक न था जो एक चोर का दूसरे चोर के साथ होता है। मुक़दमेबाज़ी में दुनिया-भर की दुश्मनी लेनी पड़ती थी और मुसीबत के वक़्त पुलिसवाले सिर्फ़ मुस्करा देते थे और कभी-कभी उन्हें मोटे अक्षरों में ‘परधानजी’ कहकर थाने के बाहर का भूगोल समझाने लगते थे।


पर इधर कुछ दिनों से वैद्यजी की रूचि गाँव-सभा में भी दिखने लगी थी, क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री का एक भाषण किसी अख़बार में पढ़ लिया था। उस भाषण में बताया गया था कि गाँवों का उद्धार स्कूल, सहकारी समिति और गाँव-पंचायत के आधार पर ही हो सकता है और अचानक वैद्यजी को लगा कि वे अभी तक गाँव का उद्धार सिर्फ़ कोऑपरेटिव यूनियन और कॉलिज के सहारे करते आ रहे थे और उनके हाथ में गाँव-पंचायत तो है ही नहीं। ‘आह!’ उन्होंने सोचा होगा, ‘तभी शिवपालगंज का ठीक से उद्धार नहीं हो रहा है। यही तो मैं कहूँ कि क्या बात है?’


रूचि लेते ही कई बातें सामने आयीं। यह कि रामाधीन के भाई ने गाँव-सभा को चौपट कर दिया है। गाँव की बंजर ज़मीन पर लोगों ने मनमाने क़ब्ज़े कर लिये हैं और निश्चय ही प्रधान ने रिश्वत ली है। गाँवा-पंचायत के पास रुपया नहीं है और निश्चय ही प्रधान ने ग़बन किया है। गाँव के भीतर बहुत गन्दगी जमा होअ गई है और प्रधान निश्चय ही सुअर का बच्चा है। थानेवालों ने प्रधान की शिकायत पर कईं लोगों का चालान किया है जिससे सिर्फ़ यही नतीजा निकलता है कि वह अब पुलिस का दलाल हो गया है। प्रधान को बन्दूक का लाइसेंस मिल गया है जो निश्चय ही डकैतियों के लिए उधार जाती है और पिछले साल गाँव में बजरंगी का क़त्ल हुआ था, तो बूझो कि क्यों हुआ था?


भंग पीनेवालों में भंग पीसना एक कला है, कविता है, कार्रवाई है, करतब है, रस्म है। वैसे टके की पत्ती को चबाकर ऊपर से पानी पी लिया जाये तो अच्छा-खासा नशा आ जायेगा, पर यहाँ नशेबाजी सस्ती है। आदर्श यह है कि पत्ती के साथ बादाम, पिस्ता, गुलकन्द, दूध-मलाई आदि का प्रयोग किया जाये। भंग को इतना पीसा जाये कि लोढ़ा और सिल चिपककर एक हो जायें, पीने के पहले शंकर भगवान की तारीफ़ में छन्द सुनाये जायें और पूरी कार्रवाई को व्यक्तिगत न बनाकर उसे सामूहिक रूप दिया जाये।


सनीचर का काम वैद्यजी की बैठक में भंग के इसी सामाजिक पहलू को उभारना था। इस समय भी वह रोज़ की तरह भंग पीस रहा था। उसे किसी ने पुकारा, “सनीचर!” सनीचर ने फुफकारकर फन-जैसा सिर ऊपर उठाया। वैद्यजी ने कहा, “भंग का काम किसी और को दे दो और यहाँ अन्दर आ जाओ।“


जैसे कोई उसे मिनिस्टरी से इस्तीफ़ा देने को कह रहा हो। वह भुनभुनाने लगा, “किसे दे दें? कोई है इस काम को करनेवाला? आजकल के लौण्डे क्या जानें इन बातों को। हल्दी-मिर्च-जैसा पीसकर रख देंगे।“ पर उसने किया यही कि सिल-लोढ़े का चार्ज एक नौजवान को दे दिया, हाथ धोकर अपने अण्डरवियर के पिछे पोंछ लिये और वैद्यजी के पास आकर खड़ा हो गया।


तख्त पर वैद्यजी, रंगनाथ, बद्री पहलवान और प्रिंसिपल साहब बैठे थे। प्रिंसिपल एक कोने में खिसककर बोले, “बैठ जाइए सनीचरजी!”


इस बात ने सनीचर को चौकन्ना कर दिया। परिणाम यहाँ हुआ कि उसने टूटे हुए दाँत बाहर निकालकर छाती के बाल खुजलाने शुरू कर दिये। वह बेवकूफ़-सा दिखने लगा, क्योंकि वह जानता था चालाकी के हमले का मुकाबला किस तरह किया जाता है। बोला, “अरे प्रिंसिपल साहेब, अब अपने बराबर बैठालकर मुझे नरक में न डालिए।“


बद्री पहलवान हँसे। बोले, “स्साले! गँजहापन झाड़ते हो! प्रिंसिपल साहब के साथ बैठने से नरक में चले जाओगे?” फिर आवाज़ बदलकर बोले, “बैठ जाओ उधर।“


वैद्यजी ने शाश्वत सत्य कहनेवाली शैली में कहा, “इस तरह से न बोलो बद्री। मंगलदासजी क्या होने जा रहे हैं, इसका तुम्हें कुछ पता भी है?”


सनीचर ने बरसों बाद अपना सही नाम सुना था। वह बैठ गया और बड़प्पन के साथ बोला, “अब पहलवान को ज़्यादा ज़लील न करो महाराज। अभी इनकी उमर ही क्या है? वक़्त पर सब समझ जायेंगे।“


वैद्यजी ने कहा, “तो प्रिंसिपल साहब, कह डालो जो कहना है।“


उन्होने अवधी में कहना शुरू किया, “कहै का कौनि बात है? आप लोग सब जनतै ही।“ फिर अपने को खड़ीबोली की सूली पर चढ़ाकर बोले, “गाँव-सभा का चुनाव हो रहा है, यहाँ का प्रधान बड़ा आदमी होता है। वह कॉलिज-कमेटी का मेम्बर भी होता है-एक तरह से मेरा भी अफ़सर।“


वैद्यजी ने अकस्मात कहा, “सुनो मंगलदास, इस बार हम लोग गाँव-सभा का प्रधान तुम्हें बनायेंगे।“


सनीचर का चेहरा टेढ़ा-मेढ़ा होने लगा। उसने हाथ जोड़ दिये – पुलक गात लोचन सलिल। किसी गुप्त रोग से पीड़ित, उपेक्षित कार्यकर्ता के पास किसी मेडिकल असोसिएशन का चेयरमैन बनने का परवाना आ जाये तो उसकी क्या हालत होगी? वही सनीचर की हुई। फिर अपने को क़बू में करके उसने कहा, “अरे नहीं महाराज, मुझ-जैसे नालायक़ को आपने इस लायक़ समझा, इतना बहुत है। पर मैं इस इज़्ज़त के क़ाबिल नहीं हूँ।“


सनीचर को अचम्भा हुआ कि अचानक वह कितनी बढ़िया उर्दू छाँट गया है। पर बद्री पहलवान ने कहा, “अबे, अभी से मत बहक। ऐसी बातें तो लोग प्रधान बनने के बाद कहते हैं। इन्हें तब तक के लिए बाँधे रख।“


इतनी देर बाद रंगनाथ बातचीत में बैठा। सनीचर का कन्धा थपथपाकर उसने कहा, “लायक़-नालायक़ की बात नहीं है सनीचर! हम मानते हैं कि तुम नालायक़ हो पर उससे क्या? प्रधान तुम खुद थोड़े ही बन रहे हो। वह तो तुम्हे जनता बना रही है। जनता जो चाहेगी, करेगी। तुम कौन हो बोलनेवाले?”


पहलवान ने कहा, “लौंडे तुम्हें दिन-रात बेवकूफ़ बनाते रहते हैं। तब तुम क्या करते हो? यही न कि चुपचाप बेवकूफ़ बन जाते हो?”


प्रिंसिपल साहब ने पढ़े-लिखे आदमी की तरह समझाते हुए कहा, “हाँ भाई, प्रजातन्त्र है। इसमें तो सब जगह इसी तरह होता है।“ सनीचर को जोश दिलाते हुए वे बोले, “शाबाश, सनीचर, हो जाओ तैयार!” यह कहकर उन्होनें ‘चढ़ जा बेटा सूली पर’ वाले अन्दाज़ से सनीचर की ओर देखा। उसका सिर हिलना बन्द हो गया था।


प्रिंसिपल ने आख़िरी धक्का दिया, “प्रधान कोई गबडू-घुसडू ही हो सकता है। भारी ओहदा है। पूरे गाँव की जायदाद का मालिक! चाहे तो सारे गाँव को 107 में चालान करके बन्द कर दे। बड़े-बड़े अफ़सर आकर उसके दरवाज़े बैठते हैं! जिसकी चुगली खा दे, उसका बैठना मुश्किल। काग़ज़ पर ज़रा-सी मोहर मार दी और जब चाहा, मनमाना तेल-शक्कर निकाल लिया। गाँव में उसके हुकुम के बिना कोई अपने घूरे पर कूड़ा तक नहीं डाल सकता। सब उससे सलाह लेकर चलते हैं। सबकी कुंजी उसके पास है। हर लावारिस का वही वारिस है। क्या समझे?”


रंगनाथ को ये बातें आदर्शवाद से कुछ गिरी हुई जान पड़ रही थीं। उसने कहा, “तुम तो मास्टर साहब, प्रधान को पूरा डाकू बनाये दे रहे हो।“


“हें-हें-हें” कहकर प्रिंसिपल ने ऐसा प्रकट किया जैसे वे जान-बूझकर ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें कर रहे हों। यह उनका ढ़ंग था, जिसके द्वारा बेवकूफ़ी करते-करते वे अपने श्रोताओं को यह भी जता देते थे कि मैं अपनी बेवकूफ़ी से परिचित हूँ और इसलिए बेवकूफ़ नहीं हूँ।


“हें-हें-हें, रंगनाथ बाबू! आपने भी क्या सोच लिया? मैं तो मौजूदा प्रधान की बातें बता रहा था।“


रंगनाथ ने प्रिंसिपल को ग़ौर से देखा। यह आदमी अपनी बेवकूफ़ी को भी अपने दुश्मन के ऊपर ठोंककर उसे बदनाम कर रहा है। समझदारी के हथियार से तो अपने विरोधियों को सभी मारते हैं, पर यहाँ बेवकूफ़ी के हथियार से विरोधी को उखाड़ा जा रहा है। थोड़ी देर के लिए खन्ना मास्टर और उनके साथियों के बारे में वह निराश हो गया। उसने समझ लिया कि प्रिंसिपल का मुक़ाबला करने के लिए कुछ और मँजे हुए खिलाड़ी की ज़रूरत है। सनिचर कह रहा था, “पर बद्री भैया, इतने बड़े-बड़े हाकिम प्रधान के दरवाज़े पर आते हैं ... अपना तो कोई दरवाज़ा ही नहीं है; देख तो रहे हो वह टुटहा छप्पर!”


बद्री पहलवान हमेशा से सनीचर से अधिक बातें करने में अपनी तौहीन समझते थे। उन्हें सन्देह हुआ कि आज मौक़ा पाकर यहाँ मुँह लगा जा रहा है। इसलिए वे उठकर खड़े हो गये। कमर से गिरती हुई लुंगी को चारों ओर से लपेटते हुए बोले, “घबराओ नहीं। एक दियासलाई तुम्हारे टुटहे छप्पर में भी लगाये देता हूँ। यह चिंता अभी दूर हुई जाती है।“


कहकर वे घर के अन्दर चले गये। यह मज़ाक था, ऐसा समझकर पहले प्रिंसिपल साहब हँसे, फिर सनीचर भी हँसा। रंगनाथ की समझ में आते-आते बात दूसरी ओर चली गयी थी। वैद्यजी ने कहा, “क्यों? मेरा स्थान तो है ही। आनन्द से यहाँ बैठे रहना। सभी अधिकारियों का यहीं से स्वागत करना। कुछ दिन बाद पक्का पंचायतघर बन जायेगा तो उसी में जाकर रहना। वहीं से गाँव-सभा की सेवा करना।“


सनीचर ने फिर विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़े। सिर्फ़ यही कहा, “मुझे क्या करना है? सारी दुनिया यही कहेगी कि आप लोगों के होते हुए शिवपालगंज में एक निठल्ले को ...”


प्रिंसिपल ने अपनी चिर-परिचित ‘हें-हें-हें’ और अवधी का प्रयोग करते हुए कहा, “फिर बहकने लगे आप सनीचरजी! हमारे इधर राजापर की गाँव-सभा में वहाँ के बाबू साहब ने अपने हलवाहे को प्रधान बनाया है। कोई बड़ा आदमी इस धकापेल में खुद कहाँ पड़ता है।“


प्रिंसिपल साहब बिना किसी कुण्ठा के कहते रहे, “और मैनेजर साहब, उसी हलवाहे ने सभापति बनकर रंग बाँध दिया। क़िस्सा मशहूर है कि एक बार तहसील में जलसा हुआ। डिप्टी साहब आये थे। सभी प्रधान बैठे थे। उन्हें फ़र्श पर दरी बिछाकर बैठाया गया था। डिप्टी साहब कुर्सी पर बैठे थे। तभी हलवाहेराम ने कहा कि यह कहाँ का न्याय है कि हमें बुलाकर फ़र्श पर बैठाया जाये और डिप्टी साहब कुर्सी पर बैठें। डिप्टी साहब भी नयें लौंडे थे। ऐंठ गये। फिर तो दोनों तरफ़ इज़्ज़त का मामला पड़ गया। प्रधान लोग हलवाहेराम के साथ हो गये। ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ के नारे लगने लगे। डिप्टी साहब वहीं कुर्सी दबाये ‘शांति-शांति’ चिल्लाते रहे। पर कहाँ की शांति और कहाँ की शकुंतला? प्रधानों ने सभा में बैठने से इनकार कर दिया और राजापुर का हलवाहा तहसीली क्षेत्र का नेता बन बैठा। दूसरे ही दिन तीन पार्टियों ने अर्जी भेजी कि हमारे मेम्बर बन जाओ पर बाबू साहब ने मना कर दिया कि ख़बरदार, अभी कुछ नहीं। हम जब जिस पार्टी को बतायें, उसी के मेम्बर बन जाना।“


सनीचर के कानों में ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ के नारे लग रहे थे। उसकी कल्पना में एक नग-धड़ंग अण्डरवियरधारी आदमी के पीछे सौ-दो सौ आदमी बाँह उठा-उठाकर चीख़ रहे थे। वैद्यजी बोले, “यह अशिष्टता थी। मैं प्रधान होता तो उठकर चला आता। फिर दो मास बाद अपनी गाँव-सभा में उत्सव करता। डिप्टी साहब को भी आमंत्रित करता। उन्हें फ़र्श पर बैठाल देता। उसके बाद स्वयं कुर्सी पर बैठकर व्याख्य़ान देते हुए कहता कि ‘बन्धुओ! मुझे कुर्सी पर बैठने में स्वाभाविक कष्ट है, पर अतिथि-सत्कार का यह नियम डिप्टी साहब ने अमुक तिथि को हमें तहसील में बुलाकर सिखाया था। अत: उनकी शिक्षा के आधार पर मुझे इस असुविधा को स्वीकार करना पड़ा है।“ कहकर वैद्यजी आत्मतोष के साथ ठठाकर हँसे। रंगनाथ का समर्थन पाने के लिए बोले, “क्यों बेटा, यही उचित होता न?”


रंगनाथ ने कहा, “ठीक है। मुझे भी यह तरकीब लोमड़ी और सारस की कथा में समझायी गयी थी।“


वैद्यजी ने सनीचर से कहा, “तो ठीक है। जाओ देखो, कहीं सचमुच ही तो उस मूर्ख ने भंग को हल्दी-जैसा नहीं पीस दिया है। जाओ, तुम्हारा हाथ लगे बिना रंग नहीं आता।“


बद्री पहलवान मुस्कराकर दरवाज़े पर से बोला, “जाओ साले, फिर वही भंग घोंटो!”


कुछ देर सन्नाटा रहा। प्रिंसिपल ने धीरे-से कहा, “आज्ञा हो तो एक बात खन्ना मास्टर के बारे में कहूँ।“


वैद्यजी ने भौंहें मत्थे पर चढ़ा लीं। आज्ञा मिल गयी। प्रिंसिपल ने कहा, “एक घटना घटी है। परसों शाम के वक़्त गयादीन के आँगन में एक ढेला-जैसा गिरा। गयादीन उस समय दिशा-मैदान के लिए बाहर गया हुआ था। घर में उस ढेले को बेला की बुआ ने देखा और उठाया। वह एक मुड़ा हुआ लिफ़ाफ़ा था। बुआ ने बेला से उसे पढ़वाकर सुनना चाहा, पर बेला पढ़ नहीं पायी।..”


रंगनाथ बड़े ध्यान से सुन रहा था। उसने पूछा, “अंग्रेज़ी में लिखा हुआ था क्या?”


“अंग्रेज़ी में कोई क्या लिखेगा! था तो हिन्दी में ही, पर कुँवारी लड़की उसे पढ़ती कैसे? वह एक प्रेम-पत्र था।“


वैद्यजी चुपचाप सुन रहे थे। रंगनाथ की हिम्मत न पड़ी कि पूछे, पत्र किसने लिखा था।


प्रिंसिपल बोले, “पता नहीं, किसने लिखा था। मुझे तो लगता है कि खन्ना मास्टर के ही गुटवालों की हरकत है। गुण्डे हैं साले, गुण्डे। पर खन्ना मास्टर आपके खिलाफ़ प्रचार कर रहा है। कहता है कि वह पत्र रुप्पन बाबू ने भेजा है। अब उसकी यह हिम्मत कि आपके वंश को कलंकित करें।“


वैद्यजी पर इसका कोई असर नहीं दीख पड़ा, सिवाय इसके कि वे एक मिनट तक चुप बैठे रहे। फिर बोले, “वह मेरे वंश को क्या खाकर कलंकित करेगा! कलंकित तो वह गयादीन के वंश को कर रहा है – कन्या तो उन्हीं की है।“


प्रिंसिपल साहब थोड़ी देर वैद्यजी का मुँह देखते रहे। पर उनका चेहरा बिल्कुल रिटायर हो चुका था। घबराहट में प्रिंसिपल साहब लुढ़ककर अवधी के फ़र्श पर आ गिरे। दूसरी ओर देखते हुए बोले, “लाव भइया सनीचर, जल्दी से ठंडाई-फंडाई लै आव। कॉलिज माँ लेबर छूटै का समय हूवइ रहा है।“

लेखक: श्रीलाल शुक्ल
टंकण सहयोग: गिरिराज जोशी
अध्याय:
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12.नैतिकता कोने में पड़ी चौकी है

गांव में एक आदमी रहता था जिसका नाम गयादीन था। वह जोड़-बाकी, गुणा-भाग में बड़ा काबिल माना जाता था, क्योंकि उसका पेशा सूदखोरी था। उसकी एक दुकान थी जिस पर कपड़ा बिकता था और रूपये का लेन-देन होता था। उसके एक जवान लड़की थी, जिसका नाम बेला था और बहिन थी, जो बेवा थी और एक बीवी थी जो मर चुकी थी। बेला स्वस्थ, सुन्दर, ग्रह कार्य में कुशल और रामायण और माया-मनोहर कहानियां पढ़ लेने-भर को पढ़ी-लिखी थी। उसके लिए एक सुन्दर और सुयोग्य वर की तलाश थी। बेला तबीयत और जिस्म, दोनों से प्रेम करने लायक थी। और रुप्पन बाबू उसको प्रेम करते थे, पर वह यह बात नहीं जानती थी। रूप्पन बाबू रोज रात को सोने के पहले उसके शरीर का ध्यान करते थे और ध्यान को शुद्ध रखने के लिए उस समय वे सिर्फ़ शरीर को देखते थे, उस पर के कपड़े नही। बेला की बुआ गयादीन के घर का काम देखती थी और बेला को दरवाजे से बाहर नहीं निकलने देती थी। बेला बड़ों की आज्ञा मानती थी और दरवाजे से बाहर नहीं निकलती थी। उसे बाहर जाना होता तो छत के रास्ते, मिली हुई छतों को पार करती हुई, किसी पड़ोसी के मकान तक पहुंच जाती थी। रूप्पन बाबू बेला के लिए काफ़ी विकल रहते थे और उसे सप्ताह में तीन-चार पत्र लिखकर उन्हें फ़ाड़ दिया करते थे।

इन बातों का कोई तात्कालिक महत्व नहीं है। महत्व इस बात का है कि गयादीन सूद पर रूपया चलाते थे और कपड़े की दुकान करते थे। कोआपरेटिव यूनियन भी सूद पर रूपया चलाती थी और कपड़े की दुकान करती थी, दोनों शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व में रहते थे। वैद्यजी से उनके अच्छे सम्बन्ध थे। वे कालिज की प्रबन्ध-समिति के उप-सभापति थे। उनके पास पैसा था, इज्जत थी: उन पर वैद्यजी, पुलिस, रुप्पन, स्थानीय एम. एल. ए. और जिला बोर्ड के टैक्स-कलेक्टर की कृपा थी।

इस सबके बावजूद वे निराशावादी थे। वे बहुत संभलकर चलते थे। अपने स्वास्थ्य के बारे में बहुत सावधान थे। वे उड़द की दाल तक से परहेज करते थे। एक बार वे शहर गये हुए थे। वहां उनके एक रिश्तेदार ने उन्हें खाने में उड़द की दाल दी। गयादीन ने धीरे-से-थाली दूर खिसका दी और आचमन करके भूखे ही उठ आये। बाद में उन्हें दूसरी दाल के साथ दूसरा खाना परोसा गया। इस बार उन्होंने आचमन करके खाना खा लिया। शाम को रिश्तेदार ने उन्हें मजबूर किया कि वे बतायें, उड़द की दाल से उन्हें क्या ऎतराज है। कुछ देर इधर-उधर देखकर उन्होंने धीरे-से बताया कि उड़द की दाल खा लेने से पेट में वायु बनती है और गुस्सा आने लगता है।

उनके मेजबान ने पूछा,"अगर गुस्सा आ ही गया तो क्या हो जायेगा? गुस्सा कोई शेर है या चीता? उससे इतना घबराने की क्या बात है?"

मेजबान एक दफ़्तर में काम करता था। गयादीन ने समझाया कि उसका कहना ठीक है। पर गुस्सा सबको नही छजता। गुस्सा करना तो सिर्फ़ हाकिमों को छजता है। हुकूमत भले ही बैठ जाये, पर वह तो हाकिम ही रहेगा। पर हम व्यापारी आदमी है। हमें गुस्सा आने लगा तो कोई भूलकर भी हमारी दुकान पर न आयेगा। और पता नही कब कैसा झंझट खड़ा हो जाये।

गयादीन के यहां चोरी हो गयी थी और चोरी में कुछ जेवर और कपड़े-भर गये थे और पुलिस को यह मानने मे ज्यादा आसानी थी कि उस रात चोरों का पीछा करने वालों में से ही किसी ने चोरी कर डाली है। चोर जब छत से आंगन में कूदा था तो गयादीन की बेटी और बहिन ने उसे नहीं देखा था और तब देखती तो उसका चेहरा दिख जाता। पर जब चोर लाठी के सहारे दीवार पर चढ़कर छत पर जाने लगा तो उसे दोनों ने देख लिया था और तब उन्होंने उसकी पीठ-भर देखी थी और पुलिस को उनकी इस हरकत से बड़ी नाराजगी थी। पुलिस ने पिछले तीन दिनों में कई चोर इन दोनो के सामने लाकर पेश किये थे और चेहरे के साथ-साथ उनकी पीठ भी उन्हें दिखायी दी थी: पर उनमें कोई भी ऎसा नही निकला था कि बेला या उसकी बुआ उसके गले या उसकी पीठ की ओर से जयमाला डाल कर कहती कि "दारोगाजी, यही हमारा उस रात का चोर है।" पुलिस को उनकी इस हरकत से भी बड़ी नाराजगी थी और दारोगाजी ने भुनभुनाना शुरू कर दिया था कि गयादीन की लड़की और बहिन जान-बूझकर चोर को पकड़वाने से इनकार कर रही हैं और पता नही, क्या मामला है।

गयादीन का निराशावाद कुछ और ज्यादा हो गया था, क्योंकि गांव मे इतने मकान थे, पर चोर को अपनी ओर खीचनेवाला उन्हीं का एक मकान रह गया था। और नीचे उतरते वक्त चोर के चेहरे पर बेला और उसकी बहन की निगाह बखूबी पड़ सकती थी, पर उन निगाहो ने देखने के लिए सिर्फ़ चोर की पीठ को ही चुना था और दारोगाजी सबसे हंसकर बोलते थे, पर टेढी बात करने के लिए अब उन्हें गयादीन ही मिल रहे थे।

उस गांव में कुछ मास्टर भी रहते थे जिनमें एक खन्ना थे जो कि बेवकूफ़ थे: दूसरे मालवीय थे, वह भी बेवकूफ़ थे: तीसरे, चौथे, पाचवें, छठे और सातवें मास्टर का नाम गयादीन नही जानते थे, पर वे मास्टर भी बेवकूफ़ थे और गयादीन की निराशा इस समय कुछ और गाढ़ी हुई जा रही थी, क्योंकि सात मास्टर एक साथ उनके मकान की ओर आ रहे थे और निश्चय ही वे चोर के बारे में सहानुभूति दिखाकर एकदम से कालेज के बारे में कोई बेवकूफ़ी की बात शुरू करने वाले थे।


वही हुआ। मास्टर लोग आधे घण्टे तक गयादीन को समझाते रहे कि वे कालिज की प्रबन्ध-समिति के उपाध्यक्ष हैं और चूंकि अध्यक्ष बम्बई में कई साल से रहते आ रहे है और वही रहते रहेगें, इसलिए मैनेजर के और प्रिंसिपल के अनाचार के खिलाफ़ उपाध्यक्ष को कुछ करना चाहिए।

गयादीन ने बहुत ठण्डे ढंग से सर्वोदय सभ्यता के साथ समझाया कि उपाध्यक्ष तो सिर्फ़ कहने की बात है, वास्तव में यह कोई ओहदा-जैसा ओहदा नही है, उनके पास कोई ताकत नहीं है, और मास्टर साहब, ये खेल तुम्हीं लोंग खेलो, हमें बीच में नहीं घसीटो।

तब नागरिक-शास्त्र के मास्टर उन्हें गम्भीरता से बताने लगे कि उपाध्यक्ष की ताकत कितनी बड़ी है। इस विश्वास से कि गयादीन इस बारे मे कुछ नही जानते, उन्होंने उपाध्यक्ष की हैसियत को भारत के संविधान के अनुसार बताना शुरू कर दिया, पर गयादीन जूते की नोक से जमीन पर एक गोल दायरा बनाते रहे जिसका अर्थ यह न था कि वे ज्योमेट्री के जानकार नहीं है, बल्कि इससे साफ़ जाहिर होता था कि वे किसी फ़न्दे के बारे में सोच रहे हैं।

अचानक उन्होंने मास्टर को टोककर पूछा,"तो इसी बात पर बताओ मास्टर साहब कि भारत के उपाध्यक्ष कौन है?"

यह सवाल सुनते ही मास्टरों में भगदड़ मच गयी। कोई इधर को देखने लगा कोई उधर; पर भारत के उपाध्यक्ष का नाम किसी भी दिशा में लिखा नहीं मिला। अन्त में नागरिक-शास्त्र के मास्टर ने कहा,"पहले तो राधाकृष्णनजी थे, अब इधर उनका तबादला हो गया है।

गयादीन धीरे-से बोले,"अब समझ लो मास्टर साहब, उपाध्यक्ष की क्या हैसियत होती है।

मगर मास्टर न माने। उनमें से एक ने जिद पकड़ ली कि कम-से-कम कालिज की प्रबन्ध-समिति की एक बैठक तो गयादीनजी बुलवा ही ले। गयादीन गांव के महाजन जरूर थे, पर वैसे महाजन न थे जिनके किसी ओर निकलने पर पन्थ बन जाता है। वे उस जत्थे के महाजन थे जो अनजानी राह पर पहले किराये के जन भेजते हैं और जब देख लेते हैं कि उस पर पगडण्डी बन गयी है और उसके धंसने का खतरा नही है, तब वे महाजन की तरह छड़ी टेक-टेककर धीरे-धीरे निकल जाते हैं। इसलिए मास्टरों की जिद का उन पर कोई खास असर नहीं हुआ। उन्होंने धीरे-से कहा,"बैठक बुलाने के लिए रामाधीन को लगा दो मास्टर साहब! वे ऎसे कामों के लिए अच्छे रहेंगे।"

"उन्हें तो लगा ही दिया है।"

"तो बस, लगाये रहो। खिसकने न दो, "कहकर गयादीन आसपास बैठे हुए दूसरे लोगों की ओर देखने लगे। ये दूसरे लोग नजदीक के गांव के थे जो पुराने प्रोनोट बढ़वाने, नये प्रोनोट लिखवाने और किसी भी हालत में प्रोनोट से छुटकारा न पाने के लिए आये हुए थे। खन्ना मास्टर ने फ़ैसला कर लिया था कि आज गयादीन से इस मसले की बात पूरी कर ली जाये। इसलिए उन्होंने फ़िर समझाने की कोशिश की। बोले,"मालवीयजी, अब आप ही गयादीनजी को समझाइए। यह प्रिंसिपल तो हमें पीसे डाल रहा है।" गयादीन ने लम्बी सांस खीची, सोचा शायद भाग्य में यही लिखा है, ये निकम्मे मास्टर यहां से जायेगे नहीं। वे देह हिलाकर चारपाई पर दूसरे आसन से बैठ गये। आदमियों से बोले, "तो जाओ भैया! तुम्हीं लोग जाओ। कल सबेरे जरा जल्दी आना।"

गयादीन दूसरी सांस खींचकर खन्ना मास्टर की ओर मुंह करके बैठ गये। खन्ना मास्टर बोले, "आप इजाजत दे तो बात शुरू से ही कहूं।"

"क्या कहोगे मास्टर साहब?" गयादीन ऊबकर बोले,"प्राइवेट स्कूल की मास्टरी-वह तो पिसाई का काम है ही। भागोगे कहां तक?"

खन्ना ने कहा,"मुसीबत यह है कि एक कालिज की जनरल बाडी की मीटिंग पांच साल से नहीं हुई है। बैदजी ही मैनेजर बने हुए है। नये आम चुनाव नहीं हुए हैं, जो कि हर साल होने चाहिए।"

वे कुछ देर रामलीला के राम-लक्ष्मण के तरह भावहीन चेहरा बनाये बैठे रहे। फ़िर बोले,"आप लोग तो पढ़े-लिखे आदमी है। मैं क्या कह सकता हूं? पर सैकड़ो संस्थाएं है जिनकी सालाना बैठकें बरसों नहीं होतीं। अपने यहां का जिलाबोर्ड! एक जमाने से बिना चुनाव कराये हुए इसे सालों खीचा गया है।" गाल फ़ूलाकर वे भर्राये गले से बोले, "देश-भर में यही हाल है।" गला देश-भक्ति के कारण नहीं, खांसी के कारण भर आया था।

मालवीयजी ने कहा,"प्रिंसिपल हजारों रूपया मनमाना खर्च करता है। हर साल आडिटवाले एतराज करते हैं, हर साल यह बुत्ता दे जाता है।"

गयादीन ने बहुत निर्दोष ढंग से कहा,"आप क्या आडिट के इंचार्ज है?"

मालवीय ने आवाज ऊंची करके कहा,"जी नहीं, बात यह नहीं है, पर हमसे देखा नहीं जाता कि जनता का रूपया इस तरह बरबाद हो। आखिर......."

गयादीन ने तभी उनकी बात काट दी उसी तरह धीरे-से-बोले, "फ़िर आप किस तरह चाहते है कि जनता का रुपया बरबाद किया जाये? बड़ी-बड़ी इमारतें बनाकर? सभाएं बुलाकर? दावतें लुटाकर?" इस ज्ञान के सामने मालवीयजी झुक गये। गयादीन ने उदारतापूर्क समझाया,"मास्टर साहब, मैं ज्यादा पढ़ा-लिखा तो हूं नहीं, पर अच्छे दिनों मे कलकत्ता-बम्बई देख चूका हूं। थोड़ा बहुत मै भी समझता हूं। जनता के रुपये पर इतना दर्द दिखाना ठीक नहीं। वह तो बरबाद होगा ही।" वे थोड़ी देर चुप रहे, फ़िर खन्ना मास्टर को पुचकारते-से बोले,"नहीं मास्टर साहब, जनता के रुपये के पीछे इतना सोच-विचार न करों; नहीं तो बड़ी तकलीफ़ उठानी पड़ेगी।"

मालवीयजी को गयादीन की चिन्ताधारा बहुत ही गहन जान पड़ी। गहन थी भी। वे अभी किनारे पर बालू ही में लोट रहे थे। बोले,"गयादीनजी, मै जानता हूं कि इन बातों से हम मास्टरों का कोई मतलब नहीं। चाहे कालिज के बदले वैद्यजी आटा चक्की की मशीन लगवा लें, चाहे प्रिंसिपल अपनी लड़की शादी कर लें; फ़िर भी यह संस्था है तो आप लोगो की ही! उसमें खुलेआम इतनी बेजा बाते हो! नैतिकता का जहां नाम ही न हो!"

इतनी देर में पहली बार गयादीन के मुंह पर कुछ परेशानी-सी झलकी। पर जब वे बोले तो आवाज वही पहले-जैसी थकी-थकी सी थी। उन्होंने कहा,"नैतिकता का नाम न लो मास्टर साहब, किसी ने सुन लिया तो चालान कर देगा।"

लोग चुप रहे। फ़िर गयादीन ने कुछ हरकत दिखायी। उनकी निगाह एक कोने की ओर चली गयी। वहां लकड़ी की एक टूटी-फ़ूटी चौकी पड़ी थी। उसकी ओर उंगली उठाकर गयादीन ने कहां,"नैतिकता, समझ लो कि यही चौकी है। एक कोने में पड़ी है। सभा-सोसायटी के वक्त इस पर चादर बिछा दी जाती है। तब बड़ी बढ़िया दिखती है। इस पर चढ़कर लेक्चर फ़टकार दिया जाता है। यह उसी के लिए है।"

इस बात ने मास्टरों को बिल्कुल ही चुप कर दिया। गयादीन ने ही उन्हें दिलासा देते हुए कहां,"और बोलो मास्टर साहब, खुद तुम्हें क्या तकलीफ़ है? अब तक तो तुम सिर्फ़ जनता की तकलीफ़ बताते रहे हो।"

खन्ना मास्टर उत्तेजित हो गये। बोले,"आपसे कोई भी तकलीफ़ बताना बेकार है। आप किसी भी चीज को तकलीफ़ ही नही मान रहे है।"

"मानेगे क्यों नहीं?" गयादीन ने उन्हें पुचकारा,"जरूर मानेगें। तुम कहो तो!" मालवीयजी ने कहा,"प्रिंसिपल ने हमसे सब काम ले लिये हैं। खन्ना को होस्टल-इंचार्ज नहीं रखा, और मुझसे गेम का चार्ज ले लिया। रायसाहब हमेशा से इम्तिहान के सुपरिण्टेण्डेण्ट थे, उन्हें वहां से हटा दिया है। ये सब काम वह अपने आदमियों को दे रहा है।"

गयादीन बड़े असमंजस में बैठे रहे। फ़िर बोले,"मैं कुछ कहूगां तो आप नाराज होगें। पर जब प्रिंसिपल साहब को अपने मन-मुताबिक इंचार्ज चुनने का अख्तयार है तो उसमें बुरा क्या मानना?"

मास्टर लोग कसमसाये तो वे फ़िर बोले,"दुनिया में सब काम तुम्हारी समझ से थोड़े ही होगा मास्टर साहब? पार साल की याद करो। वही बैजेगांव के लाल साहब को लाट साहब ने वाइस-चांसलर बना दिया कि नही? लोग इतना कूदे-फ़ांदे, पर किसी ने क्या कर लिया। बाद में चुप हो गये। तुम भी चुप हो जाओ। चिल्लाने से कुछ न होगा। लोग तुम्हें ही लुच्चा कहेंगे।"

एक मास्टर पीछे से उचककर बोले,"पर इसका क्या करें? प्रिंसिपल लड़कों को हमारे खिलाफ़ भड़काता है। हमें मां-बहिन की गाली देता है। झूठी रिपोर्ट करता है। हम कुछ लिखकर देते हैं तो उस कागज को गुम करा देता है। बाद में जवाब तलब करता है।"

गयादीन चारपाई पर धीरे-से हिले। वह चरमरायी, तो सकुच से गये। कुछ सोचकर बोले,"यह तो तुम मुझे दफ़्तरों का तरीका बता रहे हो। वहां तो ऎसा होता ही रहता है।"

उस मास्टर ने तैश में आकर कहा,"जब दस-पांच लाशें गिर जायेंगी, तब आप समझेंगे कि नयी बात हुई है।"

गयादीन उसके गुस्से को दया के भाव से देखते रहे, समझ गये कि आज इसने उड़द की दाल खायी है। फ़िर धीरे से बोले,"यह भी कौन सी नयी बात है। चारों तरफ़ पटापट लाशें ही तो गिर रहीं है।"

खन्ना मास्टर ने बात संभाली। बोले,"इनके गुस्से का बुरा न मानें। हम लोग सचमुच ही परेशान हैं। बड़ी मुश्किल है। आप देखिए न, इसी जुलाई में उसने अपने तीन रिश्तेदार मास्टर रखे हैं। उन्हीं को हमसे सीनियर बनाकर सब काम ले रहा है। कुनबापरस्ती का बोलबाला है। बताएं हमें बुरा न लगेगा?"

"बुरा क्यों लगेगा भाई?" गयादीन कांखने लगे,"तुम्हीं तो कहते हो कि कुनबापरस्ती का बोलबाला है। वैद्यजी के रिश्तेदार ना मिले होगें, बेचारे ने अपने ही रिश्तेदार लगा दिये।"

एकाध मास्टर हंसने लगे। गयादीन वैसे ही कहते गये,"मसखरी की बात नहीं। यही आज का जुग-धर्म है। जो सब करते हैं, वही प्रिंसिपल करता है। कहां ले जाये बेचारा अपने रिश्तेदारों को?"

खन्ना मास्टर को सम्बोधित करके उन्होंने फ़िर कहां,"तुम तो इतिहास पढ़ाते हो न मास्टर साहब? सिंहगढ़-विजय कैसे हुई थी?"

खन्ना मास्टर जवाब सोचने लगे। गयादीन ने कहां,"मैं ही बताता हूं। तानाजी क्या लेकर गये थे? एक गोह। उसको रस्से से बांध लिया और किले की दीवार पर फ़ेंक दिया। अब गोह तो अपनी जगह जहां चिपककर बैठ गयी, वहां बैठ गयी। साथवाले सिपाही उसी रस्से के सहारे सड़ासड़ छत पर पहुंच गये।"

इतना कहते-कहते वे शायद थक गये। इस आशा से कि मास्टर लोग कुछ समझ गये होंगे, उन्होंने उनके चेहरे को देखा, पर वे निर्विकार थे। गयादीन ने अपनी बात समझायी,"वही हाल अपने मुल्क का है, मास्टर साहब! जो जहां है, अपनी जगह गोह की तरह चिपका बैठा है। टस-से-मस नही होता। उसे चाहे जितना कोचों,चाहे जितना दुरदुराओ, वह अपनी जगह चिपका रहेगा और जितने नाते-रिश्तेदार हैं,सब उसकी दुम के सहारे सड़ासड़ चढ़ते हुए ऊपर तक चले जायेंगे। कालिज को क्यों बदनाम करते हो, सभी जगह यही हाल है!

फ़िर सांस खीचकर उन्होंने पूछा,"अच्छा बताओ तो मास्टर साहब, यह बात कहां नही है?"


मास्टर का गुट चमरही के पास से निकला। सबके मुंह लटके हुए थे और लगता था कि टपककर उनके पांवों के पास गिरनेवाले हैं।

'चमरही' गांव के एक मुहल्ले का नाम था जिसमें चमार रहते थे। चमार एक जाति का नाम है जिसे अछूत माना जाता है। अछूत एक प्रकार के दुपाये का नाम है जिसे लोग संविधान लागू होने से पहले छूते नही थे। संविधान एक कविता का नाम है जिसके अनुच्छेद १७ में छुआछूत खत्म कर दी गयी है क्योंकि इस देश में लोग कविता के सहारे नहीं बल्कि धर्म के सहारे रहते हैं और क्योकिं छुआछूत इस देश का एक धर्म है, इसलिए शिवपालगंज में भी दूसरे गांवो की तरह अछूतों के अलग-अलग मुहल्ले थे और उनमें सबसे ज्यादा प्रमुख मुहल्ला चमरही था जिसे जमीदारों ने किसी जमाने में बड़ी ललक से बसाया था और उस ललक का कारण जमीदारों के मन में चर्म-उद्योग का विकास करना नहीं था बल्कि यह था कि वहां बसने के लिए आनेवाले चमार लाठी अच्छी चलाते थे। संविधान लागू होने के बाद चमरही और शिवपालगंज के बाकी हिस्से के बीच एक अच्छा काम हुआ था। वहां एक चबूतरा बनवा दिया गया था, जिसे गांधी-चबूतरा कहते थे। गांधी, जैसे कि कुछ लोगों को आज भी याद होगा, भारतवर्ष में ही पैदा हुए थे और उनके अस्थि-कलश के साथ ही उनके सिद्धांन्तों को संगम में
बहा देने के बाद यह तय किया गया था कि गांधी की याद में अब सिर्फ़ पक्की इमारतें बनायी जायेंगी और उसी हल्ले में शिवपालगंज में यह चबूतरा बन गया था। चबूतरा जाड़ों में धूप खाने के लिए बड़ा उपयोगी था और ज्यादातर उस पर कुत्ते धूप खाया करते थे; और चूंकि उनके लिए कोई बाथरूम नहीं बनवाया जाता है इसलिए वे धूप खाते-खाते उसके कोने पर पेशाब भी कर देते थे और उनकी देखादेखी कभी-कभी आदमी भी चबूतरे की आड़ में वही काम करने लगते थे।

मास्टर के गुट ने देखा कि उस चबूतरे पर आज लंगड़ आग जलाकर बैठा है और उस पर कुछ भुन रहा है। नजदीक से देखने पर पता लगा कि भुननेवाली चीज एक गोल-गोल ठोस रोटी है जिसे वह निश्चय ही आसपास घूमनेवाले कुत्तों के लिए नहीं सेंक रहा था। लंगड़ को देखते ही मास्टरों की तबीयत हल्की हो गयी।

उन्होंने रूककर उससें बात करनी शुरू कर दी और दो मिनट में मालूम कर लिया कि तहसील में जिस नकल के लिए लंगड़ ने दरख्वास्त दी थी, वह अब पूरे कायदे से, बिना एक कौड़ी गलत ढ़ग से खर्च किये हुए, उसे मिलने वाली ही है।

मास्टर लोगो को यकीन नहीं हुआ।

लंगड़ की बातचीत में आज निराशावाद; धन-नियतिवाद-सही-पराजयवाद-बटा-कुण्ठावाद का कोई असर न था। उसने बताया ,"बात मान लो बापू। आज मैं सब ठीक कर आया हूं। दरख्वास्त में दो गलतियां फ़िर निकल आयी थी, उन्हें दुरूस्त करा दिया है।"

एक मास्टर ने खीजकर कहा,"पहले भी तो तुम्हारी दरख्वास्त में गलती निकली थी। यह नकलनवीस बार-बार गलतियां क्यों निकाला करता है? चोट्टा कहीं का!"

"गाली न दो बापू,"लंगड़ ने कहां,"यह धरम की लड़ाई है। गाली-गलौज का कोई काम नहीं। नकलनवीस बेचारा क्या करे! कलमवालों की जात ही ऎसी है।"

"तो नकल कब तक मिल जायेगी?"

"अब मिली ही समझो बापू-यही पन्द्रह बीस दिन। मिसिल सदर गयी है। अब दरख्वास्त भी सदर जायेगी। नकल नही बनेगी, फ़िर वह यहां वापस आयेगी; फ़िर
रजिस्टर पर चढ़ेगी...."

लंगड़ नकल लेने की योजना सुनाता रहा, उसे पता भी नही चला कि मास्टर लोग उसकी बात और गांधी-चबूतरे के पास फ़ैली हुई बू से ऊबकर कब आगे बढ़ गये। जब उसने सिर ऊपर उठाया तो उसे आसपास चिरपरिचित कुत्ते, सुअर और घूरे भर दिखायी दिये जिनकी सोहबत में वह दफ़्तर के खिलाफ़ धरम की लड़ाई लड़ने चला था। गोधूलि बेला। एक बछड़ा बड़े उग्र रूप से सींग फ़टकारकर चारों पांवो से एक साथ टेढ़ी-मेढ़ी छलांगे लगाता हुआ चबूतरे के पास से निकला। वह कुछ देर दौड़ता
रहा, फ़िर आगे एक गेहूं के हरे-भरे खेत में जाकर ढीला पड़ गया। लंगड़ ने हाथ जोड़कर कहा, "धन्य हो, दरोगाजी!"

लेखक: श्रीलाल शुक्ल
टंकण सहयोग: कु. शहनाज़
अध्याय:
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Saturday, January 06, 2007

11.यह पालिसी इन्सानियत के खिलाफ़ है

छत पर कमरे के सामने टीन पड़ी थी। टीन के नीचे रंगनाथ था। रंगनाथ के नीचे चारपाई थी। दिन के दस बजे थे। अब आप मौसम का हाल सुनिए।

कल रात को बादल दिखायी दिये थे, वे अब तक छट चुके थे। हवा तेज और ठण्डी थी। पिछले दिनों गरज के साथ छींटे पड़े थे और इस घपले के खत्म हो जाने पर पूस का जाड़ा अब बाकायदा शुरु हो गया था। बाजार मे बिकनेवाली नब्बे फ़ीसदी
मिठाइयों की तरह धूप खाने में नहीं, पर देखने में अच्छी लग रही थी। वह सब तरफ़ थी। पर लगता था सिर्फ़ सामने नीम के पेड़ पर ही फ़ैली है। रंगनाथ नीम पर पड़ती धूप को देख रहा था। नीम के पेड़ शहर में भी थे और धूप को उन पर पड़ने
की और रंगनाथ को उसे देखने की वहां कोई मुमानियत नही थी। पर उसने यह धूप गांव ही आकर देखी। ऎसा उसी के नहीं, बहुत से लोगो के साथ हुआ करता है।

वास्तव में यहां आ जाने पर रंगनाथ का रवैया उन टूरिस्टों का-सा हो गया था जो सड़कें, हवा, इमारतें, पानी, धूप, देश-प्रेम, पेड़-पौधे, कमीनापन, शराब, कर्मनिष्ठा, लड़कियां और विश्वविद्यालय आदि वस्तुएं अपने देश में नहीं पहचान पाते और उन्हें विदेशों में जाने पर ही देख पाते है। तात्पर्य यह है कि रंगनाथ की आंखें धूप की ओर देख रही थीं। पर दिमाग हमारी प्राचीन संस्कृति में खोया हुआ था, जिसमें पहले से ही सैकड़ो चीजें खोयी हुई हैं और शोधकरताओं के खोजने से ही मिलती हैं।

रंगनाथ ने शोध के लिए एक ऎसा ही विषय चुना था। हिन्दुस्तानियों ने अपनी पुरानी जिन्दगी के बारे में अंग्रेजो की मदद से एक विषय की ईजाद की है जिसका नाम इण्डोलाजी है। रंगनाथ के शोध का सम्बन्ध इसी से था। इण्डोलाजी के शोधकर्ताओं को पहले इस विषय के शोधकर्ताओं का शोध करना पड़ता है और रंगनाथ वही कर रहा था। दो दिन पहले शहर जाकर यूनिवर्सिटी के पुस्तकालय से वह बहुत-सी किताबें उठा लाया था और इस समय नीम पर फ़ैली धूप की मार्फ़त उनका अध्ययन कर रहा था। उनके दायें मार्शल और बायीं ओर कनिंधम विराजमान थे। विण्टरनीत्ज बिल्कुल नाक के नीचे थे। कीथ पीछे की ओर पायजामें से सटे थे। स्मिथ पैताने की ओर ढकेल दिये थे और वहीं उल्टी-पल्टी हालत में राइस डेविस की झलक दिखायी दे रही थी। परसी ब्राउन को तकिये ने ढक लिया था। ऎसी भीड़-भाड़ में काशीप्रसाद जायसवाल बिस्तर की एक सिकुड़न के बीच औधे-मुंह पड़े थे। भण्डारकर चादर के नीचे से कुछ सहमे हुए झांक रहे थे। इण्डोलांजी की रिचर्स का समां बंध गया था।

इसीलिए रंगनाथ को जब अचानक 'हाउ-हाउ' की आवाज सुनायी दी तो स्वाभाविक था कि वह समझता, कोई ऋषि सामवेद का गान कर रहा था। थोड़ी देर में 'हाउ-हाउ' और नजदीक आ गया, उसने समझा कि कोई हरिषेंण समुद्रगुप्त की दिग्विजय फ़ेफ़ड़ा फ़ाड़कर सुना रहा है। इतने में वह 'हाउ-हाउ' बिल्कुल नीचे की गली में सुनायी दिया और उसमें 'मार डालूंगा साले को' जैसे दो-चार ओजस्वी वाक्यों की मिलावट भी जान पड़ी। तब रंगनाथ समझ गया कि मामला खालिस गंजहा है।

वह मुंडेर के पास जाकर खड़ा हो गया। गली में झांकने पर उसे एक नौजवान लड़की दिखायी दी। उसका सिर खुला था, साड़ी इधर-उधर हो रही थी, बाल रुखे और ऊलजलूल थे, उसके होंठ बराबर चल रहे थे। पर इन्हीं बातों से यह न सोच बैठना चाहिए कि लड़की शहर की थी या ताजे फ़ैशन की थी। वह ठेठ देहात की थी, निहायत गन्दी थी और उसके होठ च्यूइंग गम खाने की वजह से नहीं, बल्कि अपने साथ की बकरियों को 'हले-हले-हले' कहने की वजह से हिल रहे थे। चार छ:
छोटी-बड़ी बकरियां दीवार की दरार में उगते हुए एक पीपल के पौधे को चर रही थी, या चरकर किसी दूसरी दरार की ओर उसमें उगनेवाले किसी दूसरे पीपल की तलाश कर रही थी। रंगनाथ चरागाही वातावरण का यह दृश्य देखता रहा और उसमें
'हाउ-हाउ' के उदगम की खोज करता रहा। वहां 'हाउ-हाउ' नहीं था। निगाह हटाते-हटाते उसने लड़की के चेहरे को भी देख लिया। जो लड़की का जिक्र आते ही ताली बजाकर नाचने लगते है और फ़र्श से उछलकर छत से टकरा जाते है, उनके लिए
जैसे कोई भी लड़की ,वैसे ही यह लड़की भी खूबसुरत थी। पर सच बात तो यह है कि बकरियां उससे ज्यादा खूबसूरत थीं।

'हाउ-हाउ' के उदगम का पता नही चला, पर वह आवाज कान में बराबर गूंजती रही। रंगनाथ ने परसी ब्राउन, कनिंघम आदि को छत पर वैसे ही पड़ा रहने दिया और नीचे उतकर दरवाजे पर आ गया। इस समय वैद्यजी दवाखाने का काम कर रहे थे। चार-छ: मरीजों और सनीचर को छोड़कर वहां और कोई नहीं था। 'हाउ-हाउ' की आवाज अब बिल्कुल नुक्कड़ पर आ गयी थी।

रंगनाथ ने सनीचर से पूछा "यह सुन रहे हो?"

सनीचर चबूतरे पर बैठा हुआ कुलहाड़ी में बेंट जड़ रहा था। उसने अपनी जगह से घूमकर हवा की ओर कान उठाया और कुछ क्षणों तक 'हाउ-हाउ' सुनता रहा। अचानक उसके माथे से चिन्ता की झुर्रियां खत्म हो गयीं। उसने इत्मीनान से कहा,"हां, कुछ 'हाउ-हाउ' जैसा सुनायी तो दे रहा है। लगता है, छोटे पहलवान से कुसहर की फ़िर लड़ाई हुई है।"

यह बात उसने इस अन्दाज से कही जैसे किसी भैंस ने दीवार में सींग रगड़ दिये हों। वह घूमकर फ़िर अपने प्रारम्भिक आसन से बैठ गया और बसूले से कुलहाड़ी कें बेंट को पतला करने लगा।

अचानक 'हाउ-हाउ' सामने आ गया। वह लगभग साठ साल का एक बुड्ढा आदमी था। देह से मजबूत। नंगे बदन। पहलवानी ढंग से घुटनों तक धोती बांधे हुए। उसके सिर पर तीन चोटें थी और तीनों से अलग-अलग दिशाओं में खून बहकर दिखा रहा था कि यह एक तरफ़ का खून भी आपस में मिलना पसन्द नहीं करता। वह जोर-जोर से 'हाउ-हाउ' करता हुआ, दोनो हाथ उठाकर हमदर्दी की भीख मांग रहा था।

रंगनाथ खून का दृश्य देख कर घबरा गया। सनीचर से उसने पूछा,"ये? ये कौन है?इन्हें किसने मारा?"

सनीचर ने कुल्हाड़ी का बेट और बसूला धीरे से जमीन पर रख दिया। घायल बुजुर्ग को उसने हाथ पकड़ कर चबूतरे पर बैठाया। बुजुर्ग ने असहयोग के जोश में उसका हाथ झटक दिया, पर बैठने से इन्कार नहीं किया। सनीचर ने आंखे सिकोड़कर उनके घांव का मुआइना किया और फ़िर वैद्यजी की ओर होंठ बिदकाकर इशारे से बताया कि घाव गहरे नहीं है। उधर बुजुर्ग का 'हाउ-हाउ' अब द्रुत लय छोड़कर विलम्बित की तरफ़ आने लगा और बाद में बड़े ही ठस किस्म की ताल में अटक गया। ऎसी बात गायकी की पद्धति के हिसाब से उल्टी पड़ती थी, पर मतलब साफ़ था कि वे उखड़ नहीं रहे हैं बल्कि जमकर बैठ रहे हैं। सनीचर ने सन्तोष की सांस ली, जिसे दूर-दूर तक लोगों ने सुना ही नहीं, देख भी लिया।

रंगनाथ हक्का-बक्का खड़ा था। सनीचर ने एक अलमारी से रुई निकालते हुए कहा,"तुम पूछते हो, इन्हें किसने मारा?यह भी कोई पूछने की बात है?"

एक लोटे में पानी और रुई लेकर वह बुजुर्ग के पास पहुंचा और वहीं से बोला,"इन्हें और कौन मारेगा? ये छोटे पहलावान के बाप है। उसे छोड़कर किस साले मे दम है कि इनको हाथ लगा दे?"

शायद छोटे पहलवान की इस प्रशंसा से कुसहर के-जिनका पूरा नाम कुसहरप्रसाद था- मन को कुछ शान्ति पहुंची। वही से वे वैद्यजी से बोले,"महाराज, इस बार तो छोटुआ ने मार ही डाला। अब मुझे बरदाश्त नही होता। हमारा बंटवारा कर दो, नहीं तो आगे कभी मेरे ही हाथों उसका खून हो जायेगा।"

वैद्यजी तख्त से उतरकर चबूतरे तक आये। घाव को देखकर अनुभवी आदमियों की तरह बोले,"चोट बहुत गहरी नही जान पड़ती। यहां की अपेक्षा अस्पताल जाना ही उचित होगा। वहीं जाकर पट्टी-वट्टी बंधवा लो।" उसके बाद उपस्थित लोगों को
संबोधित करते हुये बोले,"छोटे का आज से यहां आना बन्द! ऐसे नारकीय लोगों के लिए यहां स्थान नहीं है।"

रंगनाथ का खून उफ़नाने लगा। बोला,"ताज्जुब है, इस तरह के लोगों को बद्री दादा अपने पास बैठालते है।"

बद्री पहलवान धीरे से घर के बाहर आ गये। लापरवाही से बोले,"पढे़-लिखे आदमी को समझ-बूझकर बोलना चाहिए। क्या पता किसका कसूर है? ये कुसहर भी किसी से कम नहीं है। इनके बाप गंगादयाल जब मेरे थे तो यह उनकी अर्थी तक नहीं निकलने दे रहे थे। कहते थे कि घाट तक घसीटकर डाल आयेगे।"

कुसहरप्रसाद ने एक बार फ़िर बड़े कष्ट से 'हाउ-हाउ' कहां, जिसका अर्थ था कि बद्री ऎसी बात कहकर बड़ा अत्याचार कर रहे हैं। फ़िर वे अचानक उठकर खड़े हो गये और दहाड़कर बोले,"बैद महाराज, अपने लड़के को रोको। ये सब इसी तरह की बातें कहकर एकाध लाशें गिरवाने पर तुले हैं। इन्हें चुप करों, नही तो खून हुए बिना नही रहेगा। अस्पताल तो मै बाद में जाऊंगा, पहले मैं थाने पर जा रहा हूं। छोटुआ को इस बार अदालत का मुंह न दिखाया तो गंगादयाल की नही,दोगले की औलाद कहना। मैं तो यहां तुम्हें सिर्फ़ घाव दिखाने आया था। देख लो बैद महाराज, यह खून बह रहा है अच्छी तरह देख लो तुम्हीं को गवाही में चलना पड़ेगा।

वैद्यजी ने घाव देखने की इच्छा नहीं दिखायी। वे अपनें मरीजों की ओर देखने लगे। साथ ही प्रवचन देने लगे कि पारस्परिक कलह शोक का मूल है। यह कहते हुए, उदाहरण देने के लिए, वे झपटकर इतिहास के कमरें में घुसे और यही कहते हुए पुराण के रोशनदान से बाहर कूद आये।पारस्परिक कलह को शोक का मूल साबित करके उन्होनें कुसहर को सलाह दी कि थाना-कचहरी के चक्कर में न पड़ना चाहिए। उसके बाद वे दूसरे प्रवचन पर आ गये। जिसका विषय था कि थाना-कचहरी भी शोक का मूल हैं।

कुसहर ने दहाड़कर कहा,"महाराज, यह ज्ञान अपने पास रखो। यहां खून की नदी बह गयी और तुम हम पर गांधीगीरी ठांस रहे हो। यदि बद्री पहलवान तुम्हारी छाती पर चढ़ बैठे तो देखूंगा, इहलोक बांचकर कैसे अपने मन को समझाते हो!"

वैद्यजी की मूंछे थरथरायी, जिससे लगा कि वे अपमानित हुए है। पर उनके मुंह पर मुस्कान छिटक गयी, जिससे लगा कि वे अपमानित होना नहीं जानते। उपस्थित लोगों के चेहरे खिंच गये और साफ़ जाहिर हो गया कि कुसहर को अब यहां हमदर्दी की भीख नही मिलेगी। बद्री पहलवान ने दुत्कारकर कहा,"जाओ, जाओ!लगता है, छोटुआ से लड़कर लड़ास पूरी नही हुई हैं। जाकर पट्टी-वट्टी बंधवा लो। यहां बहुत न टिलटिलाओ।"

छोटे पहलवान, जैसाकि अब तक जाहिर हो चूका होगा, खानदानी आदमी थे। उन्हें अपने परदादा तक का नाम याद था और हर खानदानी आदमी की तरह वे उनके किस्से बयान किया करते थे। कभी-कभी अखाड़े पर वे अपने साथियों से कहते:

"हमारे परदादा का नाम भोलानाथ था। उन्हें बड़ा गुस्सा आता था। नथुने हमेशा फ़ड़का ही करते थे। रोज सवेरे उठकर वे पहले अपने बाप से टुर्र-पुर्र करते थे, तब मुहं में पानी डालते थे। टुर्र-पुर्र न होती तो उनका पेट गड़गड़ाया करता।"

छोटे पहलवान की बातों से अतीत का मोह टपकता था। उनके किस्से सुनते ही उन्नीसवी सदी के किसी गांव की तस्वीर सामने आ जाती थी, जिसमें गाय-बैलों से भरे-पूरे दरवाजे पर, गोबर और मूत की ठोस खुशबू के बीच,नीम की छांव तले, जिस्म पर टपकी हुई लसलसी निमकौड़िया झाड़ते हुए दो महापुरुष नंगे बदन अपनी-अपनी चारपाईयों से उठ बैठते थे और उठते ही एक-दूसरे को देर तक सोते रहने के लिए गाली देने लगते थे। दो में एक बाप होता था, एक बेटा। फ़िर दोनो एक-दूसरे को जमीन में जिन्दा गाड़ देने की बात करते हुए अपनी-अपनी चारपाइयां छोड़ देते और मुख्य विषय से दूर जाकर, दो-चार अनर्गल बातें कहकर, अपने-अपने काम में लग जाते। एक बैलो की पूंछ उमेठता हुआ अपने खेतों की ओर चला जाता, दूसरा भैंस चराने के लिए दूसरों के खेतों की ओर चला जाता।

छोटे पहलवान इसी तरह का कोई किस्सा खत्म करके बाद मे कहते,"अपने बाप के मर जाने पर बाबा भोलानाथ बहुत दुखी हुए....।"

छोटे पहलवान ये बातें शेखी बघारने के लिए नहीं कहते थे। ये बिल्कुल सच थी। उनका खानदान ही ऎसा था। उनके यहां बाप-बेटे में हमेशा से बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध चला आ रहा था। प्रेम करना होता तो एक-दूसरे से प्रेम करते,लाठी चलाना होता तो एक-दूसरे पर लाठी चलाते। जो भी अच्छा-बुरा गुण उनके हाथ में था उसकी आजमाइश एक-दूसरे पर ही किया करते।

बाबा भोलानाथ अपने बाप के मर जाने पर सचमुच ही बहुत दुखी हुए। उनके जीवन में एक रीतापन आ गया। उनके न रहने पर सबेरे से ही किसी से झगड़ा करने के लिए उनका पेट गड़गड़ाने लगता। मुंह में पानी डालने का मन न होता। दिन-रात
खेतों पर बैल की तरह जुते रहने पर भी उन्हें अपच की शिकायत रहने लगी। अब उनके लड़के गंगादयाल उनके काम आये। कहा भी है कि लड़का बुढ़ापे में आंख की ज्योति होता है। तो गंगादयाल ने एक दिन सत्रह साल की उमर में ही अपने बाप
भोलानाथ को इतने जोर से लाठी मारी कि वे वहीं जमीन पर गिर गये, उनकी आंखे कौड़ी-जैसी निकल आयीं और उनकी आंखों के सामने ज्योति की वर्षा होने लगी।

उसके बाद बाप-बेटे का सम्बन्ध हमेशा के लिए सुस्थिर हो गये। भोलानाथ अपने बाप की जगह पर आ गये और उनकी जगह गंगादयाल ने ले ली। कुछ दिनों बाद हाथ-पांव-पीठ दर्द रहने के कारण उनका अपच तो ठीक हो गया, पर उनके कानों में बराबर सांय-सांय सी होने लगी। शायद कान के पर्दो को फ़ाड़नेवाली गंगादयाल की गालियां सुनते-सुनते उनके कानो में एक स्थायी अनुगुंज बस गयी थी। जो भी हो, अब सबेरे-सबेरे घर में टुर्र-पुर्र करने के लिए गंगादयाल का पेट गड़गड़ाने लगा।

गंगादयाल के लड़के कुसहरप्रसाद छोटू पहलवान के बाप थे। कुसहरप्रसाद स्वभाव से गम्भीर थे, इसलिए वे गंगादयाल से व्यर्थ गाली-गलौज नहीं करते थे। उन्होनें रोज सवेरे खेतों पर जाने से पहले अपने बाप से झगड़ा करने की परम्परा भी खत्म कर दी। इसकी जगह उन्होनें मासिक रुप से युद्ध करने का चलन चलाया। बचपन से ही गंगादयाल को फ़ूहड़ गालियां देने में ऎसी दक्षता प्राप्त हो गयी थी कि नौजवान गंजहे उनके पास शाम को आकर बैठने लगे थे। वे उनकी मौलिक गालियों को सुनते और बाद में उन्हें अपनी बनाकर प्रचारित करते। गालियों और ग्राम गीतों का कापीराइट नही होता। इस हिसाब से गंगादयाल की गालियां हजार कण्ठों से ह्जार पाठान्तरों के साथ फ़ूटा करती थीं। पर कुसहरप्रसाद अपने बाप की इस प्रतिभा से ज्यादा प्रभावित नहीं हुए। चुपचाप उनकी गालियां सुनते रहते और महीने में एक बार उन पर दो-चार लाठियां झाड़कर फ़िर अपने काम में लग जाते। यह पद्धति अपच की पारिवारिक बीमारी के लिए बड़ी लाभप्रद साबित हुई, क्योकिं खानदान में अपच की शिकायत गंगादयाल के साथ ही खत्म हो गयी।

कुसहरप्रसाद के दो भाई थे। एक बड़कऊ और एक छोटकऊ। बड़कऊ और छोटकऊ शान्तिप्रिय और निरस्त्रीकरण के उपासक थे। उमर-भर उन्होनें कभी कुत्ते पर लाठी नही उठायी। बिल्लियां स्वच्छन्दतापूर्वक उनका रास्ता काट जाती थीं,पर उन्होनें कभी उन्हें ढेला तक नहीं मारा। उन्होंने अपने बाप से गाली देने की कला सीख ली थी और उसके सहारे रोज शाम को सभी पारिवारिक झगड़ों को बिना किसी मार-पीट के सुलझाया करते थे। रोज शाम को दोनो भाइयों और उनकी औरतों में कांव-कांव शुरु होता और बैठक रात के दस बजे तक चलती। इस प्रकार से इन बैठकों का महत्व सुरक्षा-समिति की बैठकों का-सा था जहां लोग कांव-कांव करके युद्ध की स्थिति को काफ़ी हद तक टालने में मदद करते हैं।

इस दृष्टि से रोज शाम को कुसहरप्रसाद के खानदान में उठनेवाले कोहराम को गिरी निगाह से देखना प्रतिक्रियावाद की निशानी होगी; पर पास-पड़ोसवालों का राजनीतिक बोध इतना विकसित न था। अत: जैसे शाम को छोटकऊ और बड़कऊ की गालियां व हाहाकार गाली के कुत्तों की भूंक-भांक के ऊपर उठकर शिवपालगंज के आसमान में बर्छियां-सी चुभोने लगते, पड़ोसियों की आलोचनायें शुरु हो जाती।

"अब यह कुकरहाव आधी रात तक चलेगा।"

"किसी दिन एक फ़टा जूता लेकर इन पर पिल पड़ा जाये, तभी काम बनेगा।"

"इनकी जुबान को संग्रहणी लग गयी है। चलती है तो चलती ही रहती है।"

'कुकरहाव' गंजही बोली का शब्द है। कुत्ते आपस में लड़ते है और एक-दूसरे को बढा़वा देने के लिए शोर मचाते हैं। उसी को कुकरहाव कहते हैं।

शब्द-शास्त्र के इस पेंच को देखते हुए छोटकऊ और बड़कऊ के वार्त्तालाप को कुकरहाव कहना गलत होगा। सच तो यह है कि वे दोनों-सपत्नीक-बंदरहाव करते थे।

वे बन्दरों की तरह खों-खों करते हुए एक-दूसरे पर झपटते, फ़िर बिना किसी के रोक हुए, अपने-आप रुक जाते। अगर उस समय कोई बाहरी आदमी रुककर उनकी ओर देखने लगता या शान्ति के फ़ाख्ते की तजवीज करता, तो दोनों खों-खों करते हुए
एक साथ उसी पर झपट पड़ते। बंदरहाव के ये नियम सभी गजहों को मालूम थे: इसलिए छोटकऊ बड़कऊ की पारिवारिक बैठकों की समीक्षाएं छिपे-छिपे होती थी और उधर वे बैठके निबाध रूप से आधी रात तक चला करती थीं।

छोटे पहलवान के पिता कुसहरप्रसाद अपने भाइयों के वाग्विलास को न समझ पाते थे। जैसे बताया गया, वे कम बोलनेवाले कर्मशील आदमी थे। रह-रहकर चुपचाप किसी को मार बैठना उनके स्वभाव की अपनी विशेषता थी, जो इन आदमियों के
जीवन-दर्शन से मेल नहीं खाती थी। इसलिए, अपने बाप गंगादयाल के मरने पर, कुछ साल बाद, वे अपने भाइयों से अलग हो गये: अर्थात बिना बोले हुए, लाठी के जोर से उन्होने अपने भाइयों को घर के बाहर खदेड़ा, उन्हें एक बाग में झोपड़ी डालकर, वाणप्रस्थ-आश्रम में रहने के लिए ढकेल दिया और खुद अपने नौजवान लड़के के साथ अपने पैतृक घर में पूरी पैतृक परम्पराओं के साथ गृहस्थी चलाने लगे।

महीने में एक बार अपने बाप पर लाठी उठाते-उठाते कुसहरप्रसाद के हाथों की कुछ ऎसी आदत पड़ गयी थी कि गंगादयाल के मर जाने पर उनके हाथ महीनें में दो-चार दिन तक सुन्न रहने लगे। लकवा के खतरे को दूर करने के लिए एक दिन उन्होंने फ़िर लाठी उठायी और छोटे की कमर पर तिरछी करके जड़ दी। छोटे अभी पहलवान नहीं बने थे, पर उनके गांव के पास रेलवे लाइन थी। उसके किनारे तार के खम्भे थे, खम्भों पर सफ़ेद-सफ़ेद इंसुलेटर लगे थे। उनके तोड़ते-तोड़ते केवल अभ्यास की बदौलत, छोटे के ढेले का निशान छोटी उम्र में ही अचूक हो गया था। जिस दिन कुसहरप्रसाद ने छोटे की कमर पर लाठी मारी, उसी दिन छोटे ने एक खम्भे के सभी इंसुलेटर रेलवे के द्धारा दिये गये पत्थरों से तोड़कर रेलवे-लाइन के ही किनारे बिछा दिये थे। लाठी खाकर वे रेलवे-लाइन की दिशा में बीस कदम भागे और वही से उन्होंने अपने बाप की खोपड़ी को इंसुलेटर समझकर एक ढेला फ़ेका। बस, उसी दिन से बाप-बेटे में उनके परिवार का सनातन-धर्म प्रतिष्ठित हो गया। फ़िर तो, लगभग हर महीने कुसहर की देह पर घाव का एक छोटा-सा निशान स्थायी ढंग से दिखने लगा और कुछ वर्षो के बाद वे अपने इलाके के राणा सांगा बन गये।

छोटे पहलवान के जवान हो जाने पर बाप-बेटों ने शब्दों का प्रयोग बन्द ही कर दिया। अब वे उच्च कोटि के कलाकारों की तरह अपना अभिप्राय छापों, चिन्हों और बिम्बों की भाषा में प्रकट करने लगे। उनके बीच में मारपीट की घटनाएं भी कम होने लगी और धीरे-धीरे उसने एक रस्म का-सा रुप ले लिया, जो बड़े-बड़े नेताओं की वर्ष-गांठ की तरह साल में एक बार, जनता की मांग हो या न हो, नियमित रुप से मनायी जाने लगी।

कुसहरप्रसाद के चले जाने पर एक आदमी ने चबूतरे के नीचे खड़े-खड़े कहा," इसी को कलजुग कहते है! बाप के साथ बेटा ऎसा सलूक कर रहा है!"

आसमान की ओर आंखें उठाकर, सिर पर फ़ैली हुई नीम की टहनियों में झांकते हुए,उसने फ़िर कहा,"कहां हो प्रभो? अब लोगे कलंकी अवतार?"

जवाब में आकाशवाणी नहीं हुई। एक कौआ तक नहीं बोला। किसी अबाबील ने बीट तक नही की। कलंकी अवतार की याद करनेवाले का चेहरा गिर गया। पर सनीचर ने कुल्हाड़ी के बेंट को परखते हुए तीखी आवाज में कहां,"जाओ, तुम भी कुसहर के
साथ चले जाओ। गवाही में जाकर खड़े हो जाना। रुपया-धेली वहां भी मिल ही जायेगी।"

बद्री पहलवान ने मुस्कराकर इस बात का समर्थन किया। रंगनाथ ने देखा, कलंकी अवतार की याद करनेवाला व्यक्ति एक पुरोहितनुमा बुड्ढा है। पिचके हुए गाल। खिचड़ी दाढ़ी। बिना बटन का कुरता। सिर पर अस्त-व्यस्त गांधीटोपी, जिसके पीछे
चुटिया निकलकर आसमानी बिजली गिरने से शरीर की रक्षा कर रही थी। माथे पर लाल चंदन का टीका। गले मे रुद्राक्ष की माला।

वह आदमी सचमुच ही कुसहरप्रसाद के पीछे चला गया। सनीचर ने कहा,"यही राधेलाल है। आज तक इन्हें बड़े-से-बड़ा वकील भी जिरह करके नही उखाड़ पाया।"

सनीचर के पास एक तमाशबीन खड़ा था। उसने श्रद्धा से कहा, "राधेलाल महाराज को किसी देवता का इष्ट है। झूठी गवाही सटासट देते चले जाते है। वकील टुकर-टुकर देखते रहते है। बड़ों-बड़ों की बोलती बन्द हो जाती है।"

कुछ देर तक राधेलाल की प्रशंसा होती रही। सनीचर और तमाशबीन में लगभग एक बहस-सी हो गयी। सनीचर की राय थी कि राधेलाल बड़ा काइयां है और शहर के वकील बड़े भोदूं हैं, तभी वे उसे जिरह मे नही उखाड़ पाते। उधर तमाशबीन इसे चमत्कार और देवता के इष्ट के रूप में मानने पर तुला था। तर्क और आस्था की लड़ाई हो रही थी और कहने की जरूरत नहीं कि आस्था तर्क को दबाये दे रही थी।

उसी समय छोटे पहलवान बगल एक गली से अकड़ते हुए निकले। वैद्यजी के दरवाजें आकर उन्होने इधर-उधर ताक-झांक की। फ़िर पूछा,"चले गये?"

सनीचर ने कहा,"हां, गये। पर पहलवान, यह पालिसी इन्सानियत के खिलाफ़ है।"

छोटे ने दांत पीसकर कहा,"इन्सानियत की तो ऎसी की तैसी, और तुम्हें क्या कहूं?"

सनीचर कुल्हाड़ी हाथ में लेकर खड़े हो गये। पुकारकर बोले,"बद्री भैया,देखो, तुम्हारा बछेड़ा मुझ पर दुलती झाड़ रहा है। संभालो!"

वैद्यजी छोटे को देखकर उठ खड़े हुए। रंगनाथ से बोले," ऎसे नीच का मुंह देखना पाप है। इसे यहां से भगा दो।" कहकर वे घर के अन्दर चले गये।

छोटे पहलवान बैठक के अन्दर आ गये थे। धूप फ़ैली हुई थी। सामने नीम के पेड़ पर बहुत- से तोते 'टें-टें' करते हुए उड़ रहे थे। चबूतरे पर सनीचर कुल्हाड़ी लिये खड़ा था। बद्री पहलवान एक कोने में चुपचाप खड़े मुगदर की जोड़ी तौल रहे थे। रंगनाथ वैद्यक की किसी किताब के पन्ने उलट रहा था। छोटे को लगा कि उसके खिलाफ़ विद्रोह की हवा फ़ैली हुई है। जवाब मे वे सीना फ़ुलाकर धचक के साथ रंगनाथ के पास बैठ गये और जबड़े घूमा-घूमाकर मुंह के अन्दर पहले से सुरक्षित सुपारी की जुगाली करने लगे।

छोटे ने रंगनाथ को यों देखा जैसे उनकी निगाह के सामने कोई भुनगा उड़ रहा हो। उखड़ी हुई आवाज में जवाब दिया,"यह बात है तो मैं जाता हू। मैं तो बद्री गुरू का घर समझकर आया हूं। अब तुम्हीं लोगो की हुकूमत है, तो यहां पेशाब करने भी नहीं आऊगां।"

रंगनाथ ने हंसकर बात को हल्का करना चाहा। कहा,"नहीं, नहीं, बैठो पहलवान। दिमाग गरम हो रहा हो तो एक ठण्डा पानी पी लो।"

फ़िर उसी तरह उखड़ी आवाज में छोटे ने कहा,"पानी! मैं यहा टट्टी तक के लिए पानी नहीं लूंगा। सब लोग मिलकर चले है हमको लुलुहाने।"

बद्री ने अब छोटे की ओर बड़प्पन के निगाह से देखा और एक मुगदर को बायें हाथ से तौला। देखते-देखते मुस्कराये। बोले,"गुस्सा तो कमजोरी का काम है। तुम क्यों ऎठ रहे हो? आदमी हो कि पायजामा?"

छोटे पहलवान समझ गये कि उस कोने से उन्हें सहारा मिल रहा है। अकड़ दिखाते हुए बोले,"मुझे अच्छा नही लगा बद्री गुरू! सभी दमड़ी जैसी जान लिये हुये मुझॆ लुलुहाते घूम रहे है। कहते है, बाप को क्यों मारा! बाप को क्यों मारा!! लगता है कुसहरप्रसाद शिवपालगंज में सबके बाप ही लगते है। जैसे मैं ही उनका एक दुश्मन हूं।"

छोटे पहलवान और भी उखड़ गये। बोले,"गुरू साला बाप-जैसा बाप हो, तब तो एक बात भी है।" थोड़ी देर सब चुप रहे।"

रंगनाथ छोटे पहलवान की चढ़ी हुई भौहों को देखता रहा। सनीचर भी अब तक बैठक मे आ गया था। समझाते हुए बोला,"ऎसी बात मुंह से न निकलानी चाहिए। धरती-धरती चलो। आसमान की छाती न फ़ाड़ो। आखिर कुसहर ने तुम्हें पैदा किया है,पाला-पोसा है।"

छोटे ने भुनभुनाकर कहां,"कोई हमने इस्टाम्प लगाकर दरखास्त दी थी कि हमें पैदा करो! चले साले कही के पैदा करनेवाले!"

बद्री चुपचाप यह वार्तालाप सुन रहे थे। अब बोले,"बहुत हो गया छोटे, अब ठण्डे हो जाओ।"

छोटे अनमने होकर बैठे रहे। नीम के पेड़ पर होनेवाली तोतों 'टॆ-टे' सुनते रहे। आखिर में एक सांस खीचकर बोले,"तुम भी मुझी को दबाते हो गुरू! तुम जानते नही, यह बुड्ढा बड़ा कुलच्छनी है। इसके मारे कहारिन ने घर में पानी भरना बन्द कर दिया है। और भी बताऊं? अब क्या बताऊं. कहते जीभ गन्धाती है।"

लेखक: श्रीलाल शुक्ल
टंकण सहयोग: कु. शहनाज़
अध्याय:
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